JNU से उठी आवाज़ पहुंच रही है संसद, समझिए फ्लैशबैक में पूरी कहानी Featured

Friday, 29 November 2019 02:03 Written by  Published in जांच पड़ताल Read 109 times

लेखक : ऋषिकेश शर्मा 

जेएनयू फिलहाल अपने दौर की सबसे बड़ी लड़ाई लड़ रहा है। यह शिक्षा के निजीकरण और बाजारीकरण के ख़िलाफ़ लड़ाई है। 

देशभर में अपने अकादमिक शोध के लिए सबसे चर्चित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय इन दिनों अपने सबसे बुरे दौर से गुज़र रहा है। एकाएक 1000% तक की फ़ीस वृद्धि और कर्फ्यू टाइमिंग के ख़िलाफ़ यहां के छात्र पिछले तीन सप्ताह से आंदोलनरत हैं। जेएनयू पिछले तीन सप्ताह से कम्प्लीट स्ट्राइक पर है और छात्र रोज़ाना प्रदर्शन कर के अपना विरोध दर्ज करा रहे हैं।

जेएनयू को इस लड़ाई में अब तक देश-विदेश के 150 से भी ज़्यादा शिक्षण संस्थानों का समर्थन मिला है। इनमें ऑक्सफोर्ड, कैम्ब्रिज और हारवर्ड विश्वविद्यालय भी शामिल हैं। पिछले दिनों देश के सभी IIT में फ़ीस को दस गुना तक बढ़ा दिया गया था लेकिन विरोध की आवाज़ें दबी रह गयीं। उत्तराखंड में आयुर्वेदिक मेडिकल कॉलेज की फ़ीस बढ़ोतरी के ख़िलाफ़ छात्र पिछले डेढ़ महीने से आंदोलन कर रहे हैं। बिना किसी नियम का पालन किये हुए फ़ीस को ढाई गुना बढ़ाकर 80 हज़ार से 2 लाख 15 हज़ार कर दिया गया।

ये खबरें अखबारों के पहले पन्ने पर कभी जगह नहीं बना पाईं, लेकिन जेएनयू में हुई फ़ीस वृद्धि ने इन खबरों की तरफ़ देश का ध्यान आकर्षित किया है। इसे देखते हुए IIT-BHU में भी छात्रों ने फ़ीस वृद्धि के ख़िलाफ़ प्रदर्शन किया। जेएनयू के प्रोफेसरों और छात्रों ने सरकार की नई शिक्षा नीति के ख़िलाफ़ मंडी हाउस से जंतर-मंतर तक एक मार्च निकाला था जिसमें दिल्ली विश्वविद्यालय, अंबेडकर विश्वविद्यालय और जामिया मिलिया के छात्र भी शामिल हुए थे। इसे देखते हुए कहा जा सकता है शिक्षा के निजीकरण के ख़िलाफ़ अब एक मुकम्मल लड़ाई छिड़ चुकी है।

जेएनयू छात्रसंघ के नेतृत्व में जेएनयू के छात्रों ने सोमवार को संसद मार्च का आह्वान किया है। जेएनयू, उत्तराखंड के आयुर्वेदिक कॉलेजों, आइआइटी और अन्य विश्वविद्यालयों में फ़ीस वृद्धि के ख़िलाफ़ इस मार्च में दिल्ली विश्वविद्यालय और जामिया मिलिया इस्लामिया के छात्र भी शामिल हो सकते हैं।

फरवरी में आयी CAG की रिपोर्ट बताती है कि शोध और विकास के क्षेत्र को जारी किए गए फंड में से 7298 करोड़ रुपया अब तक खर्च नहीं हो पाया है। सरकार ने कॉरपोरेट क्षेत्र को अब तक 5.7 लाख करोड़ का लोन माफ़ किया है और 4 लाख करोड़ की टैक्स रियायत दी है। फिर सवाल उठता है कि सार्वजनिक शिक्षा के लिए उसके पास पैसा क्यों नहीं है? इन्हीं सवालों को लेकर छात्र संसद की तरफ़ अपने कदम बढ़ाएंगे।

सोमवार से ही संसद का शीत सत्र भी शुरू हो रहा है। सांसदों से भी छात्रों को काफी उम्मीद है। जेएनयू के मुद्दे पर विपक्ष के कई नेताओं ने ट्वीट किया था। अखिलेश यादव, तेजस्वी यादव और मनोज झा सहित कई नेताओं ने इस पर केंद्र सरकार की आलोचना की थी। मनोज झा राज्यसभा से सांसद हैं और इन सवालों को पहले भी संसद में बखूबी उठाते रहे हैं। छात्रों को इनसे खास उम्मीद है।

जेएनयू में इन्हीं मुद्दों को लेकर इतवार को एक टॉक शो आयोजित किया गया जिसमें मनोज झा ने छात्रों को आश्वस्त किया। कांग्रेस से राज्यसभा सांसद अखिलेश प्रसाद सिंह ने मीडियाविज़िल से बात करते हुए संसद में फीस वृद्धि का सवाल उठाने पर हामी भरी है।

असल मुद्दा यह था कि जेएनयू की IHA मीटिंग में अलोकतांत्रिक तरीके से हॉस्टल का नया ड्राफ़्ट मैन्युअल लाया गया। इसके लागू होने के बाद हॉस्टल फ़ीस, जो पहले 20 और 10 रुपये थी, उसे 600 और 300 रुपये प्रतिमाह कर दिया गया। छात्रों को अब रखरखाव का चार्ज 1700 रुपये प्रतिमाह देना होगा, जो पहले था ही नहीं। बिजली और पानी का बिल भी छात्रों पर ही फाड़ा जाएगा। मेस का एकमुश्त सिक्योरिटी भुगतान भी 5500 से बढ़ाकर 12 हज़ार रुपये कर दिया गया। सारे खर्च को जब जोड़ा गया तो देश में सबसे सस्ती और बेहतर शिक्षा के लिए मशहूर जेएनयू अचानक सबसे महंगी पब्लिक फंडेड यूनिवर्सिटी बन गया। मैन्युअल में और भी कई बातें थीं जिनको लेकर विरोध शुरू हो गया।

जेएनयू हमेशा से अपनी आज़ादी के लिए जाना जाता रहा है, लेकिन प्रशासन ने यहां हॉस्टल में 11:30 बजे रात के बाद प्रवेश पर दंड लगाने का फरमान सुना दिया। यहां की सेंट्रल लायब्रेरी चौबीसों घंटे सातों दिन खुली रहती है। इसका मतलब है कि छात्र कभी भी हॉस्टलों से बाहर निकल सकते थे। नए फ़ऱमान के बाद छात्रों को अंदेशा हो गया कि रात में लायब्रेरी बंद करने का फैसला भी प्रशासन जल्द ही कर सकता है। मैन्युअल में लड़कियों के लिए प्रॉपर ड्रेस कोड की बात भी कही गयी है। जेएनयू के सबसे ऊंचे नेचुरल व्यू पॉइंट पार्थसारथी रॉक्स (PSR) को भी एडमिनिस्ट्रेशन ने बंद करवा दिया।

सबसे हैरान कर देने वाली बात ये थी कि इसे जेएनयू छात्रसंघ और जेएनयू अध्यापक संघ को बैठक में शामिल किये बिना अलोकतांत्रिक तरीके से पास कर दिया गया। IHA की बैठक में प्रशासन ने छात्रों और अध्यापकों की तरफ़ से निर्वाचित दोनों संगठनों को नहीं बुलाया और मैन्युअल को पास कर दिया। छात्रों ने एकाएक लगायी गयी इतनी सारी पाबंदियों का विरोध शुरू कर दिया। जैसे-जैसे प्रशासन अड़ता गया, आंदोलन बढ़ता गया।

Last modified on Friday, 29 November 2019 02:15