ग्राम - स्वराज के लिए किसान आंदोलन

Monday, 23 December 2019 13:16 Written by  Published in मुद्रा Read 205 times

लेखक : बिमल कुमार

 
ग्राम स्वराज का आंदोलन कुछ कमजोर सा पड़ने लगा है । इसका मतलब यह है कि जहाँ कई प्रकार के आंदोलन वर्तमान व्यवस्था के विरोध में चल रहे हैं , वहीं इस व्यवस्था के विकल्प की नींव कहां होगी , इसकी स्पष्टता नहीं है ।
 
गावों के लिए बहुत से कार्यक्रम चल रहे हैं , लेकिन वे ग्राम - स्वराज्य के अंग के रूप में नहीं चल रहे हैं । उदाहरण के तौर पर गांव तक भौतिक सुविधाओं व सेवाओं को पहुंचाने के कार्यक्रम या राहत पहुंचाने के कार्यक्रम । किसान आंदोलन व ग्रामीण मजदूरों के आंदोलन अलग अलग स्तरों पर चल रहे हैं । गांव में कृषि प्रसंस्करण , शिल्पकारों के या ग्रामोद्योग की स्थापना नगण्य है । और इन्हे एक सूत्र में पिरोने का काम तो बिल्कुल नहीं हो रहा है ।
 
किसान आंदोलन ग्राम स्वराज्य एवं स्वावलंबन की धुरी बने , ऐसा चिंतन किसान आंदोलनों की मांगों में से प्रकट नहीं होता । वे सब्सिडी एवं कृषि उपज के मूल्यों तक ही अपने को सीमित रखते हैं । खेती के ऊपर वैश्विक बहुराष्ट्रीय निगमों का शिकंजा कसता जा रहा है । इससे खेती कैसे मुक्त होगी , यह भी किसान आंदोलन के मुख्य लक्ष्य का हिस्सा नहीं है । इसी प्रकार किसान आंदोलन गांव के अन्य वर्गों जैसे ग्रामीण मजदूरों व हस्त उद्योग के प्रति उदासीन है। इस कारण किसान आंदोलन समग्र गांव का आंदोलन बनने की क्षमता खोता जा रहा है ।
 
ग्राम - समूहों की स्वायत्तता व स्वावलंबन का सवाल किसान आंदोलन के साथ जुड़े , इसके लिए जरूरी है कि विकल्प के निर्माण के सवाल को भी आंदोलन अपने केंद्र बिंदु पर लाए । खेती में स्वावलंबन तो बुनियादी बात है ही , किन्तु इसके साथ साथ सिंचाई व जल प्रबन्धन , ऊर्जा , बुनियादी संरचना का निर्माण , स्वास्थ्य , शिक्षा , भूमि उपभोग आदि क्षेत्रों में स्वावलंबन के प्रयोग को किसान आंदोलन के साथ जोड़ना होगा । कृषि उपजों के प्रसंस्करण , खादी व ग्रामोद्योग स्वावलंबी गांव समूहों की रीढ़ बने , इस दिशा में भी वैकल्पिक रचनात्मक कार्यक्रमों को बढ़ाना होगा तथा इन कार्यक्रमों को किसान आंदोलन का हिस्सा बनाना होगा । 
इस पूरे सवाल को तीन हिस्से में समझना होगा । एक , ग्राम का अर्थ सरकारी राजस्व गांव या ग्राम पंचायत के परिसीमन वाला गांव नहीं । यह मोटे तौर पर प्राकृतिक रूप से जुड़े 20 - 25 गांव का एक संकुल जैसा हो । मतलब गांव वो जिसमें यदि एक गांव वाला जोर से आवाज़ लगाए तो पूरा गांव सुन ले तथा ग्राम संकुल वह, जिस दूरी को एक गांव वाला आधे घंटे में पैदल तय कर ले । ये स्वाभाविक दायरे गांव व ग्राम संकुल का निर्माण करें । ये ग्राम संकुल ही ग्राम स्वराज्य का आधार बनें , और वे परिसीमन क्षेत्र होने के बजाए लहरों के वृत के समान फैलने वाले हों ।
 
ग्राम स्वराज्य का दूसरा पहलू यह है कि मोटे तौर पर गांव में जो पूंजी का निर्माण हो , उस पूंजी का प्रयोग गांव में ही हो । गांव के शोषण का मुख्य कारण यही रहा है कि गांव में जो बचत है , वह अनाज के रूप में मंडी के माध्यम से बाहर चली जाती है । यह पूंजी गांव की पूंजी बनने के बजाए बिचौलियों या अनाज कारोबारी की पूंजी बन जाती है । अनाज कारोबारी की पूंजी बने , इसके लिए अनाज की कीमत कम से कम रखी जाती है । दूसरे अगर कैश के रूप में बचत रखी जाती है तो यह बैंक के माध्यम से , बैंक से ऋण लेने वाले की पूंजी बन जाती है । इस प्रकार गांव की बचत या अतिरिक्त धन का दोहन , गांव को कमजोर करने व उसका शोषण करने का माध्यम बन जाता है ।
 
इस दोहन व शोषण को रोकने के लिए तीसरे स्तर पर कार्य करना होगा । वह यह कि जमीन व ग्रामीण श्रम , इन दोनों को शोषणकारी बाजार के दायरे से बाहर रखना होगा । श्रम और प्रकृति की संयुक्तता से पूंजी या अतिरिक्त धन का निर्माण होता है । और इसी पूंजी या अतिरिक्त धन को पाने के लिए शोषणकारी बाजार श्रम और प्रकृति को अपने दायरे में ले लेना चाहता है । इसके लिए बहुराष्ट्रीय निगमों के दखल के हर स्वरूप का विरोध करना होगा , उनका बहिष्कार करना होगा । किसान आंदोलन व ग्रामीण आंदोलन को इन नई जिम्मेदारियों को उठाना होगा । यही समय की मांग है ।