Monday, 23 December 2019 13:21

धुंध में डूबा उत्तर भारत और बढ़ रहा है प्रदूषण

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लेखक : मलिक असगर हाशमी (सदस्य - ' डाउन टू अर्थ ') 
 
पराली जलाने को लेकर 10 से 15 दिन ही हलचल होती है, उसके बाद सब कुछ सामान्य हो जाता है । साथ ही , इसे थामने के प्रयास भी थम जाते हैं ।
हरियाणा सरकार  ने पराली नहीं जलाने वाले किसानों को प्रोत्साहित करने के लिए मशीन कि खरीद पर पचास प्रतिशत सब्सिडी और पराली जलाने वाले की गुप्त सूचना मुहैया कराने वाले को एक हजार रूपए ईनाम देने का ऐलान किया है , लेकिन यह इंतजाम समस्या खड़ी होने से पहले क्यों नहीं किए गए , इसको लेकर सवाल उठ रहे हैं । 
 
यह भी पूछा जा रहा है कि किसानों पर मुकदमे करने के अलावा अब तक पराली जलाने की रोक थाम में लगे कितने पुलिस एवं प्रशासनिक अधिकारियों पर इसकी विफलता को लेकर कार्यवाही की गई है । इस पूरे सीज़न में कैथल जिले के उप कृषि निदेशक डॉ• पवन शर्मा को सस्पेंड किया गया है , जबकि प्रदेश के नियंत्रण बोर्ड ने सर्वाधिक पराली जलाने वाले तकरीबन पंद्रह जिलों को चिन्हित किया है , फिर वहां के अधिकारी ऐसी कार्यवाही से कैसे बच गए ? 
 
एक नवम्बर को हरियाणा प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने सर्वाधिक पराली जलाने वाले 464 गाँव की एक सूची जारी की थी । इनमें पिछले साल 5453 जगह पराली जलाई गई थी।  इस सूची में अंबाला के 30 , भिवानी के 10 , फतेहाबाद के 30 , हिसार के 30 , झज्जर के 17 , जींद के 30 , पलवल के 30 , पंचकूला के 12 और फरीदाबाद व गुड़गांव के 10 गांव शामिल हैं , जहां अब तक 2350 पराली जलाने के मामले सामने आए हैं । इनके अलावा बाकी जिलों में भी पराली जलाने की थोड़ी बहुत घटनाएं जारी है । इसके लिए अभी तक 218 किसानों पर मुकदमा दर्ज किया जा चुका है । 
हरियाणा के कृषि एवं कल्याण विभाग के निदेशक अजीत बाला जोशी कहते हैं कि पराली जलाने वाले किसानों पर मुकदमे उन्हें परेशान करने के लिए नहीं , बल्कि पर्यावरण को बचाने के लिए दर्ज कराए गए हैं । सवाल है कि प्रदूषण रोकने का क्या यह सही तरीका है ?  मात्र किसानों पर मुकदमा दर्ज करने से पराली जलाने कि घटनाएं थम जाएगी ? प्रत्येक वर्ष हरियाणा सरकार यही करती रही है । धान के अवशेष जलने से उत्पन्न प्रदूषण की समस्या से निपटने के नाम पर कुछ किसानों पर मुकदमा दर्ज कर लिया जाता है ।
 मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर का दावा है कि ऐसे प्रयासों से पिछले साल की तुलना में इस बार 6.5 प्रतिशत पराली कम जलाई गई है । सरकार ने अख़बारों में विज्ञापन जारी कर यह दावा किया है कि 22 अक्टूबर तक राज्य में फसल अवशेष जलाने के क्षेत्र में 34 प्रतिशत की कमी आई है ।
 
सरकार इसे बड़ी उपलब्धि मान रही है । जबकि चार साल पहले एन•जी•टी द्वारा दिए गए दिशा निर्देशों पर अमल करने की उसे आज भी फिक्र नहीं है । एन•जी•टी ने भविष्य में प्रदूषण कि गहराती समस्या के मद्देनजर 5 नवम्बर 2015 को किसानों को जागरूक करने और पराली जलाने पर रोक लगाने के निर्देश दिए थे । फिर एक याचिका पर सुनवाई करते हुए 10 दिसम्बर 2015 को हरियाणा को      ' हैप्पी सीडर ' सहित दूसरी मशीनरी के सम्बन्ध में कुछ महत्वपूर्ण सुझाव दिए थे।  हैप्पी सीडर मशीन से धान की कटाई के साथ पराली के बारीक अवशेष गेहूं के दानों पर गिरते हैं , जिससे नमी में कमी आती है और पैदावार बेहतर होती है ।
इसके विपरीत पराली जलाने से खेतों की उर्वरा शक्ति प्रभावित होती है । खेतों में आग लगने का खतरा बढ़ता है । धरती के सूक्ष्म पोषक तत्व नष्ट होते हैं । नाइट्रोजन की कमी से उत्पादकता कमजोर पड़ती है और हवा प्रदूषित होने से लोगों में बीमारियों का जोखिम बढ़ जाता है । इसलिए एन जी टी ने प्रदेश सरकार को दो एकड़ से कम खेत वाले किसानों को मुफ्त में मशीन देने , दो से पांच एकड़ वाले किसानों को 5000 रूपए में और पांच एकड़ से अधिक खेत वाले कृषकों को 15000 रूपए में मशीन उपलब्ध कराने की हिदायत दी थी । अभी मशीन की लागत करीब 70 से 75 हज़ार रूपए है , जबकि बाजार में यह तकरीबन पौने दो लाख रूपए में बिक रही है । प्रदेश सरकार इस मशीन पर अधिकतम सब्सिडी 30 फीसदी देती थी , जिसे बढ़ाकर 50 प्रतिशत का ऐलान किया गया है। मगर किसान सरकार की इस घोषणा से खुश नहीं है।
 
अंबाला के किसान सुखबीर सिंह तथा कुरुक्षेत्र के किसान जसबीर सिंह ढुल कहते है कि पराली जलाने से फैलने वाले प्रदूषण की प्रदेश सरकार को फिक्र है तो सरकार को चाहिए कि वह कारगर ढंग से जागरूकता अभियान चलाए तथा मशीन खरीद पर एन जी टी के निर्देशों का पालन किया जाए ।
 
अखिल भारतीय किसान सभा की सिरसा इकाई के प्रधान सुरजीत कहते हैं कि एन जी टी के निर्देशों का पालन करते हुए मुफ्त में या 5 से 15 हज़ार रूपए में भी मशीनें उपलब्ध कराने की तो छोड़िए , तीस प्रतिशत की सब्सिडी लेने में पसीने छूट जाते हैं । बैंकों और मशीन की एजेंसियों , विभागों के इतने चक्कर लगाने पड़ते हैं तथा कागजों की इतनी खानापूर्ति की जाती है कि जरुरत के समय मशीन मिलती ही नहीं । इसके अलावा केवल एक सीज़न के लिए कीमती मशीन घर पर रखे रहना , आमतौर से किसान बुद्धिमानी नहीं मानते । 
 
कुछ साल पहले हरियाणा के कृषि व किसान कल्याण विभाग ने लाखों रूपए खर्च करके कई जागरूकता रथ तैयार करवाए थे । इसका उद्देश्य गांव गांव घूमकर प्रदूषण से होने वाले नुकसान और पराली के सदुपयोग के बारे में किसानों को बताना था । अफसोसजनक पहलू यह है कि इनमें से अधिकांश जागरूकता रथ इस समय विभाग के पंचकूला स्थित मुख्यालय में खड़े धूल फांक रहे हैं ।
 
 
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