नागरिकताः मोदी थोड़ी हिम्मत करें

डॉ. वेदप्रताप वैदिक

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज रामलीला मैदान में जो भाषण दिया, यदि वे उसकी भावना पर ठीक से अमल करें तो आज देश में जो उपद्रव हो रहा है वह बंद हो जाएगा। वह होता ही नहीं। आज भी वह बंद हो सकता है, बशर्ते कि वे नागरिकता संशोधन विधेयक को अपने भाषण के अनुरुप बना लें। उन्होंने कहा कि हम देश की किसी भी जाति, मजहब, संप्रदाय और वर्ग के विरुद्ध नहीं हैं। हमने दिल्ली की सैकड़ों कालोनियां वैध कीं, करोड़ों लोगों को गैस कनेक्शन दिए और सार्वजनिक हित के जितने भी काम किए, क्या कभी उससे उसकी जाति या धर्म पूछा ? इसमें शक नहीं कि यह बात ठीक है लेकिन क्या भारत की कोई सरकार जाति या धर्म के आधार पर भेदभाव करे तो उसका कुर्सी पर टिके रहना असंभव नहीं हो जाएगा ? यह जो नागरिकता संशोधन कानून सरकार ने बनाया है, इसका दोष यही है कि इसमें धार्मिक आधार पर स्पष्ट भेदभाव है। यह तो बहुत अच्छा है कि कुछ पड़ौसी मुस्लिम देशों के हिंदू, सिख, ईसाई, जैन, बौद्ध और पारसी लोगों को, यदि वे उत्पीड़ित हैं तो उन्हें शरण देने की घोषणा भारत सरकार ने की है। ऐसा करके सरकार ने गांधी, नेहरु, मनमोहनसिंह और अशोक गहलौत की इच्छा को साकार किया है लेकिन इस सूची में से मुसलमानों का नाम निकालकर नरेंद्र मोदी ने घर बैठे मुसीबत मोल ले ली है। इस प्रावधान से भारतीय मुसलमानों का कुछ लेना-देना नहीं है लेकिन इसने गलतफहमी का ऐसा अंबार खड़ा कर दिया है कि उसमें भारत के मुसलमान और हिंदू एक होकर आवाज उठा रहे हैं। सारे देश में हिंसा फैल रही है। पिछले साढ़े पांच साल में मोदी सरकार के विरुद्ध जिसे भी जितना भी गुस्सा है, वह अब इस कानून के बहाने फूटकर बाहर निकल रहा है। देश में फिजूल की हिंसा हो रही है। मोदी सरकार ने निराश और हताश विपक्ष के हाथ में खुद ही एक हथियार थमा दिया है। इस कानून पर संयुक्तराष्ट्र से जनमत संग्रह कराने की मूर्खतापूर्ण मांग भी की जा रही है। इस मामले को इज्जत का सवाल बनाने और देश में अस्थिरता बढ़ाने की बजाय बेहतर यह होगा कि इस नागरिकता कानून में से या तो मजहबों के नाम ही हटा दें या फिर इसमें इस्लाम का नाम भी जोड़ दें। जो भी उत्पीड़ित है, उसके लिए भारत माता की शरण खुली है। प्रत्येक व्यक्ति को गुण-दोष के आधार पर ही भारत की नागरिकता दी जाए। थोक में नागरिकता देना या न देना, दोनों ही गलत है।

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लेखक : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
 
जनरल परवेज मुशर्रफ को देशद्रोह के अपराध में सजा-ए-मौत हो गई। यह अनहोनी है। क्यों है ? क्योंकि आज तक किसी पाकिस्तान की अदालत की यह हिम्मत नहीं हुई कि वह अपने किसी फौजी तानाशाह को देशद्रोही कहे और उसे मौत के घाट उतारने की हिम्मत करे। जनरल अयूब खान, जनरल याह्या खान और जनरल जिया-उल-हक ने जब तख्ता-पलट किया तो पाकिस्तान की न्यायपालिका ने उसको यह कहकर उचित ठहरा दिया कि वह उस समय की मांग थी। मजबूरी थी। उसे ‘डाॅक्ट्रीन आॅफ नेसेसिटी’ कहा गया।
लेकिन आप पूछ सकते हैं कि जनरल मुशर्रफ को यह सजा क्यों सुनाई गई ? इसका एक जवाब तो यह है कि वे मूलतः पाकिस्तानी नहीं हैं। वे मुहाजिर हैं। हिंदुस्तानी हैं। दिल्ली में पैदा हुए हैं। बाकी जनरल पठान और पंजाबी थे। इस दलील में कोई खास दम नहीं है लेकिन मेरी राय है कि जनरल मुशर्रफ के साथ पाकिस्तान के जजों ने अपना बदला निकाला है। जैसा दंगल पाकिस्तान के जजों और वकीलों के साथ मुशर्रफ का हुआ, वैसा किसी भी राष्ट्रपति के साथ नहीं हुआ। मुशर्रफ को यह सजा 1999 में तख्ता-पलट के लिए नहीं दी गई है बल्कि 2007 में आपात्काल थोपने के लिए दी गई है। यह वह समय है, जब मुशर्रफ और पाकिस्तान की न्यायपालिका के बीच तलवारें खिंच गई थीं। मुख्य न्यायाधीश इफ्तिकार मुहम्मद चौधरी को बर्खास्त करने पर राष्ट्रपति मुशर्रफ तुल गए थे। यह घटना भी 2007 की ही है। उन्होंने पहले सेनापति का पद छोड़ा और फिर 2008 में राष्ट्रपति का पद भी ताकि उन पर महाभियोग न चले। 
 
मुशर्रफ आजकल दुबई में रहते हैं। बहुत बीमार हैं। उन्हें 30 दिन का समय मिला है। वे अपील कर सकते हैं। मुझे पूरा विश्वास है कि पाकिस्तान के वर्तमान राष्ट्रपति उनको क्षमादान दे देंगे। एक तो पाकिस्तान की फौज ने अदालत के इस फैसले पर दो-टूक शब्दों में आपत्ति की है। दूसरा, इमरान सरकार भी उनके प्रति सहानुभूति दिखाना चाहेगी। फौज और इमरान का आपसी संबंध काफी घनिष्ट है।  वे उसके विरुद्ध क्यों जाएंगे ? तीसरा, नवाज शरीफ इस बात को भूले नहीं है कि तख्ता—पलट के बाद उन्हें जुल्फिकार अली भुट्टो की तरह फांसी नहीं दी गई बल्कि मुशर्रफ ने उन्हें सउदी अरब में शरण लेने दी। चौथा, पाकिस्तान की जनता यह जानती है कि मुहाजिर होने के बावजूद मुशर्रफ ने हिंदुस्तान की नाक में दम करने की कोई कसर नहीं छोड़ी थी। ऐेसे राष्ट्राध्यक्ष को देशद्रोही कहकर फांसी देना पाकिस्तान का लोकप्रिय कदम नहीं हो सकता। पांचवां, अदालत ने मुशर्रफ को पूरा मौका नहीं दिया कि वे अपना पक्ष उसके सामने रख सकें। इस फैसले का बस एक ही फायदा है। वह यह कि अब पाक में शायद फौजी तख्ता-पलट बंद हो जाएं।
 
मैं खुद कहता हूं कि मुशर्रफ को अभी कुछ साल और जिंदा रहना चाहिए। कुछ माह पहले जब दुबई में मेरी उनसे दो घंटे लंबी भेंट हुई तो मैंने पाया कि वह मुशर्रफ का नया अवतार था। कश्मीर पर पहले अटलजी के साथ और बाद में मनमोहनजी के साथ उनके चार-सूत्री समझौतों को आगे बढ़ाने के लिए उन्होंने बड़ा उत्साह दिखाया। उन्होंने एक विदेशी प्रधानमंत्री से मेरी बात करवाने की कोशिश भी की। यदि भारत-पाक शांति के मामले को आगे बढ़ाने में वे अपना शेष जीवन लगाएं तो शायद असंभव भी संभव हो जाए।
 

डॉ. वेदप्रताप वैदिक

संसद ने कल सर्वानुमति से आरक्षण विधेयक पारित कर दिया। सदन में उपस्थित 352 सदस्यों में से एक की भी हिम्मत नहीं हुई कि इस आरक्षण का विरोध करे। अब 10 साल के लिए नौकरशाही के पैर में बेड़ियां फिर से डाल दी गई है। 70 साल से चल रहे इस आरक्षण का मेरे जैसे लोगों ने 40-50 साल पहले तक डटकर समर्थन किया था। जब प्रधानमंत्री विश्वनाथप्रतापसिंह ने पिछड़ों को आरक्षण दिया, तब तक हम यह नारा लगाते रहे कि ''हम सबने बांधी गांठ। पिछड़े पावे सौ में साठ।।’’ याने सरकारी नौकरियों में अनुसूचितों और पिछड़ों को जमकर आरक्षण दिया जाए ताकि उन पर सदियों से चलते रहे अत्याचार की हम कुछ हद तक भरपाई कर सकें। कई पार्टियों द्वारा आयोजित विशाल जन-सभाओं को भी मैं उन दिनों संबोधित करता रहा लेकिन अब मैं यह अनुभव करता हूं कि सरकारी नौकरियों में से आरक्षण एक दम खत्म किया जाना चाहिए। संसद के सभी सदस्यों द्वारा चली गई यह भेड़चाल बताती है कि हमारे सांसदों को कोई भी कानून बनाते समय जितनी अक्ल लगानी चाहिए, वे नहीं लगाते। यदि कुछ सांसद इस आरक्षण का विरोध करते तो क्या उन्हें संसद से निकाल दिया जाता ? मैं तो समझता हूं कि आरक्षित सीटों से जीते हुए सांसदों को इस आरक्षण का सबसे पहले विरोध करना चाहिए, क्योंकि यह आरक्षण उनके वर्ग में ‘मलाईदार परते’ तैयार कर रहा है। अनुसूचितों और पिछड़ों का यह मलाईदार वर्ग मुश्किल से 10 प्रतिशत भी नहीं है। इस वर्ग के लोग आरक्षित पदों पर पीढ़ी दर पीढ़ी कब्जा करते चले जा रहे हैं। जो सचमुच गरीब हैं, वंचित हैं, पिछड़े हैं, असहाय हैं, निरुपाय हैं, वे अब भी वैसे ही हैं, जैसे सदियों पहले थे। उनके बच्चों को न पढ़ने की सुविधा है, न ही उनकी सेहत की ठीक देखभाल हो पाती है और न ही समाज में उनकी समुचित प्रतिष्ठा है। वे जो शारीरिक श्रम करते हैं, उसकी कीमत भी आज बहुत कम है। इसीलिए समतामूलक समाज बनाने के लिए सबसे ज्यादा जरुरी यह है कि शारीरिक श्रम और बौद्धिक श्रम की कीमतों में जो खाई है, उसको पाटा जाए। यदि ऐसा हम कर सके तो लोग सफेदपोश नौकरियों में जाकर दुम हिलाने की बजाय अपनी मेहनत-मजदूरी से आत्म-सम्मान की जिंदगी क्यों नहीं जिएंगे ? इसके अलावा जातिगत भेदभाव के बिना शिक्षा और चिकित्सा हर गरीब और वंचित परिवार को न्यूनतम कीमत पर उपलब्ध करवाई जाए तो ये ही लोग आरक्षण की भीख से मिलनेवाले पदों पर थूक देंगे। क्या उनका अपना स्वाभिमान नहीं है ? अपने स्वाभिमान की रक्षा के लिए अनुसूचितों और पिछड़ों को खुद आगे आना चाहिए। हमारे सारे नेता मजबूर हैं। वे वोट और नोट के गुलाम हैं। वे अनंतकाल तक जातिगत आरक्षण का समर्थन करते रहेंगे।

लेखक : डॉ वेद प्रताप वैदिक 

केंद्र सरकार में एक से एक अनुभवी और पढ़े-लिखे लोग हैं लेकिन समझ में नहीं आता कि जब मंत्रिमंडल की बैठक होती है तो उनकी बोलती बंद क्यों हो जाती है ? वे या तो सोचने-विचारने का बोझ नौकरशाहों के कंधों पर डाल देते हैं या फिर डर के मारे चुप्पी साधे रखते हैं। यदि यह सच नहीं है तो क्या नरेंद्र मोदी से नोटबंदी- जैसी भूल कभी हो सकती थी ? जीएसटी जैसा लंगड़ा-लूला कानून कभी देश के सामने लाया जा सकता था ? अब नागरिकता संशोधन विधेयक के मामले में भी यही हुआ है। यह तो गृहमंत्री अमित शाह ने अच्छा किया कि पूर्वोत्तर के नेताओं से गहर विचार-विमर्श करके अरुणाचल, नागालैंड, मिजोरम, असम, मेघालय और त्रिपुरा के उन क्षेत्रों में यह कानून लागू नहीं होगा, जिन्हें संविधान की छठी अनुसूची में गिनाया गया है लेकिन यह अजीब-सी बात है कि पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के सिर्फ अल्पसंख्यकों को ही भारत की नागरिकता दी जाएगी। यानि इन देशों से कोई हिंदू, सिख, ईसाई, जैन या बौद्ध भारत की शरण में आना चाहे तो उसका स्वागत होगा। किसी मुसलमान का नहीं। यह ठीक है कि इन देशों के कुछ अल्पसंख्यक कभी-कभी तंग आकर इन देशों से बाहर निकल जाना चाहते हैं। उन्हें भारत आना अच्छा लगता है लेकिन हमारी सरकार बड़ी भोली है। वह यह मानकर चल रही है कि पड़ौसी मुस्लिम देशों के जितने भी अल्पसंख्यक भारत में अड्डा जमाना चाहते हैं, वे पीड़ित ही होते हैं। सच्चाई यह है कि उनमें से ज्यादातर सुनहरे भविष्य की तलाश में भारत आते हैं, जैसे कि भारतीय नागरिक अमेरिका जाते हैं। यह कानून भारत को दक्षिण एशिया का सबसे बड़ा अनाथालय बना दे सकता है। हमारे ये पड़ौसी देश अगर ऐसा जवाबी कानून बना दें कि भारत के अल्पसंख्यकों को वे नागरिकता सहर्ष देंगे तो भारत की कितनी बदनामी होगी, हालांकि कोई भी अल्पसंख्यक भारत छोड़कर पड़ौसी देशों में क्यों जाना चाहेगा ? मंत्रिमंडल के सदस्यों को शायद यह भी पता नहीं कि इन पड़ौसी देशों में कई नागरिक हैं, जो मुसलमान के घर में पैदा हुए हैं लेकिन वे इस्लाम को नहीं मानते, जैसे अफगान प्रधानमंत्री रहे बबरक कारमल, हफीजउल्लाह अमीन और नूर मुहम्मद तरक्कई तथा बांग्लादेश की तसलीमा नसरीन आदि। इनके साथ आपकी सरकार कैसा सलूक करेगी ? बेहतर तो यह हो कि इस विधेयक में से मजहब शब्द को हटा दिया जाए और भारत की नागरिकता चाहनेवाले हर व्यक्ति को उसके गुण-दोष के आधार पर नागरिकता दी जाए और इस मामले में बहुत सतर्कता बरती जाए।

लेखक : डॉ वेद प्रताप वैदिक

जैसे ही सुबह नींद खुली, मैं धक से रह गया। चार-पांच दिन पहले मैंने लिखा था कि मुंबई में भाजपा और राकांपा की सरकार भी बन सकती है। सारे देश ने सुना कि देवेंद्र फडनवीस और अजित पवार ने मुख्यमंत्री और उप मुख्यमंत्री की शपथ सुबह 8 बजे ही ले ली। इतनी सुबह शपथ लेनेवाले ये देश के शायद पहले ही नेता हैं।मैंने सोचा कि यह शपथ पवार और मोदी की भेंट का परिणाम है लेकिन कुछ ही देर में पता चला कि शरद पवार को उनके भतीजे अजित पवार ने बिल्कुल वैसे ही गच्चा दे दिया, जैसे कर्नाटक में कुमारास्वामी ने कुछ साल पहले अपने पिता देवगौड़ाजी को दे दिया था।

देवेगौड़ाजी चाह रहे थे कि भाजपा से गठबंधन हो जाए। वे अटलजी और आडवाणीजी से बात कर ही रहे थे कि उनके बेटे ने बाजी मार ली। यही काम अजीत ने कर दिखाया। लेकिन शरद पवार ने अजित की कार्रवाई को पार्टी और परिवार-द्रोह घोषित कर दिया है। कांग्रेस भी कुपित है लेकिन सबसे ज्यादा बौखलाहट किसी को है तो वह शिवसेना को है। उसका नकली ताजमहल चकनाचूर हो गया है।उसकी सारी अकड़ ठिकाने लग गई है। रातों रात मुंबई में तख्ता-पलट हो गया है। अब भी आशा है कि अजित पवार के साथ काफी कम विधायक जाएंगे और वह विधानसभा में भाजपा-सरकार को गिरा देगी। यह असंभव नहीं है, क्योंकि शरद पवार और उनकी बेटी की पकड़ राकांपा में काफी मजबूत है लेकिन सत्ता के लालच के आगे सब नेता ढीले पड़ जाते हैं।

मंत्रिपद और करोड़ों रु. का लालच अब जमकर अपना असर दिखाएगा। भाजपा अपनी सरकार बचाने के लिए साम, दाम, दंड, भेद का इस्तेमाल क्यों नहीं करेगी? यों भी सबसे बड़ी पार्टी होने के नाते सत्तारुढ़ होने का नैतिक अधिकार उसे है ही। जहां तक राकांपा, शिवसेना और कांग्रेस के गठबंधन का सवाल है, वह पिछले एक माह से सौदेबाजी में ही लटका हुआ था। महाराष्ट्र की जनता की नज़र में उसकी कीमत बहुत घट रही थी। यदि वह बन भी जाता तो वह चलता कितने दिन ? ‘काणी के ब्याह में सौ-सौ जोखिम’।अब उम्मीद है कि महाराष्ट्र की राजनीति में थोड़ी स्थिरता आ जाएगी। यदि अब भी सौदेबाजी, दल-बदल या गठबंधन-बदल का नाटक चलता हो तो बेहतर होगा कि महाराष्ट्र में नए चुनाव करवाए जाएं, जैसे कि इजराइल में एक ही साल में अब तीसरे चुनाव की नौबत आ गई है।