लेखक : गुरदीप सिंह सप्पल 

(एडिटर इन चीफ़ - स्वराज एक्स्प्रेस)

साभार : मीडिया विज़िल 

 

बात हिंदू मुसलमान की है ही नहीं। NRC राष्ट्रीय स्तर पर बनेगा,ये बात गृह मंत्री अमित शाह बोल चुके हैं।

इसमें क्या होगा? क्या सिर्फ़ मुस्लिम लोगों को तकलीफ़ होगी?

अभी कोई तारीख़, कोई प्रक्रिया तय नहीं हुई है। हमारे सामने केवल असम का अनुभव है, जहाँ 13 लाख हिंदू और 6 लाख मुस्लिम/ आदिवासी अपनी नागरिकता साबित नहीं कर पाए।

सवाल है कि क्यों नहीं कर पाए?

क्योंकि वहाँ सबको NRC के लिए 1971 से पहले के काग़ज़ात, डॉक्यूमेंट सबूत के तौर पर जमा करने थे। ये सबूत थे:

1. 1971 की वोटर लिस्ट मेन खुद का या माँ-बाप के नाम का सबूत; या
2. 1951 में, यानि बँटवारे के बाद बने NRC में मिला माँ-बाप/ दादा दादी आदि का कोड नम्बर

साथ ही, नीचे दिए गए दस्तावेज़ों में से 1971 से पहले का एक या अधिक सबूत:

1. नागरिकता सर्टिफिकेट
2. ज़मीन का रिकॉर्ड
3. किराये पर दी प्रापर्टी का रिकार्ड
4. रिफ्यूजी सर्टिफिकेट
5. तब का पासपोर्ट
6. तब का बैंक डाक्यूमेंट
7. तब की LIC पॉलिसी
8. उस वक्त का स्कूल सर्टिफिकेट
9. विवाहित महिलाओं के लिए सर्किल ऑफिसर या ग्राम पंचायत सचिव का सर्टिफिकेट

अब तय कर लें कि इन में से क्या आपके पास है। ये सबको चाहिये, सिर्फ़ मुस्लिमों को नहीं।

और अगर नहीं हैं, तो कैसे इकट्ठा करेंगे। ये ध्यान दें कि 130 करोड़ लोग एक साथ ये डाक्यूमेंट ढूँढ रहे होंगे। जिन विभागों से से ये मिल सकते हैं, वहाँ कितनी लम्बी लाइनें लगेंगी, कितनी रिश्वत चलेगी?

असम में जो ये डाक्यूमेंट जमा नहीं कर सके, उनकी नागरिकता ख़ारिज होगी 12-13 लाख हिंदुओं की और 6 लाख मुस्लिमों/ आदिवासियों की।

राष्ट्रीय NRC में भी यही होना है।

BJP के हिंदू समर्थक आज निश्चिंत बैठ सकते हैं कि नागरिकता संशोधन क़ानून, जो सरकार संसद से पास करा चुकी है, उससे ग़ैर-मुस्लिम लोगों की नागरिकता तो बच ही जाएगी।

जी, ठीक सोच रहे हैं। लेकिन NRC बनने, अपील की प्रक्रिया पूरी होने तक, फिर नए क़ानून के तहत नागरिकता बहाल होने के बीच कई साल का फ़ासला होगा।

130 करोड़ के डाक्यूमेंट जाँचने में और फिर करोडों लोग जो फ़ेल हो जाएँगे, उनके मामलों को निपटाने में वक़्त लगता है।
असम में छः साल लग चुके हैं, प्रक्रिया जारी है। आधार नम्बर के लिए 11 साल लग चुके हैं, जबकि उसमें ऊपर लिखे डाक्यूमेंट भी नहीं देने थे।

जो लोग NRC में फ़ेल हो जाएँगे, हिंदू हों या मुस्लिम या और कोई, उन सबको पहले किसी ट्रिब्युनल या कोर्ट की प्रक्रिया से गुज़रना होगा। NRC से बाहर होने और नागरिकता बहाल होने तक कितना समय लगेगा, इसका सिर्फ़ अनुमान लगाया जा सकता है। कई साल भी लग सकते हैं।

उस बीच में जो भी नागरिकता खोएगा, उससे और उसके परिवार से बैंक सुविधा, प्रॉपर्टी के अधिकार, सरकारी नौकरी के अधिकार, सरकारी योजनाओं के फ़ायदे के अधिकार, वोट के अधिकार, चुनाव लड़ने के अधिकार नहीं होंगे।

अब तय कर लीजिए, कितने हिंदू और ग़ैर मुस्लिम ऊपर के डाक्यूमेंट पूरे कर सकेंगे, और उस रूप में पूरे कर सकेंगे जो सरकारी बाबू को स्वीकार्य हो। और नहीं कर सकेंगे तो नागरिकता बहाल होने तक क्या क्या क़ीमत देनी पड़ेगी?

बाक़ी बात रही मोदी जी के ऊपर विश्वास की, कि वो कोई रास्ता निकाल कर ऊपर लिखी गयी परेशानियों से बचा लेंगे, तो नोटबंदी और GST को याद कर लीजिए। तब भी विश्वास तो पूरा था, पर जो वायदा था वो मिला क्या, और जो परेशानी हुई, उससे बचे क्या?

 

NRC में कैसे करेंगे सभी अपनी नागरिकता साबित?

 

सुनने में बहुत आसान लगता है कि अगर सच्चे नागरिक हो तो NRC से डरते क्यों हो? आख़िर बिना आधार के, बिना राशन कार्ड के, बिना वोटर कार्ड या ड्राइविंग लाइसेंस या घर के काग़ज़ के तो नहीं रह रहे हैं न।

ठीक है, लेकिन तीन बातें समझिए कि फिर भी NRC देश में सबके लिए मुसीबत की आहट क्यों है?

पहली बात:

NRC बनाया ही इसलिये जा रहा है कि सरकार को आशंका है कि विदेशी घुसपैठियों ने फ़र्ज़ी पेपरों के दम पर आधार या वोटर कार्ड या ड्राइविंग लाइसेंस या राशन कार्ड वग़ैरा बना लिया है और भारतीय नागरिकों में वो मिक्स हो गए हैं।

इसीलिये NRC में सिर्फ़ इन मौजूदा डॉक्यूमेंट के आधार पर कोई भी नागरिकता साबित नहीं कर पाएगा। इसके लिए पुराने रिकार्ड चाहिए ही होंगे, जिन्हें जमा करने के लिए सभी को जूझना होगा।

दूसरी बात:

मोदी सरकार ने जनधन स्कीम में 37.66 करोड़ बैंक खाते खोले गए हैं। इनमें से ज़्यादातर खाताधारक NRC के नागरिकता टेस्ट को कैसे पास करेंगे, कैसे अपनी नागरिकता बचाएँगे?

इन 37 करोड़ में ज़्यादातर वो गरीब लोग हैं, जिनके पास आज के समय के मामूली से पहचान पत्र और घर का पता बताने वाले कागज़ भी नहीं हैं। ये लोग नागरिकता साबित करने वाले सालों साल पुराने कागज़ कहाँ से लाएंगे?

याद रहे कि जन धन स्कीम सरकार ने उन गरीब, असहाय लोगों के खाते खोलने के लिए शुरू की थी, जिनके पास बैंक में खाता खोलने के ज़रूरी डॉक्यूमेंट नहीं होते थे। इसीलिए उनके खाते मनरेगा कार्ड या आधार नम्बर से खोले गए हैं। जिनके पास वह भी नहीं थे, उनके ‘छोटे खाते’ बिना किसी पहचान पत्र के, सिर्फ़ दो फ़ोटो के साथ खोले गए हैं।

इन 37 करोड़ लोगों में से कितनों के पास नागरिकता साबित करने के लिए ज़रूरी डॉक्यूमेंट मिलेंगे? उनका आख़िर क्या होगा? NRC में नागरिकता टेस्ट में यदि ये करोड़ों लोग फ़ेल हो गए, तो ट्रायब्यूनल/ कोर्ट में अपील में सालों चक्कर नहीं काटेंगे?
ज़रा सोचिए!

(कहने को जन धन खाते पासपोर्ट, पैन नम्बर, ड्राइविंग लाइसेंस या गज़ेटेड ऑफ़िसर के सर्टिफ़िकेट से भी खुल सकते हैं, लेकिन जिन्होंने कभी बैंक का मुँह नहीं देखा था, उनके पास ये डॉक्यूमेंट होने की कितनी सम्भावना है?)

तीसरी बात:

NRC में हर व्यक्ति की नागरिकता की जाँच करने प्लान है। हर परिवार नहीं, हर व्यक्ति की!

अगर किसी के परिवार में एक व्यक्ति के नाम ज़रूरी डाक्यूमेंट हैं, तब भी उस व्यक्ति के साथ परिवार के साथ हर व्यक्ति का रिश्ता सरकारी काग़ज़ों की मार्फ़त साबित करना होगा।

इसी नियम की वजह से देश के पूर्व राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद के परिवार के लोग असम NRC से बाहर हो गए। इसी नियम के कारण वहाँ एक BJP के MLA की बीवी का नाम, कारगिल युद्ध में शामिल फ़ौजी अफ़सर, कांग्रेस के पूर्व विधायक का नाम जैसे कितने ही जाने माने लोग NRC में नागरिकता साबित नहीं कर पाए।

इसलिए इतने आश्वस्त मत रहिये कि आप तो भारत के सच्चे नागरिक हैं, तो आप को क्या चिंता।

देश भर में NRC हिंदू -मुस्लिम का सवाल नहीं है। हर भारतीय इससे जूझता नज़र आएगा।

 
गुरदीप सिंह सप्पल

(लेखक राज्यसभा टीवी के पूर्व सीईओ और स्वराज एक्सप्रेस चैनल के एडिटर इन चीफ़ हैं। उनकी फ़ेसबुक दीवार से साभार प्रकाशित।)

लेखक : पंकज श्रीवास्तव (संपादक-मीडिया विज़िल)

पाकिस्तान में हिंदुओं पर अत्याचार होता है, इसमें किसी को शक़ नहीं है। लेकिन धर्म को राष्ट्रीयता का आधार बनाने वाले पाकिस्तान में सिर्फ़ हिंदुओं पर ही नहीं, ईसाईयों पर भी अत्याचार होता है। यहाँ तक कि अहमदियों को इस्लाम के बाहर बताकर उनका जीना मुहाल कर दिया जाता है और शियों की मस्जिदों पर नमाज़ के दौरान बम फेंककर तमाम बेगुनाहों का क़त्ल कर दिया जाता है। ईशनिंदा क़ानून का विरोध करने वाले पंजाब के गवर्नर रह चुके सलमान तासीर को उनका सुरक्षाकर्मी ही गोली से उड़ा देता है और उस क़ातिल का जनता इस्तकबाल करती है।

लेकिन अत्याचार की इन कहानियों को अगर कोई अपना राजनीतिक उल्लू साबित करने के लिए इस्तेमाल करे तो वहीं पहुँच जाता है जहाँ पाकिस्तान के तमाम हुक्मरान खड़े नज़र आते हैं। जिनकी नज़र में ‘सेक्युलर’ भारत के हर मुसलमान को अत्याचार का शिकार होना पड़ता है। यह दुष्प्रचार इस क़दर है कि तमाम पाकिस्तानियों को यह भी लगता है कि भारत में मुसलमानो को नमाज़ पढ़ने की आज़ादी भी नहीं। उधर, भारत में भी व्हाट्सऐप .युनिवर्सिटी के पाठ्यक्रम में यह बात कूट-कूटकर भरी है कि पाकिस्तान में हर हिंदू का धर्मांतरण होता है और वहाँ हिंदुओं की आबादी न के बराबर रह गई है।

हक़ीक़त यह है कि पाकिस्तान में हिंदुओं की आबादी के बढ़ने की रफ्तार भारत में हिंदुओं की आबादी बढ़ने की रफ़्तार से कहीं ज़्यादा है। इस सिलसिले में बिज़नेस स्टैंडर्ड में प्रकाशित इस लेख को देखा जा सकता है।

पर इस पर बात आगे। पहले जान लीजिए कि नागरिकता संशोधन बिल पर हुई बहस के दौरान पाकिस्तान की हिंदू आबादी के बारे में किस कदर झूठ बोला जा रहा है। गृहमंत्री अमित शाह ने कहा – “1947 में पाकिस्तान में 23 फीसदी हिंदू थे लेकिन वहीं साल 2011 में ये आकंड़ा 3.4 फीसदी रह गया. पड़ोसी देशों में अल्पसंख्यकों पर हो रहे अत्याचारों को देखते हुए भारत मूकदर्शक नहीं बन सकता. वहीं भारत में अल्पसंख्यकों की आबादी बढ़ी है. पड़ोसी देशों के अल्पसंख्यकों पर भारत चुप नहीं रहेगा।”

क्या अमित शाह का दावा ठीक है या फिर ये व्हाट्सऐप युनिवनर्सिटी का प्रचार है जो अब संसद की बहसों में भी शामिल हो गई है। अज़ादी के पहले जनगणना 1941 में हुई थी इसलिए 1947 की जनसंख्या उसी जनगणना के आधार पर बतायी जाती है। इसके बाद बड़ी तादाद में आबादी इधर से उधर और उधर से इधर आयी-गयी। इस तथ्य को छिपा लिया जाता है जबकि आबादी का स्थानांतरण स्थिर होने के बाद जो जनगणना 1951 में हुई। इसके नतीजों के आधार पर ही आबादी की कोई सही तस्वीर सामने आ सकती है।

1941 की जनगणना के मताबिक भारत की कुल आबादी में मुस्लिम जनसंख्या लगभग चौथाई (24.3%) थी जो बँटवारे के बाद 1951 की जनगणना के मुताबिक 9.8% रह गई। 1951 की जनगणना के मुताबिक पाकिस्तान में 12.9 फ़ीसदी हिंदू थे ( पश्चिमी पाकिस्तान में 1.6 % और पूर्वी पाकिस्तान में 22.05 %) । 2011 की जनगणना के मुताबिक बांग्लादेश की कुल आबादी का 8.5% हिंदू हैं यानी करीब एक करोड़ 40 लाख।

अमित शाह जैसे नेता, बड़ी सफ़ाई से पाकिस्तान के संबंध में 1941 की जनगणना के आँकड़ों का इस्तेमाल करते हैं और आबादी स्थानांतरण के प्रभाव को छिपा जाते हैं। यही नहीं, वे बांग्लादेश निर्माण की वजह से पाकिस्तान में हिंदुओं की आबादी में आई भारी कमी पर भी पर्दा डाल देते हैं जबकि पूर्वी पाकिस्तान में हिंदुओं की आबादी पश्चिमी पाकिस्तान से कई गुना थी जो बांग्लादेश बना। बांग्लादेश निर्माण के दौरान बड़ी तादाद में वहाँ के लोग भारतीय सीमाओं में आए। इसमें हिंदू और मुसलमान दोनों थे। असम का एनआरसी प्रयोग बताता है कि हिंदुओं के आने की तादाद मुसलमानों से कहीं ज़्यादा है। वे बेहतर अवसर की वजह से आये न कि धार्मिक उत्पीड़न की वजह से। वैसे भी ‘दरवाज़ा बांग्लादेश में पिछवाड़ा भारत’ में जैसे अस्वाभाविक बँटवारे का यह स्वाभाविक नतीजा भी है।

पाकिस्तान ब्यूरो ऑफ स्टैटिक्स के मुताबिक 2017 की जनगणना के हिसाब से पाकिस्तान की आबादी 207 मिलियन (20 करोड़ 70 लाख) है। इससे पहले 1998 में जनगणना हुई थी जब पाकिस्तान में हिंदुओं की तादाद 2.1 मिलियन (20 लाख दस हजार) थी यानी कुल आबादी का 1.6 फीसदी जो 2017 की जनगणना के मुताबिक 3.3 फीसदी हो गई है।

हालाँकि ‘हिंदू काउंसिल ऑफ पाकिस्तान’ के मुताबिक हिंदुओं की आबादी पाकिस्तान में 4 फ़ीसदी है। 1981 की जनगणना की तुलना में पाकिस्तान में हिंदू आबादी 93 फ़ीसदी बढ़ी है। हिंदू काउंसिल के मुताबिक पाकिस्तान में 80 लाख हिंदू रहते हैं। सिंध में सबसे ज़्यादा हिंदू आबादी है। अल्पसंख्यकों में आबादी के बढ़ने की रफ़्तार बहुसंख्यों की तुलना में ज़्यादा होती ही है। जैसे कि भारत में आबादी की रफ्तार घटने के बावजूद मुस्लिम आबादी बढ़ने का प्रतिशत हिंदुओं की तुलना में ज्यादा रहा।

व्हाट्सऐप युनिवर्सिटी के जरिये भारत में मुस्लिम आबादी के बारे में अनाप-शनाप फैलाया जा रहा है। बताया जा रहा है कि पाकिस्तान में 24 फीसदी हिंदू थे जो दो फीसदी रह गये जबकि भारत में मुस्लिम 24 फीसदी हो गए।

हक़ीक़त ये है कि 2011 की जनगणना के मुताबिक भारत में मुस्लिम आबादी 14.2% है।

जैसा कि इस लेख की शुरुआत में ही कहा गया है कि पाकिस्तान में हिंदुओं पर अत्याचार होते हैं लेकिन इस आधार पर वहाँ हिंदुओं की आबादी घटने के बारे में झूठ बोलने को जायज़ नहीं ठहरा या जा सकता। जैसे कि हिंदुस्तान को लिंचिस्तान बनाने की तमाम कोशिशों के बावजूद द्विराष्ट्रवाद के सिद्धांत को खारिज करने वाले भारत की तुलना इसी सिद्धांत की बुनियाद पर खड़े पाकिस्तान से नहीं की जा सकती।

लेखक : ऋषिकेश शर्मा 

जेएनयू फिलहाल अपने दौर की सबसे बड़ी लड़ाई लड़ रहा है। यह शिक्षा के निजीकरण और बाजारीकरण के ख़िलाफ़ लड़ाई है। 

देशभर में अपने अकादमिक शोध के लिए सबसे चर्चित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय इन दिनों अपने सबसे बुरे दौर से गुज़र रहा है। एकाएक 1000% तक की फ़ीस वृद्धि और कर्फ्यू टाइमिंग के ख़िलाफ़ यहां के छात्र पिछले तीन सप्ताह से आंदोलनरत हैं। जेएनयू पिछले तीन सप्ताह से कम्प्लीट स्ट्राइक पर है और छात्र रोज़ाना प्रदर्शन कर के अपना विरोध दर्ज करा रहे हैं।

जेएनयू को इस लड़ाई में अब तक देश-विदेश के 150 से भी ज़्यादा शिक्षण संस्थानों का समर्थन मिला है। इनमें ऑक्सफोर्ड, कैम्ब्रिज और हारवर्ड विश्वविद्यालय भी शामिल हैं। पिछले दिनों देश के सभी IIT में फ़ीस को दस गुना तक बढ़ा दिया गया था लेकिन विरोध की आवाज़ें दबी रह गयीं। उत्तराखंड में आयुर्वेदिक मेडिकल कॉलेज की फ़ीस बढ़ोतरी के ख़िलाफ़ छात्र पिछले डेढ़ महीने से आंदोलन कर रहे हैं। बिना किसी नियम का पालन किये हुए फ़ीस को ढाई गुना बढ़ाकर 80 हज़ार से 2 लाख 15 हज़ार कर दिया गया।

ये खबरें अखबारों के पहले पन्ने पर कभी जगह नहीं बना पाईं, लेकिन जेएनयू में हुई फ़ीस वृद्धि ने इन खबरों की तरफ़ देश का ध्यान आकर्षित किया है। इसे देखते हुए IIT-BHU में भी छात्रों ने फ़ीस वृद्धि के ख़िलाफ़ प्रदर्शन किया। जेएनयू के प्रोफेसरों और छात्रों ने सरकार की नई शिक्षा नीति के ख़िलाफ़ मंडी हाउस से जंतर-मंतर तक एक मार्च निकाला था जिसमें दिल्ली विश्वविद्यालय, अंबेडकर विश्वविद्यालय और जामिया मिलिया के छात्र भी शामिल हुए थे। इसे देखते हुए कहा जा सकता है शिक्षा के निजीकरण के ख़िलाफ़ अब एक मुकम्मल लड़ाई छिड़ चुकी है।

जेएनयू छात्रसंघ के नेतृत्व में जेएनयू के छात्रों ने सोमवार को संसद मार्च का आह्वान किया है। जेएनयू, उत्तराखंड के आयुर्वेदिक कॉलेजों, आइआइटी और अन्य विश्वविद्यालयों में फ़ीस वृद्धि के ख़िलाफ़ इस मार्च में दिल्ली विश्वविद्यालय और जामिया मिलिया इस्लामिया के छात्र भी शामिल हो सकते हैं।

फरवरी में आयी CAG की रिपोर्ट बताती है कि शोध और विकास के क्षेत्र को जारी किए गए फंड में से 7298 करोड़ रुपया अब तक खर्च नहीं हो पाया है। सरकार ने कॉरपोरेट क्षेत्र को अब तक 5.7 लाख करोड़ का लोन माफ़ किया है और 4 लाख करोड़ की टैक्स रियायत दी है। फिर सवाल उठता है कि सार्वजनिक शिक्षा के लिए उसके पास पैसा क्यों नहीं है? इन्हीं सवालों को लेकर छात्र संसद की तरफ़ अपने कदम बढ़ाएंगे।

सोमवार से ही संसद का शीत सत्र भी शुरू हो रहा है। सांसदों से भी छात्रों को काफी उम्मीद है। जेएनयू के मुद्दे पर विपक्ष के कई नेताओं ने ट्वीट किया था। अखिलेश यादव, तेजस्वी यादव और मनोज झा सहित कई नेताओं ने इस पर केंद्र सरकार की आलोचना की थी। मनोज झा राज्यसभा से सांसद हैं और इन सवालों को पहले भी संसद में बखूबी उठाते रहे हैं। छात्रों को इनसे खास उम्मीद है।

जेएनयू में इन्हीं मुद्दों को लेकर इतवार को एक टॉक शो आयोजित किया गया जिसमें मनोज झा ने छात्रों को आश्वस्त किया। कांग्रेस से राज्यसभा सांसद अखिलेश प्रसाद सिंह ने मीडियाविज़िल से बात करते हुए संसद में फीस वृद्धि का सवाल उठाने पर हामी भरी है।

असल मुद्दा यह था कि जेएनयू की IHA मीटिंग में अलोकतांत्रिक तरीके से हॉस्टल का नया ड्राफ़्ट मैन्युअल लाया गया। इसके लागू होने के बाद हॉस्टल फ़ीस, जो पहले 20 और 10 रुपये थी, उसे 600 और 300 रुपये प्रतिमाह कर दिया गया। छात्रों को अब रखरखाव का चार्ज 1700 रुपये प्रतिमाह देना होगा, जो पहले था ही नहीं। बिजली और पानी का बिल भी छात्रों पर ही फाड़ा जाएगा। मेस का एकमुश्त सिक्योरिटी भुगतान भी 5500 से बढ़ाकर 12 हज़ार रुपये कर दिया गया। सारे खर्च को जब जोड़ा गया तो देश में सबसे सस्ती और बेहतर शिक्षा के लिए मशहूर जेएनयू अचानक सबसे महंगी पब्लिक फंडेड यूनिवर्सिटी बन गया। मैन्युअल में और भी कई बातें थीं जिनको लेकर विरोध शुरू हो गया।

जेएनयू हमेशा से अपनी आज़ादी के लिए जाना जाता रहा है, लेकिन प्रशासन ने यहां हॉस्टल में 11:30 बजे रात के बाद प्रवेश पर दंड लगाने का फरमान सुना दिया। यहां की सेंट्रल लायब्रेरी चौबीसों घंटे सातों दिन खुली रहती है। इसका मतलब है कि छात्र कभी भी हॉस्टलों से बाहर निकल सकते थे। नए फ़ऱमान के बाद छात्रों को अंदेशा हो गया कि रात में लायब्रेरी बंद करने का फैसला भी प्रशासन जल्द ही कर सकता है। मैन्युअल में लड़कियों के लिए प्रॉपर ड्रेस कोड की बात भी कही गयी है। जेएनयू के सबसे ऊंचे नेचुरल व्यू पॉइंट पार्थसारथी रॉक्स (PSR) को भी एडमिनिस्ट्रेशन ने बंद करवा दिया।

सबसे हैरान कर देने वाली बात ये थी कि इसे जेएनयू छात्रसंघ और जेएनयू अध्यापक संघ को बैठक में शामिल किये बिना अलोकतांत्रिक तरीके से पास कर दिया गया। IHA की बैठक में प्रशासन ने छात्रों और अध्यापकों की तरफ़ से निर्वाचित दोनों संगठनों को नहीं बुलाया और मैन्युअल को पास कर दिया। छात्रों ने एकाएक लगायी गयी इतनी सारी पाबंदियों का विरोध शुरू कर दिया। जैसे-जैसे प्रशासन अड़ता गया, आंदोलन बढ़ता गया।

लेखक : मुशर्रफ अली

जिन शहरों को स्मार्ट बनाने के लिये परियोजना के पहले चरण में चुना गया है वहाँ के महापौर और नगर निगम के मुख्य अधिकारियों को वीडियो के द्वारा जो दो शहर दिखाये जा रहे है उनमें से एक स्पेन का शहर ‘बार्सिलोना’ है और दूसरा संयुक्त अरब अमीरात की राजधानी आबूधाबी के निकट तैयार हो रहा शहर ‘मसदर’ है। जैसे कोई बिल्डर अपनी किसी हाउसिंग परियोजना में नमूने के तौर पर कुछ मकान बनाकर उसे ग्राहकों को दिखाने के लिये रखता है बिल्कुल इसी तरह स्मार्ट सिटी निर्माण के व्यापार से बनाकर उसे ग्राहकों को दिखाने के लिये रखता है। बिल्कुल इसी तरह स्मार्ट सिटी निर्माण के व्यापार से जुड़ी बहुराष्ट्रीय कम्नियां ‘बार्सिलोना’ और ‘मसदर’ को दिख रही हैं। भारत जैसे विकासशील देश के निवासियों के लिये जिन्होने इस तरह के स्वचलित व सुविधासम्पन्न शहर देंखे नहीं हैं, उनके लिये यह दोनो शहर, किसी चमत्कार से कम नहीं है। नव्वे के दशक के बाद जन्में मध्य वर्ग के लिये तो यह शहर किसी सपने के पूरे होने जैसे है। लेकिन इस चकाचैंध भरे सपने के पीछे कहीं कोई अंधकार भी छिपा है। इस सवाल पर सम्भवतः अभी गौर नहीं किया गया है।

जैसा कि कहा जा रहा है कि भारत में जो शहर स्मार्ट सिटी बनने जा रहे है वह ‘बार्सिलोना’ और ‘मसदर’ की टक्कर के होंगे यह बात सुनने में बहुत अच्छी लगती है लेकिन क्या भारत, स्पेन व संयुक्त अरब अमीरात के समान विकसित, ‘मानव विकास सूचकांक और प्रति व्यक्ति वार्षिक आय’ के मामले में उनके जैसा नहीं बल्कि क्या उनके आस-पास भी पहुंच चुका है? स्मार्ट सिटी परियोजना को स्वीकार करने से पहले इस सवाल का जवाब हमें जरूर तलाश लेना चाहिये।

सच्चाई यह है कि भारत मानव विकास सूचकांक और प्रति वार्षिक आय के मामले में स्पेन व संयुक्त अरब अमीरात से पीछे ही नहीं बहुत पीेछे है। सात अरब सुल्तानों की सल्तनत जिसे संयुक्त अरब अीमरात कहा जाता है उसकी कुल आबादी 93 लाख 46 हजार यानि एक करोड़ से भी कम है। मानव विकास सूचकांक में शामिल 187 देशोें की सूची में वह 40 वें पायदान पर है। उसकी प्रति व्यक्ति वार्षिक आय 44770 डालर है यानि 67 का डालर लगाये तो लगभग ढाई लाख रूपये मासिक।

स्पेन की कुल आबादी 4 करोड 64 लाख है और मानव विकास सूचकांक में वह 27 वें पायदान पर है। उसकी प्रति व्यक्ति वार्षिक आय 26517 डालर यानि 1 लाख 48 हजार रूपये मासिक है। भारत की आबादी 124 करोड़ और मानव विकास सूचकांक में वह 135 वेें पाय पर है। प्रति व्यक्ति वार्षिक आय 1928 डालर यानि कुल 10764 रूपये मासिक है।

 

            उपरोक्त आधार पर हम भारत के लोग जिनकी प्रति व्यक्ति मासिक आय कुल पौने ग्यारह हजार रूपये है स्पेन के डेढ़ लाख रूपये व संयुक्त अरब अमीरात के ढाई लाख रूपये मासिक आय वाले व्यक्ति से होड़ कर रहे है। आप स्वंय देख सकते है कि वह न केवल मासिक आय बल्कि मानव विकास सूचकांक के मामले में हम से आगे ही नहीं काफी आगे है। हमारे लिये यह फैसला पूरी तरह नासमझाी भरा होगा कि हम बिना अपनी आमदनी बढ़ाये स्मार्ट सिटी क्षेत्र में उनका मुकाबला करें । अगर हम कर्ज़ लेकर उनकी होड़ करेंगे तो भविष्य में भारी आर्थिक संकट में फँस जायेंगे। यह भी हो सकता है कि हमें इस की कीमत कई पीढ़ियों की गुलामी के रूप में चुकानी पड़े। जिन्होने हमें दौसौ साल तक गुलाम बनाये रखा उन्हे भारत छोड़कर गये अभी सात दशक भी नहीं बीते हैं, उनकी याद में उस दौर में की गयी लूट की यादें अभी भी ताजाा है इसलिये वह फिरसे भारत को गुलाम बनाने के लिये मौके का इन्तिजार कर रहे । ‘स्मार्ट सिटी’ ऐसी परियोजना है जो उन्हे आसानी से यह मौका उपलब्ध करा देगी।

 

            संयुक्त अरब अमीरात की राजधानी अबुधाबी जिसकी आबादी डेढ़ करोड़ है, वह देश की अर्थव्यवस्था में 2/3 भाग यानि 40 हजार करोड़ डालर जोड़ती है। यह भारत की कुल सालाना आय का 1/5 भाग होता है। अगर इतनी आय वाला शहर अपने किसी कोने में कुल 6 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में ‘मसदर’ नाम की ‘स्मार्ट सिटी’ बना भी लेता है तो क्या भारत को उसकी नकल करनी चाहिये। यह स्मार्ट सिटी भी 2008 से बनना शुरू हुयी और 2025 में जाकर जब पूरी होगी तब 2200 करोड़ डालर यानि लगभग डेढ़ लाख करोड़ रूपये खर्च करके कुल पचास हजार लोगों की आबादी के रहने का प्रबन्ध इसमें हो पायेगा जबकि भारत सरकार ने इस एक स्मार्ट सिटभ् के बजट से 1/3 भाग कम बजट कुल 48 हजार करोड़ रूपया 100 स्मार्ट सिटी बनाने के लिये आवंटित किया है।

 

            ‘मसदर’ के अलावा जो दूसरी स्मार्ट सिटी, नमूने के तौर पर पेश की जा रही है वह है स्पेन की ‘बार्सिलोना’ । इस तरह की स्मार्ट सिटीज बनाने का किसी देश की अर्थव्यवस्था पर क्या प्रभाव पड़ता है उसे जानने के लिये आपको स्पेन नहीं जाना होगा बल्कि आपको अपने इन्टरनेट से जुड़े मोबाईल फोन या कम्प्यूटर पर किसी भी सर्च इन्जन में ‘कौज़ आॅफ़ एकोनोमिक क्राईसेस इऩ स्पेन ’ भरना होगा। उस मात्र इतना कर देने से स्पेन के निर्माण उद्योग (रियल स्टेट) की सच्चाई आपके सामने आ जायेगी। बार्सिलोना उसी निर्माण उद्योग का हिससा है। अगर हम केवल स्पेन के आर्थिक संकट का अध्ययन कर लें तो भविष्य में भारत में इस स्मार्ट सिटीज़ परियोजना के कारण क्या घटने वाल है उसे जान जायेंगे। आईये हम संक्षेप में ‘भवन निर्माण’ से जुड़े स्पेन के आर्थिक संकट को समझने का प्रयास करते है।

 

            सोवियत संघ के बिर जान के बाद 90 के दशक में जब दुनियाभर में नवउदारवाद के नाम से नई आर्थिक नीतियां लागू की जा रही थीं तब विश्व बैंक व अन्तर्राष्ट्रीय मुद्राकोष से जुड़े अर्थशास्त्री, कर्ज पर आधारित ऐसी निर्माण परियोजनायें बेचने में लगे हुये थे जिनसे न केवल इस उद्योग से जुडे़ बहुर्राष्ट्रीय कम्पनियों को रोजगार मिल सके बल्कि इन अन्तर्राष्ट्रीय कर्ज़दाता एजेन्यिों का ब्याज पर आधारित कारोबार भी फल-फूल सके। विश्व में जारी इसी योजना के क्रम में स्पेन ने जब अपने यहाँ ‘रियल स्टेट की शुरूआत की तो अर्थव्यवस्था में यकायक उछाल आ गया। जब आप अपने रहने के लिये ‘रियल स्टेट’ में पैसा लगाते है तो वह एक सही उद्देश्य होता है लेकिन जब आप इसमें व्यापार के मकसद से पंूजी निवेश करते है तो उससे शुरू में अर्थव्यवस्था में एक नकली उछाल पैदा होता है। लोगों की निवेश करते है तो उससे शुरू में अर्थव्यवस्था में एक नकली उछाल पैदा होता है। लोगों की निवेश करने की अपनी प्राथमिकतायें होती है लेकिन जब सरकार यह चाहे कि लोग अपनी प्राथमिकतायें छोड़कर उसके द्वारा पैदा की गयी बनावटी या गैरजरूरी प्राथमिकताओं मं अपनी जमा या उधार लकर पंूजी निवेश करें तो उसके लिये उसे वित्तीय क्षेत्र में तरह-तरह का प्रोत्साहन देना पड़ता है। स्पेन के ‘भवन निर्माण क्षेत्र’ में ‘नकली मांग’ पैदा करने के लिये सरकार ने बैंको द्वारा कर्ज देने की भरी छूट पर आधारित योजनायें आरम्भी की। इससे सम्पत्ति की कीमतों में वृद्धि होने लगी। 1985 से 1991 के बीच वहाँ ज़मीन और मकानों की कमीते तीन गुना हो गयी । 1992 से 1996 की बीच स्थिर रहकर यह फिर 1996 से 2007 के बीच 200 प्रतिशत बढ़ गयी। इधर बैंको द्वारा रियायती कर्ज़ बाँटने से वर्ष 2000 से 2008 के बीच स्पेनिश परिवारों पर कर्ज 260 बिलियन यूरों से बढ़कर 900 बिलियन यूरो हो गया गया और यह 25 प्रतिशत वार्षिक की दर से बढ़ने लगा। उधर औद्योगिक कम्पनियों पर यह कर्ज़ एक लाख करोड़ यूरो हो गया और इस अवधि में स्पेन का निजी क्षेत्र जी.डी.पी. का 290 प्रतिशत कर्ज़दार था। इस कर्ज के पैसे ने खर्च करने की प्रवृत्ति बढ़ा दी, लाग अपनाप -शनाप खर्च करने लगे जिससे बाजार में बिगाड़ पैदा हो गया। उधर सम्पत्ति कारोबार में आयी तेजी ने सरकार की कर राजस्व प्राप्ती आकाश पर पहुँचा दी और इससे जी.डी.पी. की वार्षिक वृद्धि दर बढ़ गयी। इस वृद्धि को अपनी नीतियों की कामियाबी समझकर व इससे उत्साहित होकर सरकार ने वित्तीय क्षेत्र को ढील देदी और बैंकिंग व्यवस्थ्ज्ञा पर निगरानी रखने वाली संस्था, ‘इन्टरनेशनल एकाउटिंग स्टेन्डर्ड बोर्ड’ द्वारा निर्धारित मानकों की अवहेलना करने की बैंको को इजाज़त देदी गयी। निगरानी में दी गयी इस ढील के कारण बैंक अपने घाटे और मुनाफे में आ रहे उतार -चढ़ाव को छुपाने लगे । वह नियंत्रकों, विश्लेषककों और निवेशकों को गुमराह करने लगे । जैसे भारत में आजकल बैंक, कारपोरेट द्वारा कर्ज़ वापस नहीं करने से निर्मित गैर निष्पादित सम्पत्ति यानि ‘एन.पी..ए.’ को रिस्ट्रकचरिंग’ व राईट आॅफ’ के माध्यम से छुपा रहे है। बिल्कुल यही तरीका स्पेन के बैंक अपनाने लेग । बैंको द्वारा किये जाने वाले ‘रिस्ट्रकचरिंग का मतलब होता है कि कर्ज़दार को और नया कर्ज़ देकर उसमें वसूला नहीं जाने वाला कर्ज जोड़कर उसे एन.पी.ए. से बाहर कर देना। ‘राईट आॅफ’ का मतलब कर्ज को बट्टे - खाते में डाल देना है। लोगों को जो कहा जा रहा था कि सम्पत्ति - बाजार में लम्बी अवधि के लिये किया जाने वाला निवेश लाभदायक सिद्ध होगा वह पूरी तरह छलावा साबित हुआ। इस ‘विकृत आर्थिक प्रोत्साहन’ और प्रचार ने निवेशको के साथ- साथ हज़ारो नौजवानों को गुमराह कर दिया और वह भी अपनी उच्च शिक्षा को छोड़कर आसानी से हासिल इस नकद कमाई में लग गये। उस समय ‘मैकिन्से ग्लोबल इन्सटीटयूट’ ने लिखा कि गृहनिर्माण में आये इस उछाल ने 15 लाख अधिक मकान बना दियये जिन्हे बेचने के लिये एक दशक से ज्यादा का समय दरकार है। इस समय स्पेन के 1 करोड़ 65 लाख परिवारों के पास 2 करोड़ 20 लाख मकान थे। यह 2001 से 2007 की अवधि के बीच बनये गये थे जिनमें से 28 प्रतिशत खाली है। इस स्थिति ने सम्पत्ति की कीमतों में गिरावट ला दी।  2007 से 2013 के बीच सम्पत्ति की कीमते 30 प्रतिशत नीचे चली गयी और 2015 में यह गिरावट 50 प्रतिशत हो गयी। 2008 की तीसरी तिमाही में रिसल स्टेट का यह गुब्बारा फूट गया और सम्पत्ति बाजार धड़ाम से नीचे आ गिरा । यह स्पेन की महामंदी की शुरूआत थी। इसका सबसे खराब असर बैंकों को दीवालियों होने से बचाने के लिये सरकार ने बांड जारी किये  और कर्ज़ लेने के लिये आवेदन किया लेकिन स्पेन की कर्ज़ साख को अन्तर्राष्ट्रीय रेटिंग एजेन्सियों ने ‘ट्रिपल ऐ ’ से गिराकर ‘ट्रिपल बी’ कर दिया जिससे वित्तीय संस्थायें डनहे कर्ज़ देने से कतराने लगी। मंदी ने कर राजस्व में गिरावट ला दी। उद्योग दिवालिया होने की दर 900 उद्योग प्रति वर्ष थी जो बढ़कर 5000 प्रति वर्श हो गयी इसने बेरोजगारी को जन्म दिया। अप्रैल 2012 में वहाँ 56 लाख लोग बेरोजगार थे इनमें नौजवानों की संख्या 50 प्रतिशत थी। निर्माण क्षेत्र में आयी तेजी ने 2007 में 9 लाख नये रोजगार पैदा किये थे लेकिन लेकिन मंदी के पहले ही दो सालों में 8 लाख रोजगार समाप्त हो गये जनता की खरीदने की शक्ति घट जाने से कर्ज़ देने का व्यापार सिकुड़ गया और मंदी ने व्यापार में कर्ज 991 बिलियन यूरो से घटकर 485 बि0 यूरो रह गया । कारोबार में आयी इस महामंदी ने स्पेन का चालूखाता घटा बढ़ा दिया लेकिन यह स्ज्ञििति भी ज्यादा देर टिक नही पायील क्योंकि वस्तुओं की आन्तरिक मांग न रहने से चालू खता घाटा 10 प्रतिशत से घटकर 5 पांच प्रतिशत रह गया। उधर मुद्रास्फीति दर या मंहगाई -दर 2013 मं शून्य पर गा गयी और फिर 2014 मं शून्य से 1 प्रतिशत नीचे चली गयी । 2012 में स्पेन ने ‘यूरोपियन स्टेबिलिटी मैकेनिज्म’ से 100 बिलियन यूरो कर्ज प्राप्त किया। कर्ज के साथ ‘मितव्यता’ की शर्तें लागू हुयी जिसके अनुपालन में स्पेन सरकार ने जनकल्याणकारी बजट में कटौती कर दी, कर्मचारियों के वेतन - भत्ते जाम कर दिये गये, बैंको की ब्याज दर कम कर दी और ‘वैट’ बढ़ा दिया गया। मितव्यता उपायों से संकट और घनीभूत हो गया। जनता सरकार के खिलाफ सड़क पर उतर आयी और विरोध प्रदर्शन शुरू हो गया।

 

            जिस तरह आज भारत में ‘रियल स्टेट’ संकट में है और पूरे देश में 6 लाख मकान बिक नही पा रहे हैं स्पेन की हालात इससे कई गुना खराब है। भारत में जो लोग ‘बार्सिलोना’ को स्मार्ट सिटी के माॅडल के रूप में पेश कर रहे हैं वह यह नीं दिखा रहे हैं कि उससे 650 किलोमीटर की दूरी पर ‘सेसेना’ नामक अन्य नगर है जहाँ 30 हजार लोगों के लिये 13 हजार अपार्टमेन्ट बनाने की योजना शुरू की गयी थी लेकिन पाँच साल बाद केवल 5100 बन पाये हैं और उसमें भी केवल 20 प्रतिशत बिक पाये हैं। राजधानी मेड्रिड से एक घन्टे की और ड्राईव पर ‘येबेस’ नगर है है वहाँ 30 हजार लोगों के लिये 9000 मकान बनने थे केवल 1500 तैयार हो पाये हैं और उसमें भी केवल तीन हज़ार लोग बस पाये है। ‘सियूडाड रियल एयापोर्ट और कास्टेेलोना कोस्टा अजहर एयरपोट’ जो 1100 करोड़ यूरो से बनाये गये थे वह वीरान पड़े है।

 

            अमरीका में 2008 में आयी महामंदी का कारण ही ‘भवन निर्माण ’ के गुब्बारे को फुलाया जाना है। यह अमरीका का ‘गिरवी संकट’ (सबप्राईम- मार्टगेज क्राइसेस) कहलाता है। दुनिया इससे अभी उभर नहीं पायी है फिर भी इस कारोबार से जुड़ी बहुराष्ट्रीय कम्पनियां अपने प्रभाव वाले राजनेताओं, पार्टियों को इस परियोजना को अपने देश में लोग करने के लिये तैयार करने में लगी हुयी है। अधिकतर दक्षिणपंथी विचारधारा वाले राजनेता और पार्टियां इस परियोजना को अपने यहाँ लागू कर रही है। भारती भी उसमें से एक है जिसने इन कम्पनियों की परियोजना को मंजूर कर लिया है। सरकार ने पांच सल के लिये 100 स्मार्ट सिटी का बजट 4800 करोड़ रखा है जबकि ‘स्मार्ट कौन्सिल आॅफ इन्डिया’ के संस्थापक व निदेशक दिलीप पडोडे ने बीस साल तक तीन लाख करोड़ रूपये प्रतिवर्ष खर्च आने का अनुमान लगाया है। जो सरकार पैसे न होने का तर्क देकर पूरे देश के स्वास्थ्य यानि ‘नेशनल हैल्थ मिशन’ का बजट कुल 18875 करोड़ रूपये रखती है वह हर साल स्मार्ट सिटी परियोजना के लिये तीन लाख करोड़ रूपेये कहाँ से लायेगी। ज़ाहिर है यह सब कर्ज़ पर आधारित होगा। हमपर पहले ही मार्च 2015 तक विदेशी कर्ज़ 475.8 बिलियन डालर है जो जी.डी.पी. का 23.8 प्रतिशत है। इसके अलावा हमारा व्यापार घाटा 685 करोड़ डालर पहुंच चुका है ऐसे हालात में स्मार्ट सिटीज के लिये विदेशों से डिजिटल उपकरण मंगाने पर व्यापार घाटा जो अभी जी.डी.पी. का डेढ़ प्रतिशत है वह बढ़कर आकाश छूने लगेगा। उधर तीन लाख करोड़ रूपये मासिक अतिरिक्त खर्च के लिये विदेशी कर्ज़ विदेशी कर्ज़ हमारी रीढ़ तोड़ देगा। इस कर्ज के बदले में ‘मितव्यता - उपाय’ की और शर्ते लागू होगी जिससे समाज में हाहाकार मच जायेगा।

मीडिया और ‘ज्ञानी’ बुद्धिजीवी मेरिट के हनन के लिए आरक्षण को कोसते नहीं थकते पर सच कुछ और ही  है। पिछले साल यानी 2017 में कुल मेडिकल में 57, 000 छात्र/छात्राओं के दाखिले संबंधी विस्तृत अध्ययन में पत्रकार रीमा नागराजन ने दिखाया है कि जाति - आधारित आरक्षण नहीं बल्कि पैसा हमारे देश में मेडिकल प्रवेश में योग्यता से समझौता करने का सबसे प्रभावी औजार है।

देश मे मेडिकल कॉलेजों में दाखिला ‘नीट’ की परीक्षा के जरिए होता है। लेकिन आपका दाखिला कितने ‘नीट’ परीक्षा स्कोर पर होगा यह इस बात पर निर्भर करेगा की आपकी जेब में कितना पैसा है जो आप फीस के रूप में सरकारी मेडिकल कॉलेज/मेडिकल शिक्षा की दुकानों को दे सकते है (देखें : नीचे दी गई तालिका) अब इस पर तो शायद कोई भी असहमत नहीं होग की ज्यादा ‘नीट’ स्कोर वाले छात्र को ज्यादा योग्य माना जाना चाहिए। ( ‘नीट’ टेस्ट की उपयोगिता और रिजल्ट में ज्यादा अंक और योग्यता के संबंध में साथियों के अलग - अलग विचार हो सकते है। लेकिन वर्तमान समाज  में जहां उच्च शिक्षा की सुविधाएं बहुत ही कम हैं, वहां इस पर चर्चा की अभी जरूरत नहीं है।

यदि आप सरकारी कॉलेज में पढ़ना चाहते है, जहाँ अभी भी फीस तुलनात्मक रूप से कम है, तो आप को कम कम 332 का ‘नीट’ स्कोर चाहिए।

लेकिन प्राइवेट कालेज में यदि आप उन्नीस लाख रूपए सालाना फीस देने को तैयार हैं तो आपका दाखिला 221 के ‘नीट’स्कोर पर भी हो सकता है।

दिलचस्य यह भी जानना होगा की सरकारी मेडिकल कालेज में एससी/एसटी छात्र का ‘नीट’ स्कोर 365 / 332 है जबकि प्राइवेट मेडिकल कॉलेज  में मैनेजमेंट कोटा जहां सालाना फीस दस लाख रूपए है यहां दाखिले के लिए 315 ‘नीट’ स्कोर चाहिए। और यदि आप बड़ी हैसियत वाले है तथा 19 लाख रूपए