खेती-किसान

खेती-किसान (3)

लेखक : डॉ. उपेन्द्र अयोध्या

               मौसम के हाल, खेत -खलिहानों में काम और मंडियों में दाम तक के लिए सूचना क्रांति के वाहक मोबाइल किसान के नए सहयोगी है और सरकारों एवं संस्थाओं के मोबाइल - आधारित उपकरण व एप उनके सारथी। आधार पहचान-पत्र आधारित सहायता अनुदान और वितरण प्रणाली से लेकर सरकारी सब्सिडी वाली यूरिया की उपलब्धता तथा मशीनों और रसायनों की जगह फोन पर सलाह - मशविरा, वीडियों कांफ्रेसिंग, ड्रोन कैमरों, उपग्रहों से खेतों की सुरक्षा - संरक्षा, कीटों व रोगों की निगरानी और फसल बीमा वितरण तक के क्षेत्र में पारदर्शिता आधुनिक तकनीक की ही देन है।

बीते 70 सालों में भारत की कृषि प्राधमिकताएं बदल गई है और देश की सड़कों से लेकर खेत-खलिहानों तक दौड़ रहे भीमकाय ट्रैक्टरों व क्रेनों के दौर में अब बैलगाड़ी में अनाज के बोरों के इंतजार में लंबी लाइने केवल पुराने मित्रों में देखने को मिलती है। आजादी के दो दशक बाद शास्त्री युग में हरितक्रांति का आह्वान होने तक कारखानों में सिमटी रही औद्योगिक क्रांति 1998 आते - आते ‘जय जवान जय किसान’के नारे में ‘जय विज्ञान’ का समावेश करा चुकी थी। किंतु बीसवी सदी के अंतिम दशक और इक्कीसवीं सदी के पहले दशक के बीच बीते दो दशकों में मशीनी क्रांति की अति होने से हरियाली के अग्रदूत का वरदान शनैः शनैः प्रदूषण और संदूषण के अभिशाप का पर्याय बनता जा रहा है। जिस किसान ने देशवासियों की भूख के साथ ही देश के भंडारागारों को भी लबालब भर दिया है, उसके सामने अब संकट अधिकाधिक उत्पादन का नहीं, फसल पर हुए खर्च की लागत निकालने का है, और सरकारों के सामने चुनौती है लागत की डेढ़ गुना कीमत किसानों की झोली में डालने की । जैसे 1966 से 1999 तक कृषि तकनीक की बदौलत खेतों की हरियाली के अग्रदूत बने ट्यूबवेलों में जोहड़ो, कुओं, तालाबों, ढकुली रहट की जगह ले ली, दो वैलों की जोड़ी की जगह किसनों के खेतों में बड़े जमीदारों के ट्रैक्टरों से किराए पर जुताई होने लगी और थ्रेशर व कंबाइन कटाई यंत्रों के युब में ‘ अनाज ओसाता हुआ किसान’ भारतीय खलिहानों की पहचान नही रह गए। मैक्सिको को गेहूँ और फिलीपीस के धान की दस्तक हुई तो यूरिया, एनपीके की बोरियां और कीटनाशकों व बायोटेक्नोलॉजी आधारित रसायनों ने खेतों व किसान के द्वारे से बैलों और घर के बाहर गोबर के घूरे की विदाई की फरमान सुना दिया। निश्चित रूप से खेती की हरितक्रांति और गौशालाओं की दुनिया में आई श्वेतक्रांति ने वैज्ञानिक एमएस स्वामीनाथन और अमूल के पयार्य रहे वर्गीज कूरियन को किसानों और पशुपालकों के लिए वरदान के अग्रदूत के रूप में पूज्यनीय बना दिया। किंतु यही स्वामीनाथन अब चिंतित है खेती की बढ़ती लागत से, और दिचलित है रसायनों व टेक्नोलॉजी के अंधाधुंध इस्तेमाल से, आबोहवा, नदी, जल-जंगल जमनीन में जहर घुलने और आसमान की ओज़ोन परत में छेद से होकर तारो, सितारो व अंतरिक्ष से घातक विकिरण की आशंकाओं से ।

राहत की बात यह है कि औद्योगिक क्रांति के बेकाबू सांड को काबू में लाने के लिए सूचना क्रांति ने खेत -खलिहान, गांव -चौपालों तक में दस्तक दे दी है। रेडियो के नए अवतार पर गूंजती प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के ‘मन की बात- हो या किसानों के हाथ मजबूत करने के नए-नए मोबाइल एप का जादुई संसार, तमाम तकनीकी उपकरण और नित नई खोजे किसानों और उनके खेत-खलिहानों, गौशालाओं में प्राकृतिक जैविक और मितव्यपी कृषि, पशुपालन और मंडी बाजार के लिए खिड़कियां खोलती जा रही है।

               सुखद सकेत यह है कि केन्द्र सरकार, कृषि वैज्ञानिकों और आईआईटी जैसे तकनीकी संस्थानों के साथ ही देश के कोने-कोने में खेती -किसानी और कृषि तकनीक का इस्तेमाल करते हुए अपनी सूझबूझ से उनमें सुधार करके स्वदेशी उपकरणों और तकनीक की इजाद करने वाले धरतीपुत्र विज्ञानियों ने प्रकृति से सामंजस्य का मर्म और धर्म समझ लिया है और खेती-किसानी

लेखक : भास्कर झा, प्रो. वीरेन्द्र कुमार विजय

 ई-मेल : This email address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it., This email address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it.

(भास्कर झा ग्रामीण विकास और प्रौद्योगिकी केन्द्र, आईआईटी दिल्ली में बायोगैस प्रयोगशाला में शोध छात्र है, प्रो. वीरेन्द्र कुमार विजय आईआईटी दिल्ली में बायोगैस प्रौद्योगिकी, शिक्षण और शोध में विगत 25 वर्षों से काम कर रहे है। उन्होने बायोगैस प्रौद्योगिकी पर कई शोध लेख और किताबें लिखी है।)

 

            बीते कुछ समय में भारत सरकार ने ऊर्जा के क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण नीतिगत कार्यक्रमों की शुरूआत की है जिसमें वर्ष 2022 के अंत तक 175 गीगावोंट क्षमता की नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता हासिल करने का लक्ष्य क्षमता हासिल करने का लक्ष्य, गोबर -धन योजना इत्यादि सराहनीय कदम है और बायेगैस इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

               आर्थिक विकास, सामाजिक उन्नति, मानव कल्याण और जीवन -स्तर को ऊँचा उठाने के लिए ऊर्जा सबसे महत्वपूर्ण घटक है। हालांकि इस बढ़ती हुई ऊर्जा ख़पत में हुई वृद्धि जीवाश्म ईधन पर निर्भरता का कारण है, जो एक बड़ी पर्यावरणीय चिंता का कारण बनता जा रहा है, और जलवायु को गंभीर नुकसान पहुंचा रहा है। ऊर्जा की आपूर्ति की दीर्धकालिक सुरक्षा सुनिश्चित करने की आवश्यकता के साथ, हमें उन तरीकों की तलाश करनी चाहिए जो आज और भविष्य में लोगों की जरूरतों को पूरा करें । असीमित आपूर्ति की क्षमता के साथ बायोगैस एक प्रभावी, नवीकरणीय गैर -जीवाश्म ईधन है जिससे पर्यायवरण, ऊर्जा, आर्थिक और अपशिष्ट प्रबंधन सहित कई क्षेत्रों में लाभ होते है, जो ग्रामीण, शहरी और औद्योगिक सभी क्षेत्रों में सुचारू एवं प्रभावी रूप से उपयोग में लाया जा सकता है। हम प्रतिवर्ष अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए अराबों मूल्य के पेट्रोलियम उत्पादों का आयात करते रहे है। भारत 1.25 अरब से अधिक मानव और 30 करोड़ पशु आबादी के साथ-साथ एक विशाल कृषि देश होने के कारण बायोगैस से ऊर्जापति एक बहुत ही उपयुक्त उपाय है। औद्योगिकीकरण और जनसंख्या वृद्धि के साथ-साथ दिन -प्रतिदिन अपशिष्ट पदार्थो का भंडार बढ़ता ही जा रहा है जोकि न सिर्फ पर्यावरण को प्रदूषित कर रहा है बल्कि सभी जीव जनजाति पर कुप्रभाव डाल रहा है।

               बीते कुछ समय में भारत सरकार ने ऊर्जा के क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण नीतिगत कार्यक्रमों की शुरूआत की है जिसमें वर्ष 2022 के अब तक 175 गीगावॉट क्षमता की नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता हासिल करने का लक्ष्य, गोबर-धन योजना इत्यादि सराहनीय कदम है और बायोगैस इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

            विगत दस वर्षों से बायोगैस विकास और प्रशिक्षण केन्द्र (बीडीटीसी) भारतीय प्रोद्योगिकी संस्थान, दिल्ली (आईआईटी दिल्ली) क्षेत्रीय एवं राष्ट्रीय -स्तर पर बायोगैस योजनाओं के प्रचार -प्रसार, अनुसंधान, विकास और सफल कार्यन्वयन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। बीडीटीसी, आईआईटी, दिल्ली बायोगैस के क्षेत्र में लाभार्थियों/उद्यमियों को प्रेरित करने और इसे एक स्व-उद्यमशीलता के रूप में शुरू करने हेतु तकनीक प्रदान करने के लिए उद्यमिता शिक्षा कार्यक्रम चलाता है।

               बीडीटीसी, आईाईटी दिल्ली द्वारा बायोगैस के क्षेत्र में विकसित कुछ उल्लेखनीय अनुसंधान एवं विकास कार्यो का संक्षिप्त विवरण इस लेख में किया गया है जो ग्रामीण/शहरी समुदाय के लिए न केवल अपनी ऊर्जापूर्ति में सहायक होग बल्कि उनकी जीवंवता को आसन और बेहतर बनाने एवं रोजगार प्राप्ति में भी काफी प्रभावी सिद्ध होगा।

            परिवहन ईंधन के रूप में बायोगैस का उपयोग

               बीडीटीसी, आईआईटी दिल्ली द्वारा विकसित प्रौद्योगिकी पर आधारित एक 10 घनमीटर/घंटा क्षमता वाली संचालित बायोगैस शुद्धि और बोटलिंग प्लांट, आाईआईटी दिल्ली परिसर में कार्यान्वित किया गया है। समृद्ध और बोतलबंद बायोगैस को नियमित रूप से एक वैगन आर कार के ईंधन के रूप में में पिछले पांच वर्षों से लगातार आईआई0 दिल्ली परिसर में स्थित स्वचालित बायोगैस शुद्धि और बोटलिंग प्रयोगशाला एवं बायोगैस वितरण सिस्टम उपयोग में लाया जा रहा है, जोकि सिर्फ बायोगैस पर 50 हज़ार किमी से भी अधिक चल चुकी है। इसके सभी मापदंडो का विश्लेषण करने के लिए मोटर वाहन परीक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय केन्द्र प्ब्।ज् (इन्टरनेशनल सेंटर फॉर ऑटोमोटिव टेस्टिंग) संस्था में सभी तरह के परीक्षण करने के बाद इसे सत्यापित किया गया।

               सभी तरह के कण उत्सर्जन के परिणाम (छव्ग्ए ब्व्ए हाइड्रोकार्बन और पार्टिक्यूलेट मामले ) ठै.प्टए मानदंडों का पालन कर रहे थे। बीडीटीसी, आईआईटी दिल्ली बायोगैस संवर्धन और बॉटलिंग तकनीक पर निरंतर अनुसंधान एवं विकास कार्य में लगा है ताकि इसे सार्वजनिक और उद्योग क्षेत्र के लिए अधिक व्यावसायिक रूप से व्यवहार और आकर्षक बनाया जा सके।    

               इसके अलावा, इस बायोगैस वाहन के ऑपरेशन और प्रदर्शन से प्राप्त आंकडो के आधार पर, बीआईएस मानकों को देशभर में वाहन चलाने के लिए संकुचित समृद्ध बायोगैस का इस्तेमाल करने के लिए निर्धारित और परिभाषित किया गया था।

लिग्नोसल्लुलोसिक अपशिष्ट का बायो मेथेनेशन

भारत में धान खेती प्रतिवर्ष लगभग 4.395 करोड़ हेक्टेयर भूभाग पर की जाती है जिससे लगभग क्रमशः 10.654 करोड़ टन चावल और लगभग 160 करोड़ टन पुआल का उत्पादन होता है। पुआल की कुछ मात्रा आधुनिक बायोगैस पॉवर के लिए ईधन के रूप में, ईट भटटियों में उपयोग कर ली जाती है पर शेष (लगभग दो तिहाई) भाग  खुले वातावरण में जला दिया जाता है जिसके गभीर परिणाम होते है। जैसाकि भारत के कई राज्यों में पुआल जलाना एक बहुत ही आम प्रथा बन गई है जिससे वायुमंडल में निलंबित कणों और विभिन्न गीन हाउस गैसों का अत्यधिक मात्र में उत्सर्जन होता है। और देश की राजधानी भी इसके कुप्रभाव से अछूती नहीं है।

               बीडीटीसी, आईआईटी ने एक प्रयोगशाला पैमाने की प्रणाली विकसित की है जोकि धान के पुआल का उपयोग करके बायोगैस का उत्पादन करती है और कई प्रयोगों एवं निष्कर्षों के आधार पर कुछ मौजूदा उद्योगों में आंशिक रूप से लागू भी किया गया है। कई प्रमुख राष्ट्रीय समाचार - पत्रों में इस काम को सुर्खियां मिली और काफी सराहना हुई।

               बायोगैस संवर्धन के लिए मोबाइल यूनिट का डिजाइन और विकास

बायोगैस शुद्धि और बोतलबंदी प्रणाली के व्यापार मॉडल को सुधारने के लिए और ग्रामीण क्षेत्रों के दूरदराज के स्थानों पर स्थित छोटे एवं मध्यम आकार के बायोगैस संयंत्रों में इसके प्रयोज्यता को बढाने के लिए भी बायोगैस शुद्धि और बॉटलिंग प्रणाली के लिए एक मोबाइल इकाई विकसित की गई है।

               यह प्रणाली पीढ़ी के बिंदु पर बायोगैस के उपयोग की सीमाओं को दूर करती है और वाहन आवेदन के लिए बायोगैस का उपयोग करने के लिए मोबाइल विकल्प प्रदान करती है। यह न केवल देश में बड़ी मात्रा में उपलब्ध बायोगैस से जैव-सीएनजी के उत्पादन के लिए विकास के विभिन्न वाणिज्यिक संकुल को मजबूत करेगा बल्कि ग्रामीण उद्यमियों के लिए भी एक व्यवहार्य विकल्प होगा।

              

बायोगैस के उत्पादन के वैकिल्पक स्रोत

               ग्रामीण क्षेत्रों में बायोगैस के उत्पादन के लिए सामान्यतः पशु अपशिष्ट जैसे गोबर का उपयोग किया जाता है। परंतु दिनोंदिन बढ़ते शहरीकरण और घटते पशुधन की वजह से समय आ गया है कि बायोगैस की निरंतरता के लिए वैकल्पिक स्रोत की ओर ध्यान दिया जाएगा। वैकल्पिक स्रोत की खोज बायोगैस तकनीक में बढ़ती हुई रूचि और इसके विस्तार की संभावना के साथ अपरिहार्य हो जाती है। समय आ गया है जब हमें वैकल्पिक अपशिष्ट समग्रियों की तलाश करनी चाहिए जो व्यथ हो रती है और कचरे के रूप में मानी जाती रही है।

हमारे आसपास कई तरह के बायोडिग्रेडेबल पदार्थ भरपूर मात्रा में उपलब्ध है। बीडीटीसी, आईआईटी दिल्ली ने भी इस दिशा में व्यापक कार्य करना प्रारंभ किया है जोकि ना सिर्फ पूरे आईआईटी परिसर को साफ-सुथरा रखने में मदद करता है बल्कि बायोगैस से बिजली बनाकर एक सतत ऊर्जा का सं्रोत भी बनता है। जरूरत है कि इस प्रकार की पहल को देश के अन्य शिक्षण संस्थानों में भी लागू किया जाए।

               वर्तमान में आईआईटी दिल्ली स्थित रिसर्च सेंटर में भिन्न-भिन्न तरह के अपशिष्ट पदार्थो जैसे जेट्रोफा केक,

पोंगमिआ केक, रसोई का कचरा, चावल की भूसी, बबूल, सुबबूल, सिरिस, दिलायती कीकर इत्यादि का उपयोग बायोगैस बनाने के लिए किया जाता है। और इस गैस का उपयोग बिजली उत्पादन में होता है।

              

ग्रामीण उत्थान के संदर्भ में बायोगैस की भूमिका

               ग्रामीण -स्तर पर लाभप्रद रोजगार पैदा करने और उद्यमशीलता को बढ़ावा देने के संदर्भ में बायोगैस एक बहुत ही महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है जिससे कि ग्रामीण और शहरी आबादी के बीच असमानता को भी काफी हद तक कम किया जा सकता है।

               यदि उपलब्ध संसाधान का बेहतर एवं अधिकतम उपयागे किया जाए तो बायोगैस से ग्रामीण प्रौद्योगिकी को काफी बढ़ावा मिल कसता है। इन संसांधनों के उपयोग और अपव्यय से बचने से वास्तव में ग्रामीण उद्यमिता और सामाजिक विकास में मदद मिल सकती है। उद्यमियों को तीसरे पक्ष की मदद करने के लिए बैठने और प्रतीक्षा करने की आवश्यकता नहीं है बल्कि वे अपना रास्ता तैयार कर सकते है।

 

बायोगैस के क्षेत्र में व्यावसायीकरण और उद्यमशीलता के लिए प्रौद्योगिकी मॉडल

बायोगैस ग्रामीण एवं शहरी दोनों ही स्तर पर ऊर्जा की मांग एवं रोजगार पैदा करने के साथ -साथ सामाजिक विकास के लिए आगे आने और योगदान करने का भी मौका देता है। बायोगैस न केवल ऊर्जा आवश्यकताओं में देश को अधिक सुरक्षित बनाने में मदद करेगा, बल्कि रासायनिक मुक्त जैवित खेती और जलवायु परिवर्तन की दिशा में भी महत्वपूर्ण योगदान देगा। बायोगैस की तकनीक  एक सामान्य, सरल अच्दी तरह से ज्ञात है, लेकिन कैसे इसके माध्यम से अति लधु उद्योग स्थापित किया जाए, सामान्य ग्रामीण नागरिक इससे अनजान हैं। कुछ इसी तरह के मॉडलों का उपयोग करके एवं छोटे प्रमोटरों/उद्यमियों के सहयोग से इसे सुचारू रूप से क्रियान्वित किया जा सकता है।

               मॉडल -1 घरेलू बायोगैस संयंत्र 

  1. ग्रामीण इलाकों में घरेलू बायोगैस संयंत्र (एशुमल आधारित)
  2. शहरी क्षेत्र में घरेलू बायोगैस संयंत्र (रसोई कचरा आधारित) मॉडल -2 उद्यमशीलता मोड के माध्यम से वाणिज्यिक बायोगैस संयंत्र ।
  3. खाना पकाने के लिए पाइपलाइन नेटवर्क के माध्यम से गैस वितरण के लिए बायोगैस संयंत्र ।
  4. छोटे पैमाने पर बिजली उत्पादन के लिए बायोगैस संयंत्र ।

            मॉडल - 3 उद्यमशीलता मोड के माध्यम से वाणिज्यिक बायोगैस संयंत्र।

            मॉडल -4 ग्रामीण इलाकों में बायोगैस संयंत्र का वाद्ययंत्र आवेदन।

            मॉडल -5 बड़े पैमाने पर वाणिज्यिक बायोगैस संयंत्र।

  1. ऑटोमोटिव अनुप्रयोग के लिए जैव-सीएनजी उत्पादन के लिए औद्योगिक अपशिष्ट/एसटीपी/एमएसडब्ल्यू पर आधारित बायोगैस संयंत्र।

किसी भी विकासशील अर्थव्यवस्था के लिए ऊर्जा का बहुत ही महत्वपूर्ण योगदान होता है और विकास की रफ़्तार को हम अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा किए बगैर बनाए नहीं रख सकते। जिस रफ़्तार से भारत की ऊर्जा जरूरतें बढ़ रही है, उस रफ़्तार से इसका उत्पादन नहीं बढ़ रहा है जिस वजह से आज वक्त की जरूरत यह है कि बढ़ती जरूरतों की पूर्ति के लिए वैकल्पिक ऊर्जा के स्रोतों का तलाशा जाए हौर अधिकतम उपयोग में लाया जाए। देशभर में गैर-पारंपरिक स्रोतों से ऊर्जा से उत्पादन के प्रति लोगों को जागरूक बनाए जाने की जरूरत है।

डॉक्टर वैद्य को दूर भगाओ, एक सेब रोज खाओ की कहावज तो सभी जानते है किन्तु पहाड़ों पर उगने वाले सेब का दाम मैदानों तक इतना ज्यादा हो जाता है कि उसे खरीद पाना गरीब आदमी के बस की बात नहीं रह जाती । हिमांचल प्रदेश के हरमन शर्मा को विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग के राष्ट्रीय नव प्रवर्तन प्रतिष्ठान की ओर से मैदानों में उगाए जाने लायक सेब प्रजाति विकास के लिस सम्मानित किया गया और राष्ट्रपति भवन में लगाया भी गया। अब केन्द्रीय मंत्री श्रीमती मेनका गांधी के सहयोग से उनके संसदीय क्षेत्र पीलीभीत में भी हरमन ने 99 किस्म के सेबों के बाग लगाए है। इसी तरह ओजोन क्षरण के कारण अंतरिक्ष से आने वाले घातक विकिरण से लेकर मोबाइल और डिजीटल टेक्नोलॉजी के रेडिएशन से बचाव में शील्ड का काम करने वाले रूद्राक्ष वृक्ष में बायोटेक्नोलॉजी विकास के जरिए मैदानों में उगाने का रिकार्ड बनाने के लिए लिम्का बुक ऑफ रिकार्ड में स्थान पाने वाले महामण्डलेश्वर स्वामी मार्तडपुरी हिमालय पर्वत की ऊंचाइयों के मूल निवासी पावन रूद्राक्ष वृक्ष को मैदानों में उतार लाए है। रूद्राक्ष के पेड़ दिल्ली, प्रयाग, काशी, अयोध्या, भोपाल समेत तमाम मैदानी इलाकों में लगवाने का अभियान सफलतापूर्वक चाने के लिए स्वामी जी का नाम लिम्का बुक ऑफ रिकार्डस में आया। स्वामी जी ने रूद्राक्ष को काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (बीएचयू) समेत कई शोध प्रयोगशालाओं में वैज्ञानिक कसौटियों पर कसने और विज्ञानसम्मत बनाने का कार्य किया, साथ ही किसानों और बागवानों के लिए एक अवसर सुलभ करा दिया है। कि वे मैदानी इलाकों में भी रूद्राक्ष की बागवानी करके अपनी आमदनी बढ़ा सके। रूद्राक्ष की माला गले से लेकर बाजुओं तक पर बांधने की पंरपरा के पीछे इसकी कास्मिक विकिरण अवशोषण वृत्ति का ज्ञान रहा तो मोबाइल फोनों और मोबाइल टावरों के युग में बेडरूम से लेकर बाजारों तक हर की रेडिएशन पलूशन से मुक्ति के स्थान से लेकर आध्यात्मिक और फैशन बाजार में भी इस जैविक उत्पाद के प्रचलन की संभावनाएं है और इसी के साथ रूद्राक्ष की मांग बढेगी जो जरूरी नहीं कि आध्यात्मिक रूप से लाभ पहुँचाए किंतु नवजैविक टेक्नोलॉजी के बल पर मैदानों में रूद्राक्ष की खेती किसान को आर्थिक समृद्धि का मार्ग अवश्य दिखा सकती है।

            की कमान भी समझदार, कामगरों व वैज्ञानिकों के हाथों में है या उनकी बातें ध्यान से सुनी और गुनी जा रही है। मौसम के हाल, खेत-खलिहानों में काम और मंडियों में दाम तक के लिए सूचना क्रांति के वाहक मोबाइल किसान के नए सहयोगी है और सरकारों एवं संस्थाओं के मोबाइल – आधारित उपकरण व एप उनके सारथी। आधार पहचान-पत्र आधारित सहायता अनुदान और वितरण प्रणाली से लेकर सरकारी सब्सिडी वाली यूरिया की उपलब्धता तक मशीनों और रसायनों की जगह फोन पर सलाह - मशविरा, वीडियो कांफ्रेसिंग, ड्रोन कैमरों, उपग्रहों से खेतों की सुरक्षा-संरक्षा, कीटो व रोगों की निगरानी और फसल बीमा वितरण तक के क्षेत्र में पारदर्शिता आधुनिक तकनीक की ही देन है। इसके बीच यह भी गौरतलब है कि भारत के गांव और किसान ने हरे-भरे खेतों तक का यह किस तरह और किस स्थिति से उठकर तय किया है।

युद्ध और अकाल दोनों से जूझते हुए द्वितीय प्रधानमंत्री भी लालबहादुर शास्त्री ने 1965 में दिल्ली के रामलीला मैदान से जय जवान जय किसान’ का नारा दिया और इस नारे के जवाब में देश के किसानों ने पहली बार साढ़े सात करोड़ टन अनाज उत्पादन कर दिखाया। 742 लाख टन अनाज उत्पादन कर दिखाया। 742 लाख टन अनाज उत्पादन की तुलना आज से करें तो 2016 - 17 के दौरान 25.22 करोड़ टन ;2522.24 लाख टन) उत्पादन शास्त्री जी के सपने को साकार करने जैसा है, क्योकि 1952-52 में कुल 550 लाख टन अनाज देश में पैदा हुआ था और खाने के लिए अनाज का ऐसा संकट था कि 1962 में 40 लाख टन जबकि 1966 में 104 लाख टन अनाज आयात) बढ़ाने पर भी शास्त्री जी को सप्ताह में एक दिन व्रत करने का आह्वान करना पड़ा। शास्त्री जी के दौर में देश आस्ट्रेलिया और अमेरिका का मुंह ताकने को मजबूर थ जबकि आज भारतीय खाद्य निगम के भंडार भरे हुए है और भारत दुनिया के तीन शीर्ष निर्यातक देशों में शुमार है। 2016 में जब दाल की कीमतें  सौ रूपये से ऊपर पहुँच गई थी, केन्द्रीय खाद्य और आपूर्ति मंत्री श्री रामबिलास पासवान ने देश को आश्वस्त किया था। कि देश में छह सौ लाख टन गेहूँ, चावल आदि अनाज के भंडार मौजूद है जबकि मांग 549 लाख टन की थी, हाँ दलहन की मांग 235 लाख टन थी जबकि उत्पादन 170 लाख टन होने से 65 लाख टन दालें आयात करने की नौबत आ गई।

               यदि खेती -किसानी को सुगम बनाने, प्रदूषण और जहरीले रसायनों से आगाह करके हरी खेती की राह आसान करने वाली नई तकनीक, सरकारी प्रयासों और योजनाओं की बात करें तो पांच क्षेत्र ऐसे नजर आते है जिनमें तकनीकी प्रगति या संभावनाएं दूरगामी परिणामों वाल साबित हो सकती है। हाल में ही सारी दुनिया ने अंतराष्ट्रीय पृथ्वी दिवस’ मनाया जिसके लिए संयुक्त राष्ट्र संघ का इस वर्ष का संकल्प है ‘‘प्लास्टिक-जनित प्रदूषण