आम - बसट पेश होना है, लेकिन सरकार की दुश्वारियां हैं कि कम होने का नाम ही नहीं ले रहीं हैं। आर्थिक मंदी और गिरती जीडीपी दर से सरकार जी जान पहले से ही हलकान कर रखी है। फिर अर्थव्यवस्था में जारी नरमी के कारण चालू  वर्ष में कर से प्राप्त राजस्व के भी लक्ष्य की तुलना में दो लाख करोड़ रुपये कम रह जाने की आशंका है। तमाम कोशिशों के बावजूद सरकार निराशा भरे माहौल को खुशगवार बनाने में नाकाम रही है। उच्च महंगाई दर से लेकर मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र की सुस्ती ने उसकी फजीहत कर रखी है। जाहिर है कि उसकी कोशिश सकारात्मक और उम्मीदों से लबरेज बजट पेश करने की होगी। सवाल उठता है कि देश के मध्य आय वर्ग या नौकरीपेशा को इस बजट से क्या अपेक्षा करनी चाहिए?

            वेतन भोगियों और छोटे उद्यमियों का प्रतिनिधित्व करने वाला देश का यह मध्य आय वर्ग हमेशा की तरह मुंह बाये खड़ा है। साल दर साल और बजट दर बजट लाभ और राहत पाने की उम्मीदें उसके लब तक आते-आते छलक जाती हैं। सरकार टुकड़ों-टुकड़ों में यानी कभी वरिष्ठ नागरिकों के लिए, कभी महिलाओं या अन्य वर्गों के लिए नाम मात्र की राहत पेश करती भी है, लेकिन पहले नोटबंदी और अब महंगाई से जूझ रहे इन वर्गों के लिए यह राहत जल्द ही काफूर हो जाती है।

            आम बजट 2020 में मध्य आय वर्ग के लिए सरकार का बड़ा कदम व्यक्तिगत आय कर की दरों में कटौती से संबंधित हो सकता है क्योंकि इसका सीधा वास्ता उपभोक्ता उपभोग में बढ़ोतरी से है। सितम्बर में काॅरपोरेट टैक्स रेट में कटौती होने से कंपनियों को काफी राहत मिली थी। बेशक, राजकोषीय बाध्यताओं की वजह से सरकार की अपनी सीमाएं हैं, लेकिन इस कदम से मांग बढ़ेगी जिसका लाभ पूरी अर्थव्यवस्था को प्राप्त होगा। वर्तमान में, 5 लाख रुपये से ऊपर की कर योग्य आय पर 20 प्रतिशत की दर से कर लिया जाता है, और 10 लाख रुपये से ऊपर की कर योग्य आय पर 30 प्रतिशत की दर से। जाहिर है कि 10 लाख रुपये तक की कमाई पर कर की दर खासी अधिक है। 10 लाख रुपये तक की आय के लिए कर की दर खासी अधिक है। 10 लाख रुपये की आये के लिए कर की दर में 10 प्रतिशत तक की कटौती या पांच से 15 लाख रुपये की सीमा में करदाताओं पर 15 प्रतिशत की विवेकसम्मत दर से कर लगाने पर करदाताओं के पास अधिक राशि आएगी जिसका उपयोग मांग बढ़ने के रूप में सामने आएगा या अगर पांच से 10 लाख रुपये तक की वार्षिक आय पर मौजूदा 20 फीसद की दर को घटाकर 10 फीसद तथा 10 से 20 लाख रुपये तक की वार्षिक आय पर मौजूदा 30 फीसद आय कर को घटाकर 20 फीसद कर दिया जाता है, तो भी इससे कम से कम फिलहाल वेतन भोगियों और मध्य वर्ग के लोगों को काफी राहत मिलेगी।  

लोकसभा में शनिवार को वित्त वर्ष 2020 - 21 के लिए पेश बजट में महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के लिए 30 हजार करोड़  रुपए का प्रावधान किया गया है। मौजूदा वित्त वर्ष के लिए आवंटित राशि से यह 14 फीसद अधिक है।

पोषण, सामाजिक सुरक्षा एवं कल्याण समेत सामाजिक सेवा क्षेत्र के लिए भी बजटीय आवंटन में वृद्धि हुई है। वर्ष 2019-20 के 3891.71 अपेक्षा 2020-21 में इसके लिए 4036.49 करोड़ रुपए का आवंटन किया गया है। राष्ट्रीय पोषण अभियान के लिए भी मौजूदा वित्त वर्ष के 3400 करोड़ रुपए की अपेक्षा आगामी वित्त वर्ष के लिए 3700 करोड़ रुपए का आवंटन किया गया है।

‘वन स्टाप सेंटर’ योजना के लिए भी बजटीय आवंटन में बड़ी वृद्धि हुई है और मौजूदा वित्त वर्ष के 204 करोड़ रुपए की अपेक्षा आगामी वित्त वर्ष के लिए 385 करोड़ का आवंटन किया गया है। प्रधन मंत्री मातृ वंदना योजना के लिए बजटीय आवंटन 2300 करोड़ रुपए से बढ़ा कर 2500 करोड़ रुपए कर दिया गया है। इस योजना के तहत गर्भवती महिलाओं तथा स्तनपान कराने वाली महिला को उसके बच्चे के जन्म पर 6000 रुपए दिए जाते हैं।

बाल सुरक्षा सेवा के लिए बजट का आवंटन 1350 करोड़ रुपए से बढ़ाक कर 1500 करोड़ रुपए कर दिया गया है। इस प्रकार महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के बजटीय आवंटन में मौजूदा वित्त वर्ष की अपेक्षा 14 फीसद वृद्धि के साथ्ज्ञ आगामी वित्त वर्ष के लिए कुल मिला कर 30,007.10 करोड़ रुपए का आवंटन किया गया है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ ’ योजना के लिए 220 करोड़ रुपए आवंटित किए गए हैं। महिला शक्ति केंद्र के लिए बजटीय आवंटन दोगुन कर इसे 50 करोड़ रुपए से बढ़ाकर 100 करोड़ रुपए कर दिया गया है। केंद्र प्रायोजित योजनाओं के लिए कुल 29 हजार 720.38 करोड़ रुपए के बजट का आवंटन किया गया है जो पिछले साल की अपेक्षा 3804 करोड़ रुपया अधिक है।

उत्तर प्रदेश शिक्षक संघ के बैनर तले कानपुर के माध्यमिक व प्राथमिक के शिक्षकों ने एक दिवसीय हड़ताल कर विरोध दर्ज कराते हुए डीआईओएस कार्यालय पर धरना प्रदर्शन किया और अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए बताया कि वर्तमान प्रदेश सरकार के तीन साल के कार्यकाल में अब तक बेसिक शिक्षा अधिकारियों एवं शैक्षिक नीतियों की स्थिति निरंतर नीचे गिरती जा रही है | प्रदेश के लगभग 15,000 विद्यालयों को मर्ज कर लाखों प्रधानाअध्यापकों के पद समाप्त किए जा चुके हैं | तथा इटावा , मैनपुरी और मऊ जैसे तमाम जनपदों के जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी भ्रष्टाचार में लिप्त हैं , अधिकारियों की तमाम शिकायतें शासन व विभाग में करने के बावजूद भी कोई कार्यवाही नहीं की जा रही है |

सेवा सुरक्षा बहाल करने की मांग : शिक्षक संघ के प्रांतीय मंत्री हेमराज सिंह गौर ने कहा कि धारा 21 की खत्म करने से शिक्षकों की सेवाएँ असुरक्षित हुई हैं , इस धारा को बहाल किया जाए | वित्तविहीन शिक्षकों की सेवा नियमावली लागू की जाए | मंडलीय अध्यक्ष आरसी यादव ने पुरानी पेंशन बहाली और मेडिकल सुविधा निशुल्क दिए जाने की मांग की तथा प्रेरणा एप संविलियन को समाप्त करने की बात कही |

मुख्यमंत्री के नाम जेडी को सौंपा गया माँगपत्र : महासंघ की ओर से संयोजक राकेश तिवारी , प्राथमिक शिक्षक संघ के अध्यक्ष राकेश बाबू पांडे , मंत्री परमानंद शुक्ल , अनिल सचान , प्रवीण दीक्षित तथा मोहित मनोहर तिवारी आदि ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को नामित माँगपत्र संयुक्त शिक्षा निदेशक के॰के॰ गुप्ता को सौंपा जिसमे माध्यमिक व प्राथमिक शिक्षकों की मांगों का उल्लेख किया गया है |   

खेती हमेशा से देश ही नहीं बल्कि दुनिया को भी संचालित करने का एक महत्वपूर्ण अंग रही है | देश में कई भू-भागों के किसानों के लिए खेती समय-समय पर लाभदायक सिद्ध हुई तो कई जगह मौसमी कारणो के चलते किसानों को तमाम कठनाइयों और संकटों से भी गुजरना पड़ता है | वर्तमान आधुनिक खेती अधिक महंगी है क्योंकि इसमें डीजल तथा बिजली आदि के तमाम खर्चे शुमार हैं | लेकिन इन खर्चों को कम ही नहीं बल्कि विलुप्त कर देने के लिए कानपुर के युवाओं ने कुछ अहम यंत्र बनाए हैं जिनका निरीक्षण करने गुजरात के राज्यपाल आचार्य देवव्रत कानपुर के बिधनू ब्लॉक के बघारा गाँव पहुँचे |

कानपुर का नया कारनामा : असल में कृषक विवेक चतुर्वेदी के नेतृत्व में आई॰आई॰टी॰ कानपुर से बीटेक पुनीत गोयल , दिल्ली यूनिवर्सिटी से बीटेक अनंत चतुर्वेदी और आई॰आई॰एम कोलकाता से एमबीए अंशुमन सचान ने स्टार्टअप कंपनी विकल्प बनाई है | विवेक ने मीडिया के सामने राज्यपाल महोदय को बैल और सोलर एनर्जी से चलने वाला ट्यूबवेल और ट्रैक्टर दिखाया तथा टीम विकल्प ने बताया कि इससे थ्रेशर , छोटी धनकुट्टी और छोटी आटा चक्की भी चलाई जा सकती है | गेहूं , चना , सरसों , मक्का , मटर , धान आदि की बुआई के लिए विकल्प बीजर और ई-वीडर को भी प्रदर्शित किया |

राज्यपाल को जानकारी दी गई कि इन यंत्रों से अकेले एक आदमी तीन चार घंटे में एक एकड़ की बिजाई और निराई कर सकता है | यंत्र से बुआई पर 80 से 90 प्रतिशत बीज के बचत होती है | साथ ही पैदावार भी डेढ़ गुना अधिक और सिंचाई कम करनी पड़ती है |

राज्यपाल ने बताए खेती के राज : राज्यपाल आचार्य देवव्रत ने विकल्प के प्रयासों की सराहना की तथा  जीवमृत के विषय में जानकारी दी | बताया एकड़ फसल के लिए 190 लीटर पानी , 10 किलो गाय का गोबर , 10 लीटर गौमूत्र , 5 किलो गुड़ , 5 किलो बेसन का मिश्रण सड़ने के बाद जीवामृत बनता है | इसका प्रयोग फसल में करने से रासायनिक खाद डालने की कोई जरूरत नहीं पड़ती है |  

वायु प्रदूषण के मामले में कानपुर ने पाया 17वां पायदान, देश के 85% शहर आज वायु प्रदूषण के बढ़ते दायरे के शिकार हैं | वर्ष 2018 तक के अध्यन पर आधारित ग्रीनपीस इंडिया संस्था की रिपोर्ट के मुताबिक कानपुर की हवा तीन गुना ज्यादा तक खराब है | अवगत करा दें कि ग्रीनपीस संस्था हर वर्ष धूल-धुएँ के कणों यानी पीएम-10 पर आधारित रिपोर्ट सार्वजनिक रूप से प्रकाशित करती है | रिपोर्ट के अनुसार जहाँ कानपुर सत्रहवे नंबर पर रहा तो वहीं लखनऊ 14वें नंबर पर रहा प्रयागराज 7वें नंबर पर रहा तो गाजियाबाद चौथे स्थान पर रहा | हालांकि कानपुर के वायु प्रदूषण का हाल काफी शहरों से बेहतर है तो काफी शहरों से नीचे भी है , कानपुर शहर के नौ सेंटरों से मिले आंकड़ों के आधार पर पीएम-10 को बेस मानते हुए यह रिपोर्ट जारी की है|   

          डॉ मनमोहन सिंह

 पूर्व प्रधानमंत्री एवं प्रख्यात अर्थशास्त्री

             साभार : द हिन्दू 

 

भारतीय अर्थव्यवस्था की स्थिति बेहद चिंता में डाल देने वाली है | मै ऐसा विपक्ष की पार्टी के सदस्य के रूप में नहीं कहता बल्कि इस देश के एक नागरिक के रूप में कह रहा हूँ , अर्थशास्त्र के एक विद्यार्थी के रूप में कहता हूँ | अब तक यह जग जाहिर हो चुका है कि जी॰डी॰पी॰ की सामान्य दर पंद्रह वर्ष के सबसे निचले स्तर पर है , बेरोजगारी पिछले 45 वर्षों में सबसे ज्यादा बढ़ी है | लेकिन अर्थव्यवस्था इन परेशान कर जाने वाले आंकड़ों से चलती ही नहीं है | किसी देश की अर्थव्यवस्था की स्थिति उस देश के समाज के कार्यकलाप की झलक भी होती है | किसी अर्थव्यवस्था का काम-काज उसके नागरिकों और संस्थानो के बीच सामाजिक आदान-प्रदान तथा परस्पर लेन – देन से होता है | इस प्रकार के आदान-प्रदान की बुनियाद में आत्मविश्वास निहित होता है जिससे ही अर्थजगत में रवानी आती है |

आज समाज में भय का माहौल है , अनेक उद्योगपतियों ने मुझे बताया है कि वे सरकारी प्राधिकारों के उत्पीड़न से भयभीत हैं | कार्यवाही हो जाने के डर से बैंक नए ऋण देने में आनाकानी कर रहे हैं | निहित स्वार्थ के चलते नाकामी के डर से व्यापारी नए प्रोजेक्ट्स लगाने से हिचक रहे हैं | रोजगार पैदा करने वाले नए स्टार्ट-अप्स को गहरे संशय से देखा जा रहा है | सरकार और सरकारी संस्थाओं के नीति निर्माता सच कहने से बच रहे हैं , नागरिकों और संस्थानो के बीच ऐसा अविश्वास हो जाने के कारण आर्थिक गतिविधियों पर उल्टा असर पड़ता है जो कि आर्थिक सुस्ती कि नीव रखता है और आर्थिक शिथिलता का बुनियादी कारण बनता है |

मीडिया , न्यायपालिका और जाँच एजेंसियों जैसी स्वतंत्र संस्थानो पर जनता का विश्वास काफी कम हो गया है| विश्वास के क्षरण के कारण ही उद्योगपति जोखिम से बचने के लिए नई योजनाओं में नए रोजगार पैदा करने में असफल होते हैं | उद्योगपति , बैंकर , नीति निर्माता और नागरिकों के बीच सरकार के प्रति जो अविश्वास पैदा हुआ है उसके कारण ही देश कि आर्थिक रफ्तार थम सी गई है | जहाँ एक ओर बैंकर ऋण देने में असमर्थ हैं , उद्योगपति निवेश करने में असमर्थ हैं | आय बढ़ नहीं रही तो वहीं उपभोक्ता मांग धीमी पड़ गई है |

पिछली सरकारों के कार्यकालों में जो भी ऋण दिए गए उन्हे लेकर माना जा रहा है कि वो अयोग्य लोगों को दिए गए | अब जो नई औद्योगिक परियोजनाएं सरकार द्वारा चलाई गईं हैं वे सब सरकार के इष्ट मित्रों द्वारा ही जमाई जा रही हैं |

मेरा मानना है कि भारत की कमजोर अर्थव्यवस्था की मांग बढ़ाने के लिए दोतरफा उपाए करने होंगे , वित्तीय उपाए के साथ ही सामाजिक नीति के जरिए निजी निवेश को प्रोत्साहन देना होगा | इसके तहत हमारे समाज के आर्थिक भागीदारों में विश्वास बहाली करनी होगी | भारत अभी तीन ट्रिलियन डॉलर का वैश्विक आर्थिक पावर हाउस है जो कि कोई छोटी अर्थ व्यवस्था नहीं है जिसे अपने मन मुताबिक हाँका जा सके और न ही इसे रंगीन सुर्खियों और मीडिया के शोर से नियंत्रित किया जा सकता है | खराब खबरों को दबाना और आर्थिक आंकड़ों को छुपाना उज्ज्वल अर्थव्यवस्था के लिए घातक है |

वर्तमान में विश्व की अर्थव्यवस्था में भारत के लिए अवसरों का अंबार है , चीनी निर्यात में गिरावट से भारत के लिए निर्यात के मोर्चे पर खासे अवसर उभर आए हैं | वैश्विक बाजार में कच्चे तेल के दामों में गिरावट के रुझान के मद्देनजर भारत के सामने अप्रत्याशित अवसर हैं | मै प्रधानमंत्री से आग्रह करूंगा कि उद्योगपतियों के प्रति संशय न पालें , हम समाज में परस्पर विश्वास की दिशा में चलेंगे तो अपनी अर्थ व्यवस्था को सिकुड़ने से रोक सकेंगे |   

    

नागरिकताः मोदी थोड़ी हिम्मत करें

डॉ. वेदप्रताप वैदिक

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज रामलीला मैदान में जो भाषण दिया, यदि वे उसकी भावना पर ठीक से अमल करें तो आज देश में जो उपद्रव हो रहा है वह बंद हो जाएगा। वह होता ही नहीं। आज भी वह बंद हो सकता है, बशर्ते कि वे नागरिकता संशोधन विधेयक को अपने भाषण के अनुरुप बना लें। उन्होंने कहा कि हम देश की किसी भी जाति, मजहब, संप्रदाय और वर्ग के विरुद्ध नहीं हैं। हमने दिल्ली की सैकड़ों कालोनियां वैध कीं, करोड़ों लोगों को गैस कनेक्शन दिए और सार्वजनिक हित के जितने भी काम किए, क्या कभी उससे उसकी जाति या धर्म पूछा ? इसमें शक नहीं कि यह बात ठीक है लेकिन क्या भारत की कोई सरकार जाति या धर्म के आधार पर भेदभाव करे तो उसका कुर्सी पर टिके रहना असंभव नहीं हो जाएगा ? यह जो नागरिकता संशोधन कानून सरकार ने बनाया है, इसका दोष यही है कि इसमें धार्मिक आधार पर स्पष्ट भेदभाव है। यह तो बहुत अच्छा है कि कुछ पड़ौसी मुस्लिम देशों के हिंदू, सिख, ईसाई, जैन, बौद्ध और पारसी लोगों को, यदि वे उत्पीड़ित हैं तो उन्हें शरण देने की घोषणा भारत सरकार ने की है। ऐसा करके सरकार ने गांधी, नेहरु, मनमोहनसिंह और अशोक गहलौत की इच्छा को साकार किया है लेकिन इस सूची में से मुसलमानों का नाम निकालकर नरेंद्र मोदी ने घर बैठे मुसीबत मोल ले ली है। इस प्रावधान से भारतीय मुसलमानों का कुछ लेना-देना नहीं है लेकिन इसने गलतफहमी का ऐसा अंबार खड़ा कर दिया है कि उसमें भारत के मुसलमान और हिंदू एक होकर आवाज उठा रहे हैं। सारे देश में हिंसा फैल रही है। पिछले साढ़े पांच साल में मोदी सरकार के विरुद्ध जिसे भी जितना भी गुस्सा है, वह अब इस कानून के बहाने फूटकर बाहर निकल रहा है। देश में फिजूल की हिंसा हो रही है। मोदी सरकार ने निराश और हताश विपक्ष के हाथ में खुद ही एक हथियार थमा दिया है। इस कानून पर संयुक्तराष्ट्र से जनमत संग्रह कराने की मूर्खतापूर्ण मांग भी की जा रही है। इस मामले को इज्जत का सवाल बनाने और देश में अस्थिरता बढ़ाने की बजाय बेहतर यह होगा कि इस नागरिकता कानून में से या तो मजहबों के नाम ही हटा दें या फिर इसमें इस्लाम का नाम भी जोड़ दें। जो भी उत्पीड़ित है, उसके लिए भारत माता की शरण खुली है। प्रत्येक व्यक्ति को गुण-दोष के आधार पर ही भारत की नागरिकता दी जाए। थोक में नागरिकता देना या न देना, दोनों ही गलत है।

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लेखक : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
 
जनरल परवेज मुशर्रफ को देशद्रोह के अपराध में सजा-ए-मौत हो गई। यह अनहोनी है। क्यों है ? क्योंकि आज तक किसी पाकिस्तान की अदालत की यह हिम्मत नहीं हुई कि वह अपने किसी फौजी तानाशाह को देशद्रोही कहे और उसे मौत के घाट उतारने की हिम्मत करे। जनरल अयूब खान, जनरल याह्या खान और जनरल जिया-उल-हक ने जब तख्ता-पलट किया तो पाकिस्तान की न्यायपालिका ने उसको यह कहकर उचित ठहरा दिया कि वह उस समय की मांग थी। मजबूरी थी। उसे ‘डाॅक्ट्रीन आॅफ नेसेसिटी’ कहा गया।
लेकिन आप पूछ सकते हैं कि जनरल मुशर्रफ को यह सजा क्यों सुनाई गई ? इसका एक जवाब तो यह है कि वे मूलतः पाकिस्तानी नहीं हैं। वे मुहाजिर हैं। हिंदुस्तानी हैं। दिल्ली में पैदा हुए हैं। बाकी जनरल पठान और पंजाबी थे। इस दलील में कोई खास दम नहीं है लेकिन मेरी राय है कि जनरल मुशर्रफ के साथ पाकिस्तान के जजों ने अपना बदला निकाला है। जैसा दंगल पाकिस्तान के जजों और वकीलों के साथ मुशर्रफ का हुआ, वैसा किसी भी राष्ट्रपति के साथ नहीं हुआ। मुशर्रफ को यह सजा 1999 में तख्ता-पलट के लिए नहीं दी गई है बल्कि 2007 में आपात्काल थोपने के लिए दी गई है। यह वह समय है, जब मुशर्रफ और पाकिस्तान की न्यायपालिका के बीच तलवारें खिंच गई थीं। मुख्य न्यायाधीश इफ्तिकार मुहम्मद चौधरी को बर्खास्त करने पर राष्ट्रपति मुशर्रफ तुल गए थे। यह घटना भी 2007 की ही है। उन्होंने पहले सेनापति का पद छोड़ा और फिर 2008 में राष्ट्रपति का पद भी ताकि उन पर महाभियोग न चले। 
 
मुशर्रफ आजकल दुबई में रहते हैं। बहुत बीमार हैं। उन्हें 30 दिन का समय मिला है। वे अपील कर सकते हैं। मुझे पूरा विश्वास है कि पाकिस्तान के वर्तमान राष्ट्रपति उनको क्षमादान दे देंगे। एक तो पाकिस्तान की फौज ने अदालत के इस फैसले पर दो-टूक शब्दों में आपत्ति की है। दूसरा, इमरान सरकार भी उनके प्रति सहानुभूति दिखाना चाहेगी। फौज और इमरान का आपसी संबंध काफी घनिष्ट है।  वे उसके विरुद्ध क्यों जाएंगे ? तीसरा, नवाज शरीफ इस बात को भूले नहीं है कि तख्ता—पलट के बाद उन्हें जुल्फिकार अली भुट्टो की तरह फांसी नहीं दी गई बल्कि मुशर्रफ ने उन्हें सउदी अरब में शरण लेने दी। चौथा, पाकिस्तान की जनता यह जानती है कि मुहाजिर होने के बावजूद मुशर्रफ ने हिंदुस्तान की नाक में दम करने की कोई कसर नहीं छोड़ी थी। ऐेसे राष्ट्राध्यक्ष को देशद्रोही कहकर फांसी देना पाकिस्तान का लोकप्रिय कदम नहीं हो सकता। पांचवां, अदालत ने मुशर्रफ को पूरा मौका नहीं दिया कि वे अपना पक्ष उसके सामने रख सकें। इस फैसले का बस एक ही फायदा है। वह यह कि अब पाक में शायद फौजी तख्ता-पलट बंद हो जाएं।
 
मैं खुद कहता हूं कि मुशर्रफ को अभी कुछ साल और जिंदा रहना चाहिए। कुछ माह पहले जब दुबई में मेरी उनसे दो घंटे लंबी भेंट हुई तो मैंने पाया कि वह मुशर्रफ का नया अवतार था। कश्मीर पर पहले अटलजी के साथ और बाद में मनमोहनजी के साथ उनके चार-सूत्री समझौतों को आगे बढ़ाने के लिए उन्होंने बड़ा उत्साह दिखाया। उन्होंने एक विदेशी प्रधानमंत्री से मेरी बात करवाने की कोशिश भी की। यदि भारत-पाक शांति के मामले को आगे बढ़ाने में वे अपना शेष जीवन लगाएं तो शायद असंभव भी संभव हो जाए।
 
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