खेल और मनोरंजन

खेल और मनोरंजन (13)

पिछले दिनों इंडियन एक्सप्रेस के आधे पृष्ठ पर में काशीनाथ सिंह जी एक-सी सुन्दर तस्वीर छपी थी जिसमें उनके लाल कुर्ते और धवल दाढ़ी वाले आकर्षक मुस्कराते चेहरे के साथ बनारस का अस्सी घाट भी दिखाई देता था। 'टी, टाइम एंड काशी' शीर्षक वाले इस फीचर की लेखिका दीप्ति नागपाल डिसूजा ने काशीनाथ जी के साथ गंगा तट पर टहलते हुए एक दिलचस्प बातचीत की थी। वाराणसी की एक पुरानी बहु सांस्कृतिक परम्परा का क्षरण, नब्बे के दशक का बाजारवाद, साम्प्रदायिक उभार, धार्मिक सांस्कृतिक स्थलों में पैठता एक लुम्पैन व्यावसायीकरण, संस्कति के बहद अर्थ का धार्मिक कट्टरता में रिड्यूस होते जाना तथा राम जन्म भूमि आन्दोलन व मंडल कमीशन की पृष्ठभूमि में एक जातीय परिवेश में आते सूक्ष्म बदलाव के मुद्दे इस बातचीत में उभरे थे ।

उभरे थे । 'काशी का अस्सी' उपन्यास पर आधारित डॉ. चन्द्र प्रकाश द्विवेदी की फिल्म 'मोहल्ला अस्सी' सेंसर की भारी काट-छांट के बाद आखिर पिछले नवम्बर में सिनेमाघरों में रिलीज हो ही गयी। छह वर्ष से कम फिल्म अटकी हुई थी। मल्टीप्लेक्स के बाजार समय में किसी गैर-मसाला फिल्म को देख पाना उस बस को पकड़ने जैसा है जो अभी आयी और अभी गयी। फिल्म पर - सेंसर की मार साफ दिखाई देती है। लगभग 20 मिनट की हिस्सों की काट-छांट से फिल्म का नरेटिव बुरी तरह से प्रभावित हुआ है। इसके बावजूद यह एक उल्लेखनीय फिल्म है। जनपदीय परिवेश और एक खास स्थानिकता की आंच को हिन्दी फिल्म में महसूस कर पाना दुर्लभ है। यदि किसी भी सिनेमा की सबसे बड़ी ताकत एक 'लोकेशन' और उसके वातावरण को रचने में है तो 'मोहल्ला अस्सी' में अपनी स्थानिकता में लिपटा यह वातावरण बड़े प्रभावशाली ढंग से उभरा है। गली, सडक, मोहल्ले इमारतें, भीड़, जीवन की एक खास परिपाटी, सामूहिकता और अकेलापन, बाहर गली का शोर और घर के भीतर के अंधेरे, आस्था और व्यावहारिक जरूरतों के बीच फंसी जिन्दगियाँ. संवाद और चप्पियाँ, पप्पू की चाय की दुकान और बहसें और इस सबका घेरता हुआ एक बड़ा राजनीतिक, सामाजिक कारवतना दशक की वे तमाम आन्दालन, बखूबी रचा गया है। नब्बे के की वे तमाम उत्तेजनाएं, राम जन्मभूमि जन, रथयात्रा, अयोध्या मार्च व मंडल न की पृष्ठभूमि में ग्रासरूट की नाइयों को यह फिल्म विश्वसनीय ढंग भारती है। फिल्म उन दबावों को लोकेट ती है जब जिन्दगियाँ बहुत सूक्ष्म स्तरों बदल रही हैंएक जुनून और आरोपित महिकीकरण समूचे सामाजिक परिवेश अवचेतन में किस तरह की भीतरी हलचलें पैदा कर रहा है!

फिल्म के शुरुआती दृश्यों में कहीं यह संवाद उभरता है कि 'करप्शन हमारा राष्ट्रीय चरित्र है'। यह व्यंग्य जैसे कि उस समचे सामाजिक ढाँचे पर है जिसमें सबसे बड़ी सच्चाई जिन्दा रहने का संघर्ष हैगंगा तट का वह पुराना अस्सी मोहल्ला, विदेशी टूरिस्टों के दलाल बनते पंडे या धर्म, आस्था, परम्परा, संस्कृति के पुराने 'क्लीशों' में लिपटा हुआ भौतिक मजबूरियों और पाखंड से भरा एक समय, पुराने विश्वासों पर हावी होता हुआ एक नये किस्म का अवसरवाद, चायघर में विभिन्न विचारवालों के बीच खुली बहसों का कम होते जाना, सार्वजनिक 'स्पेस' का संकुचन, कुछ विडम्बनाएं, कुछ तनाव, कुछ आन्तरिक क्षरण और कुछ निर्वासन-और इस सबके मिले जुले वातावरण को कुछ चरित्रों के मार्फत इस फिल्म में बखूबी रचा गया है। 

बखूबी रचा गया है। सिनेमा यदि ऐसे किसी परिवेश को स्वते हुए 'स्थान' और 'मनुष्यों के आन्तरिक विघटन का एक दस्तावेज बनता है तो यह उसका एक बड़ी उपलब्धि मानी जानी- यउसके 'नरेटिव' में इतिहास की बड़ा तारीखें और बृहद सामाजिक राजनीतिक पल पुथल की 'माइक्रोरियलिटी' यदि हता वह एक उल्लेखनीय बात है फर चाहे उसमें दूसरी बहुत सारी संभावनाएं अधूरी रह गयी होंकाशीनाथ सिंह का उपन्यास 'काशी का असी 'गंगातट' के अस्सी मोहल्ले के लोगों का सूक्ष्म अवलोकन भार इस उपन्यास पर बनी यह फिल्म उन अर्थों में एक ईमानदार फिल्म है कि उसकी विषयवस्त की चुनौतियाँ बहुत बड़ी थीं। . __

संस्कत शिक्षक और एक रूढ़िवादी धार्मिक पजारी (पंडित) की मुख्य भूमिका में अभिनेता सनी देओल और उनकी पत्नी की भमिका में अभिनेत्री साक्षी तंवर के यहत मार्मिक हैं। साक्षी तंवर अद्भुत रूप से प्रभावशाली हैं। रविकिशन, सौरभ शुक्ला का अभिनय भी जार जय भी जोरदार है। मुकेश तिवारी, राजेन्द्र गुप्ता गजेन्द्र गप्ता और सीमा आज़मी जैसे मंजे हुए कलाका लाकारों की बस झलकियाँ हैं फिल्म में । उन उन्हें बहुत मौका नहीं मिला। पप्प की चाय की दुकान को फिल्म का एक केन्द्रीय केन्द्रीय चरित्र बन कर जिस तरह से उभरना था, वह नहीं हो पाया। भारी काट-छाँट के कारण फिल्म अपने पीछे बहुत कुछ अधूरेपन की कसक छोड़ जाती है।

अधूरेपन की कसक छोड़ जाती है। इतिहास की तारीखें, ग्रास रूट की जिन्दगियाँ, इस जातीय जीवन में पैठे बहत सारे अन्तराल, सांस्कृतिक परिवेश और रोजमरी की लय का बदलना, भावनाओं के सघन क्षण, बहुत छोटे छोटे चरित्रों के माध्यम से एक महावृतान्त का उभरना हिन्दी फिल्मों में यह सब कहाँ हो पाता है। 'मोहल्ला अस्सी' बनाने के पीछे जो साहस और रचनात्मक दृष्टि है, उसे अनदेखा नहीं किया जा सकता। 

मंटो एक जलते हुए शोले का नाम म उसको छूना दुस्साहस का काम छते ही हाथ जल जाते हैं। मगर इस बदनाम लेखक के भीतर कोई ऐसी कशिश है कि उसको छूने की का म होती है, कोई ऐसी तपिश है जो अपनी ओर खींचती हैलेकिन एक लेखक को करीब से महसूस करना एक बात है और उस पर फिल्म बनाना दूसरी बातइस लिहाज से नंदिता दास का साहस दाद देने लायक है। यह दाद इस बात से कुछ और बड़ी हो सकती है कि नंदिता ने जो फिल्म बनाई है, वह मंटो के अलावा उन दिनों की मुंबई-यानी बंबई-को भी पकड़ती है लाहौर को भी, और इन सबके साथ उस पूरे जमाने को, जिसकी जलती हुई कहानियों - में तप कर मंटो नाम का शोला एक लेखक में बदला था।

है लाहौर को भी, और इन सबके साथ उस इस्मत चुगताई भी हैं जो लिहाफ जैसी नहीं, वह जिंदगी के उन अंधेरे हिस्सों का लेखक है जिनसे आंख मिलाते हमें उबकाई में बदला था। - ऐसी फिल्म बनाना आसान काम नहीं था- नंदिता के सामने मंटो की बेहद - जटिल शख्सियत थी, उसकी वे कहानियां थीं जिन पर अश्लीलता के आरोप लगे. वह जमाना था जो सांप्रदायिक नफरत की आग में बुरी तरह जल रहा था, दो हिस्सों में बंट - गए एक मुल्क के नागरिक थे जो अब । अलग-अलग ठिकानों में अपनी पहचान खोज रहे थे। इन सबके साथ वह फिल्मी दुनिया थी जिसकी चमक-दमक पर दम दुनिया थी जिसकी चमक-दमक पर इस बाहरी दुनिया के दबाव से पैदा दरारें धीरे- धीरे दिख रही थीं।

नंदिता दास नंदिता दास बहुत संजीदगी और सूक्ष्मता के साथ एक-एक ब्योरा चुनती हैं। फिल्म देखते हुए जैसे उस दौर की मुंबई हमारे सामने खुल जाती है-वह फिल्मी दुनिया भी जिसमें अशोक कुमार हैं, नरगिस हैं, नौशाद हैं, जद्दनबाई है और श्याम जैसा मंटो का स्टार-दोस्त है। इस बंबई में एक दुनिया उन गरीब, हांफती-खांसती बस्तियों की भी है जहां औरतें बिक्री का सामान हैं, जहां उनकी नींदें छीन ली गई हैं, जहां दिन उनके अंधेरों में डूबे हैं। इस बंबई में एक इस्मत चुगताई भी हैं जो लिहाफ जैसी कहानी लिखकर मुकदमा झेल रही हैं और मंटो के साथ बहस में उलझी हैं। इस बंबई में अशोक कुमार भी हैं जो दंगों से बंटे शहर में मंटो के साथ निकलते हैं और शहर उनके लिए अलग से रास्ता बना देता है। इसी बंबई में फिल्म स्टार श्याम पाता है कि नए बने पाकिस्तान में उसके अपने लोगों को मार दिया गया और वह मुसलमानों से इस कदर नफरत की बात सोचता है कि वे सामने पड़ जाएं तो उन्हें मार डालेगा |

श्याम के इस गुस्से का गवाह मंटो पूछता है, 'मुझे भी मार दोगे, मैं भी तो मुसलमान ह?' श्याम का जवाब है, तुम कहां के मुसलमान हो। मंटो का जवाब है --'इतना भर मसलमान तो हू कि मारा जा सकू। टूटी हुई बम्बई का यह टूटा हुआ मंटो एक रात अचानक अपना मुल्क छोड़ देने का फैसला करता है। वह लाहौर जाकर पाता है कि वहाँ इंडिया कॉफी हाउस पाक कॉफी हाउस में बदल गया है। लेकिन नाम के साथ इस बदली हुई पहचान के बावजूद बहुत कुछ नहीं बदला है। गांधी की हत्या लाहौर में भी हूक पैदा करती हैं |मंटो की कहानियों पर अश्लीलता का मुकदमा लाहौर में भी चलता रहता हैइन सबके बीच फैज़ अहमद फैज़ की नज्म गंजती रहती है.ये टाग-टाग उजाला ये शबगजीदा सहर....।

लेकिन इन सबके बावजूद यह कहना होगा कि नंदिता दास ने बहुत सारा मंटो इरादतन छोड़ दिया है तो बहुत सारा मंटो उनसे उनकी कोशिश के बावजूद छूट गया है। असल में मंटो कई वजहों से पकड़ में नहीं आता। वह कहीं से 'भद्रलोक' का लेखक नहीं है, मध्यवर्गीय विद्रोह का भी नहीं, वह जिंदगी के उन अंधेरे हिस्सों का लेखक है जिनसे आंख मिलाते हमें उबकाई आती है, जिसकी 'बू' हमें नाक बंद करने पर मजबूर करती है, हम लेखक के किरदारों से ही नहीं, लेखक से भी भय खाने लगते हैं-वह एक अस्पृश्य लेखक लगने लगता है जो जीवन की बजबजाती गलियों में उतरन का वह दुस्साहस दिखाता है जो शरीफ लेखकों को नहीं दिखाना चाहिए। - जब यह मंटो परदे पर आता है तो कुछ शरीफ, सुसंस्कृत और सहनीय हो जाता है। फिर 'खोल दो', 'ठंडा गोश्त' या 'टोबा टेक सिंह' जैसी कहानियां हमारी नसों को तड़काने की जगह पठनीय हो जाती हैं। वह भय, यातना और गंध महसूस नहीं होती जो मंटो को अलग से पढ़ते हुए महसूस की जा सकती है। दरअसल जिस्मों की मार्फत कही गई उसकी कहानियां हमारी पथराई. हुई रूहों का आईना है जिसे देखकर अपनी छुपी हुई गलाजत का भी एहसास हो।

अगर यह एहसास कुछ कम होता है तो इसलिए कि नन्दिता दास का मंटो कुछ शरीफ लगता है | सब कुछ तोड़फोड़ देने की वह आत्मघाती कामना उसमें नहीं दिखती जो शायद मंटो में रही होगी। नवाजुद्दीन ने अच्छा काम किया है, लेकिन शराब में खुद को गर्क करने वाले लेखक की तड़प और तकलीफ उनकी आंख, उनके चेहरे पर नहीं दिखती। बेशक, सफिया की भूमिका में रसिका दुग्गल बहुत भली लगती हैं- अपनी घुटती हुई यातनाओं को बहुत चुपचाप जज़्ब करती हुई और एक टूट रहे लेखक को संभालने का पूरा जतन करती हुई।

को संभालने का पूरा जतन करती हुई। बेशक, इस्मत चुगताई इस फिल्म में बहुत हल्की हो गई हैं। अपने समय की यह दुस्साहसी लेखिका-जो मंटो से लगातार संवादरत रहती है और अपने समाज से संघर्षरत- फिल्म में बहुत कटी-छंटी, मुलायम और नफीस सी लेखिका में बदल दी गई हैं। नफीस वे रही होंगी, लेकिन उनके जीवन के संघर्ष कहीं से मंटो से कम नहीं रहे और उन्होंने उनसे कुछ ऐसे जीवट से लोहा लिया कि सब अंततः हार गए।

फिर भी नंदिता दास का शुक्रिया अदा करना चाहिए। वे ऐसे समय में मंटो और उसके जमाने से हमें रूबरू करा रही हैं जो बहुत ही सपाट ढंग से खूखार और संवेदनहीन है। विकास की एक चमकीली पन्नी शहरों के मुख्य बाजारों में चिपका दी गई है और उसके पीछे का बदबूदार अंधेरा कितना गाढ़ा और कितना बड़ा है-यह देखने वाला कोई नहीं बचा है। हालांकि कहना मुश्किल है, इस जमाने में कितने लोगों को मंटो या किसी भी लेखक की परवाह है। ये फिल्म कम सिनेमाघरों में लगी और जहां लगी है, वहां भी दर्शक नहीं दिख रहे थे।

फिर भी जब हमारे समय से यह शिकायत होगी कि वह बहुत सारी बाजारू, समझौतापरस्त, सांप्रदायिकतापसंद, फासीवादी मंसूबों से लैस मानसिकता के आगे लगभग घुटने टेक रहा था तब भी प्रतिरोध की कुछ रचनात्मक आवाजे बची हुई थीं जो हमें हमारा मंटो लौटा रही थीं।

 

दलित निर्देशक नागराज मंजले की हाल ही में प्रदर्शित हई मराठी फिल्म 'सैराट' ने बॉक्स ऑफिस पर कामयाबी के नये कीर्तिमान रचते हुए हिंदी भाषी सिने दर्शकों को भी आकर्षित किया है। लेकिन कुछ सवर्ण आलोचक फिल्म में लोकप्रिय गानों विशेषतः 'झिंग झिंगाट' की उपस्थिति और दीन-हीन-अनपढ़ दलितों के उत्पीड़न और चित्रण की बनी-बनाई परिपाटी की अनुपस्थिति देख करके इस फिल्म को एक दलित निर्देशक की फिल्म के रूप में नकारने से भी पीछे नहीं रहे हैं। हाँ, यह सच है कि इस फिल्म में कुछ बेहद लोकप्रिय हो गये गीत हैं। लेकिन वे प्रायः पृष्ठभूमि में हैं और आंतरिक भावों की व्यंजना हेतु हैं। संगीत निर्देशक पटकथा और किरदारों के प्रति प्रतिबद्ध रहे हैं। इसके सभी गीत अनगढ़ ग्रामीण भाषा में हैं। फिल्म की भाषा और गीतों की भाषा समान है। अन्यथा भाषा और गीतों की भाषा अधिकांश फिल्मों में गीत फांक की तरह होते हैं जहाँ किरदार यकायक कवि बन जाते हैं। दूसरा यह 21वीं सदी के भारत में दलित जीवन का यथार्थ दिखाती है और आज लोकतांत्रिक देश में पिछली सदी के पूर्वार्द्ध या मध्ययुग की तरह खुल्लमखुल्ला दलितों को कुचला नहीं जा सकता। अंबेडकर द्वारा बनाये गये कानूनी संरक्षण के प्रावधानों के साथ अपने अधिकारों के प्रति पढ़-लिखकर जागरूक बनते दलित अब आजादी और स्वाभिमान की खुली हवा में सांस लेने लगे हैं। अतः कल का दलित उत्पीड़न आज का दलित निर्देशक ज्यों का त्यों कैसे दिखा सकता था ? किंतु ऐसा भी नहीं है कि इस भमंडलीय नवउदारवादी बयार में मध्ययगीन जातिवादी मानसिकता से भारतीय समाज मक्त हो चका हो। जाति और जातीय उत्पीड़न अपने बदले हये रूपों में आज भी बरकरार है। और यह फिल्म इसीप्रकार के जातीय भेदभाव और पूर्वाग्रहों को 21वीं सदी के आधुनिक भारत में दिखाती है। 

में दिखाती है। वास्तव में यह फिल्म भारतीय स्त्री की यौनिकता के ऊपर सांस्कृतिक स्तर पर स्वीकृत पितृसत्ता की जकड़बंदियों के खिलाफ बोलते-बोलते बड़ी सूक्ष्मता किंतु मुखरता के साथ हमारे समाज में जाति की उपस्थिति और उसके क्रूर यथार्थ को पकड़ती है। फिल्म की पूरी पटकथा और कथानक के उतार-चढ़ाव इसी सूत्र से संचालित हैं। इस फिल्म में जाति और लिंग. के अंतर्संबंधों की वही समझ निर्देशक मंजुले ने दिखाई है, जो आप को अंबेडकर के यहाँ मिलेगी। अंबेडकर ने अपने लेखन में स्पाय किया है कि जाति की उत्पत्ति, बुनावट और विकास का आधार रही है सजातीय विवाद व्यवस्था। फिल्म की नायिका अर्चना या आर्ची इसी सजातीय विवाह व्यवस्था या प्रकारांतर से कहें तो जाति व्यवस्था में खिलाफ संघर्ष का केंद्र बनकर उभरती है। यह उसकी देह और उस देह से प्रेम करने की स्वातंत्र्य अभिलाषा ही है जो समाज में चले आ रहे जातीय मानकों को उलट-पलट कर रख देती है। और जिन्हें बनाये रखने के लिए जाति के ठेकेदारों के लिए उस पर नियंत्रण रखना आनवाय हा जाता है। लोकन आर्ची अपने दिमाग और दिल दोनों को अच्छे से जानती है आर वह अपन परिवार और समाज के दबाव को परे रख इन्हीं की सुनती है। 

सुनती है। ___ यथार्थ में फिल्म की नायिका अर्चना पाटिल अन्य आम लड़कियों की तरह चुपचाप पितृसत्ता की गुलामी को स्त्री का गहना और इज्जत-आबरू मानकर चलने वाली लड़की नहीं है। वह हमारे इस गुलाम स्त्री समाज में एक अपवाद के रूप में है। वह अपना दायित्व किसी दूसरे पुरूष के कंधों पर डाला जाना स्वीकार नहीं करती, चाहे ये कंधे उसके पिता के हों या प्रेमी के जो आगे चलकर उसका पति भी बनता है। इस प्रकार फिल्म में उसकी भूमिका परंपरागत लैंगिक भूमिकाओं को विस्थापित करने वाली है। लेकिन यहाँ यह है आची मिला है उसकी स्वयं कीसे। उसके पिता बाहुबली राजनीतिक गरे यहाँ यह भी ध्यातव्य है कि म दबंग व्यक्तित्व को खाद-पानी की स्वयं की वर्चस्वशील पृष्ठभूमि के पिता का पाटिल परिवार एक राजनीतिक गुंडे का परिवार है। पास लंबे-चौड़े गन्ने के खेत हैं। उसके पिता एक त पिता एक सफल स्थानीय नेता भी आर्ची के चाल-चलन और स्वभाव में आप फिल्म के पहले सिक्वेंस से ही In प्रकार की बाहुबल आधारित मर्दानगी की झलक पाते हैं। उस अपने परिवार की तरफ से एनफिल्ड बुलेट मोटरसाइकिल और ट्रैक्टर चलाने की छूट है। वह स्थानीय लड़कों को भी जब-तब धमकाती रहती है।

लड़कों को भी जब-तब धमकाती रहती है। वह गाँव के बाहर स्थित खुले-चौड़े कुंए में भी बिना किसी भय या संकोच के अधिकारपूर्वक कूदकर नहाती दिखलाई गई है। किंतु उसे यह सब करने की छूट वहीं तक है जहाँ तक उसकी इच्छायें और आजादी उसके अपने परिवार के पुरूष सदस्यों की मर्दानगी से न टकराये। अपने पाटिल परिवार की पितृसत्ता द्वारा निर्धारित हदबंदी में रहकर ही आर्ची अपनी स्त्रैणता से मुक्ति का स्वाद चख सकती है।

का स्वाद चख सकती है। और एक जीवित और आजाद लड़की के रूप में आर्ची की यह आजादी उसके परिवार की आँखों में तब खटकने लगती है जब वे उसे एक मछुआरे के बेटे पाा के प्रेम में पड़ा पाते हैं। पाया का परिवार स्थानीय मुसलमानों के बगल में एक साधारण से घर में रहता है। जिस क्षण आची के घरवालों को इस दलित युवक के साथ उसके संबंध की जानकारी लगती है, उसी क्षण से वे उसके लिए किसी उपयुक्त नरश्ते की तलाश में जुट जाते हैं। फिल्म के पूर्वार्द्ध में ऊपर से देखने पर आर्ची के पाटिल परिवार में अपनी लड़की को दी जा रहा आजादी के पीछे छिपे पंसवाद के लये हाय और नाखून चाहे न दिखाई देते हों, पर पाटिल परिवार के विशाल आलीशान का नाम भी आर्ची के नाम पर ही रखा हा लेकिन एक सार्वजनिक कार्यक्रम आची के पिता ने स्थानीय नेता की हैसीयत से अपने चुनाव क्षेत्र में जो कहा उससे उनके अंदर गहराई में बैठे मर्दवादी अहं का साफ पता चल जाता है। उन्होंने मंच से अपने क्षेत्र के लोगों से पछा था कि क्या वे स्थानीय मामलों में विपक्ष पर भरोसा कर सकते हैं जबकि वे अपनी स्त्रियों के ऊपर भी नियंत्रण नहीं कर सकते? इसप्रकार वे अपने इस भाषण में विपक्ष को नामर्द साबित करते दिखते हैं क्योंकि विपक्ष के लोगों ने अपनी स्त्रियों को जीवन जीने की आजादी दी हुई है! स्पष्ट है कि पाटिल परिवार के इस मुखिया की मर्दानगी का सीधा लक्ष्य है--पाया के साथ अपनी बेटी आर्ची के रिश्ते और उसकी यौनिकता पर शिकंजा कसना। यहाँ पाया के विद्यालय में उसके नये अंग्रेजी अध्यापक ने जिस घृणित और क्रूर सच्चाई को सबके सामने रखा है, उसकी ओर ध्यान आकृष्ट करना भी जरूरी है। यह सच्चाई है पाटिल जैसी उच्च जातियों के पुरूषों का निम्न जातियों की स्त्रियों के साथ नियमित तौर पर बिना किसी लज्जा और दंड के सोना। इस प्रकार एक ओर सवर्ण पितृसत्ता अपनी बेटियों को प्रेम करने की आजादी देने को भी तैयार नहीं है, दूसरी ओर वह दलित स्त्री की यौनिकता को अपने पैरों तले कुचलना अपना अधिकार मानकर चलती है।

अपना अधिकार मानकर चलती है। दलित पाा के साथ आर्ची के संबंध का खुलासा होने के बाद प्रभावशाली पाटिल लोग आर्ची की यौनिकता पर अपनी उच्च जातीय पितसत्ता का नियंत्रण पुनः स्थापित करने के लिए कई कदम उठाते हैं जैसे किसी समकक्ष सुयोग्य पाटिल परिवार के साथ उसका वैवाहिक रिश्ता करने का प्रयास आदि। किंत वे एक और कदम भी उठाते हैं जिसके तहत आर्ची और पाा के प्रेम प्रसंग से खड़े हुये तथाकथित सार्वजनिक बेइज्जती के आख्यान को एक नया रंग देने का प्रयास किया जाता है ताकि मर्दवादी दुनिया में अपने दामन को पाक-साफ साबित किया जा सके और सारा अपराध पाया का ठहराया जा सके। इस योजना के तहत आर्ची पर दबाव डाला जाता है कि वह उन कागजों पर हस्ताक्षर करे जिसमें पाया और उसके मित्रों पर उसके साथ (आर्ची के साथ) बलात्कार करने और अपहरण करने के आरोप जड़े गये थेयह सब इसलिए किया जा रहा था कि यौनिक निष्क्रियता के रूप में उसकी स्त्रैणता को पुनः साबित करने के साथ उसकी और उसके समुदाय की इज्जत की पुनः स्थापित किया जा सके। लेकिन जब आर्ची को इस परे षड्यंत्र का पता चलता है तो वह अपने पाटिल परिवार और जाति के इशारों पर नाचने से इंकार कर देती है और कागजों को फाड़ देती है।

और कागजों को फाड़ देती है। भारतीय जातिवादी समाज में प्रेम से जाति के समक्ष पैदा होने वाले आसन्न संकटों के निवारणार्थ प्रेम में त्याग और कष्ट सहिष्णुता पर एकांगी रूप से बल दिया गया है और दैहिक स्तर से ऊपर उठकर किये जाने वाले प्लूटोनिक प्रेम का महिमा मंडन किया गया है। किंतु आर्ची का प्रेम और उस प्रेम को बचाने के लिए · किया जाने वाला उसका प्रतिरोध अपने को मिटाने वाले आत्मघाती भारतीय प्रेम के आदर्श की भेंट नहीं चढ़ता। वह पाया के साथ अपने घर से भाग निकलती है ताकि अपनी और पाया की जिंदगियाँ बचा सके। अपनी और पाया की जिंदगियाँ बचा सके। वह अपने प्रेम के लिए और अपने जीवन के लिए अपना घर, अपना गाँव छोड़ देतो है। घर-परिवार की पुंसवादी मर्यादा को वरीयता देने वाले आदर्श प्रेम के अनुयायियों को यह पलायन लग सकता है लेकिन यह पलायन नहीं कहा जा सकता। यह तो परिस्थितियों के समक्ष हथियार न डालकर संघर्ष करने की जद्दोजहद है क्योंकि अपनी और अपने प्रेम की रक्षा करके ही आप आगे संघर्ष कर सकते हैं।

संघर्ष कर सकते हैं। वैसे तमाम किंतु-परंतु के बावजूद किसी भी स्त्री के लिए अपने बचाव का सबसे सुरक्षित क्षेत्र अंततः सदैव से परिवार ही रहता आया है। लेकिन यह एक ऐसी संस्था है जो नियंत्रणकारी भूमिका में रहती है और बहुत ही घातक ढंग से दमनकारी भी हो सकती है। लेकिन फिर भी यह आपको आश्रय और सांत्वना देती है। जब आप सब जगह से निराश हो जाते हैं तो हारकर फिर परिवार में ही लौटते हैं। परिस्थितियों के कारण आर्ची को अपनी उम्र से कहीं ज्यादा बढ़कर वयस्क होना पड़ा है किंत आर्ची के चरित्र को भी इस संघर्ष से गुजरना पड़ता है। जब वह अपनी नई साथी से अपने अतीत और घर पर पीछे छुट गये परिवार के बारे में बताती है तो वह अपने घरवालों को अनिवार्यतः अच्छे लोग ही बताना पसंद करती है। महानगर की मलिन बस्ती में अपने नये घर की गंदगी के बीच वह अपने साफ-सथरे बंगले को बहत याद करती है। वह अपनी माँ और अपने परिजनों की कमी महसूस करती है। वह अपने पिता द्वारा माफ कर दिये जाने के लिए तरसती हैपीछे छूट गये अपने घर और परिवार की यादें और परिजनों की चिंता उसे अंदर ही अंदर खाये जाती है। ये चिंता उसे अंदर ही अंदर अतीत की सुखद स्मृतियाँ और वर्तमान के अभाव ही थे जो भावावेग में उसे अपने प्रेमी पाया को छोड वापिस घर लौटने को विवश कर जाते हैं। यह अलग बात है कि अपनी गलती का अहसास और यथार्थ की भयावहता से साक्षात्कार के बाद वह पुनः बीच रास्ते से पाया के पास लौट आती है। किंतु - विवाह के उपरांत भी, पर्याप्त पैसा कमाने और अपना फ्लैट खरीद लेने के बाद भी, - पटरी से उतर चुकी जीवन की गाड़ी के पुनः पटरी पर आ जाने के बाद भी वह जानना चाहती है कि उसके तात्या कभी उससे ..बात भी करेंगे या नहीं, उनकी माफी ही उसके लिए सर्वोपरि रहती है। वर्षों बाद उसके लिए सर्वोपरि रहती है। वर्षों बाद जब फोन के माध्यम से वह पुनः अपने ..घरवालों के साथ संपर्क साधती है तो बारंबार उनके सामने अपना यही प्रश्न दोहराती है। लेकिन कुछ सांस्कृतिक-पारिवारिक कानून ऐसे होते हैं जिनके उल्लंघन पर कोई रहम, कोई माफी नहीं मिल सकती। अपने ही पिता और भाई से भी आप उदारता की आशा नहीं कर सकते चाहे वे आपके प्रति कितने ही स्नेहिल रहे हों। आर्ची की यौनिकता पर नियंत्रण के पाटिल परिवार के प्रयास आखिरकार उस नशंसता पर जा करके ही दम लेते हैं जहाँ आर्ची और उसके पति पाया को मरना ही थाआर्ची के स्वयं के भाई और चाचा-ताऊ ही उनकी हत्याओं के निमित्त बनते हैं। पितसत्ता का दोहरा चरित्र इस हत्याकांड से ठीक पहले भी आपको दिखाई देता है जब अपनी बेटी के अंतर्जातीय विवाह और घर छोड़ देने से टूट चके उसके पिता को आप महाराष्ट्र की स्त्री नेताओं की परंपरा पर एक मंच से बोलते पाते हैं। हकीकत में समय के दबाव के सामने पितसत्ता को जब-तब झकना भी पड़ रहा है लेकिन उसके मूल चरित्र में आज भी कहीं कोई विशेष बदलाव नहीं आ पाया है।

. कई सवर्ण आलोचकों के पेट में इस बात से दर्द हो रहा है कि 'सैराट' में जाति का जब नामोल्लेख ही लगभग नहीं है तो क्यों इसे दलित निर्देशक की दलित चेतना संपन्न फिल्म कहा जा रहा है। असल में इन्हें एक दलित निर्देशक की बाक्स ऑफिस पर यह सफलता पच नहीं पा रही है। किसी दलित फिल्म को अकादमिक इनाम- विनाम देने तक तो ये किसी तरह सहन कर जाते हैं क्योंकि राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त - फिल्में आम दर्शक की पहँच से दर होने के कारण व्यापक प्रभाव नहीं डाल पाती और ब्राह्मणवादी पूर्वाग्रहों के सामने उनसे तात्कालिक खतरा खड़ा नहीं होता। अंगेजी उप शीर्षक के साथ प्रदर्शित इस फिल्म में पाटिल के घर को एक उच्च जाति का घर बताया गया है जबकि मूल मराठी संस्करण में मराठी संवादों में बारंबार पाटिल और आर्ची के लिए 'मोठ्या घरताले' शब्द का इस्तेमाल हुआ है जिसका शाब्दिक अर्थ होता है बड़े घर वाला। किसी भी समद्ध परिवार से ताल्लुक रखने वाले व्यक्ति के लिए इसका इस्तेमाल किया जाता है। असल में भारतीय समाज में वर्ग और जाति को आप एक-दसरे का लगभग पर्याय मान सकते हैं। यहाँ जो दलित हैं, वे प्रायः सर्वहारा भी हैं और जो उच्च जातियाँ हैं, वे कमोबेश रूप से मालदार तबके से आती हैं।

किंतु जाति का चाह मुखर अभिव्यक्ति शाब्दिक स्तर पर न हुई हो लेकिन पी फिल्म में शुरू से लेकर अत तक इसकी व्यंजना होती चली गई है। आर क्लाइमेकर के चरम तक पहुंचते-पहुचत जातीय भेदभान और उत्पीड़न की गूज इतनी तीखी और तीव्र हो जाती है कि आप दोनों हाथों में अपने कान बंद कर लेन पर भी उस गॅज को सुने बिना नहीं रह सकते। फिल्म के अंतिम दृश्यों का खामाशा बिना कुछ कहे, भी सब कुछ कह जाता है। नागराज मंजले का संदेश साफ-साफ आपके दिल और दिमाग का झकझार कर रख दता है कि जब आप स्त्री और उसकी इच्छाओं व यौनिकता के नियंत्रण को सामने लात हैं तो आप जाति पर भी साथ-साथ प्रकाश डाल रहे होते हैं । स्त्री और जाति के सवाल एक-दूसरे से नाभिनाल आवद्ध है।.साथ विचारन क लिए बाध्य कर दता है। फिल्म के अंत में अदर तक चीर कर रख देने वाली जो चुभने वाली खामाशा है, उस पर स्वयं नागराज मंजुले ने द हिंदू क साथ एक साक्षात्कार में जो कहा है, वह अत म .हमे जरूर देखना चाहिए "मूलतः यह एक गहन उदासी है। विभिन्न तरीकों से आप भी बिल्कुल इसे व्यक्त करते है। कई बार आप क्रोधित हो जाते हैं, अन्य समय आप स्तब्ध हो जाते हैं। मैं फिल्म के अंत वाला स्तब्धता में श्रोताओं को सुनाना चाहता था। हम अखबारों में त्रासदियों के बार में पढ़ते हैं किंतु अविचलित रह जाते हैं। म देखना चाहता था कि लोग स्वयं को सुनेंग कि नहीं, अपनी स्वयं की सिसकियों को मान में सुनेंगे कि नहीं। मैं उन्हें (सिसाकया का) बाहर खींच ले आना चाहता था। म यह देखना चाहता था कि जो झिंगाट गाने पर नाचने वाले हैं, क्या वे चिंतनशील मनोदशा के साथ बाहर निकलते है या नहीं।" 

"हम बेशक आसमान में उड़ रहे हो पर हमारा जमीन से नाता नहीं टूटना चाहिए। पर अगर हम अर्थशास्त्र और राजनीति की जरूरत से ज्यादा पढ़ाई करते हैं तो जमीन से हमारा नाता टूटने लग जाता है। हमारी आत्मा प्यासी होकर तन्हा हो जाती हैहमारे राजनीतिक मित्रों को उसी प्यासी आत्मा की स्थिति से रक्षित रखने और बचाने की जरूरत है और इस उद्देश्य के लिए शिक्षाविदों, वैज्ञानिकों, कवियों, लेखकों और कलाकारों के रूप में नामित सदस्य यहाँ (राज्यसभा में) उपस्थित हैं'  

यह राज्यसभा में फिल्मों और थियेटर के दिग्गज पृथ्वीराज कपूर के भाषण का एक अंश हैं। उन्होंने इस बेहतरीन व्याख्या के जरिये राज्यसभा में कलाकार के रूप में नामित सदस्यों की भूमिका को स्पष्ट किया। यह साबित हुआ. कि संसद के उच्च सदन में उनका नामांकन कितना उचित था। प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू पृथ्वीराज के बड़े प्रशंसक थे। पृथ्वीराज को वे दो बार, वर्ष 1952 में दो साल के लिए और फिर वर्ष 1954 में पूर्ण काल के लिए राज्यसभा का सदस्य नामित किया गया। पुस्तक थिएटर के सरताज पृथ्वीराज" (प्रकाशक: राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय) में योगराज लिखते हैं कि पृथ्वीराज राज्यसभा में अपने नामांकन को लेकर दुविधा में थे। बकौलपृथ्वीराज, "थिएटर की भलाई और राज्यसभा की व्यस्तताएं, पर क्या किया जाए! मुझे इन परिस्थितियों का मुकाबला तो करना होगा। थिएटर को भी जिंदा रखना है और सरकार के इस सम्मान को भी निभाना है। दूसरा कोई चारा नहीं है चलो थिएटर की सलामती के लिए और बेहतर लड़ाई लड़नी होगी।" . 

"राज्य सभा के नामांकित सदस्य पुस्तिका" (प्रकाशकराज्यसभा सचिवालय) के अनुसार, पृथ्वीराज कपूर ने सदन के पटल पर नामजद सदस्यों (जिसका संदर्भ मैथिलीशरण गुप्त का था) के अपने आकाओं के विचारों को व्यक्त करने के आरोप का खंडन करते हुए कहा, "जब यहां अंग्रेजों का राज था और जनता पर दमिश्क * की तलवार लटक रही थी तब मैथिलीशरण गुप्त जैसे क्रांतिकारी थे, जिनमें भारत भारती लिखने का साहस था। - ऐसे में, उस समय हिम्मत करने वाले निश्चित रूप से आज अपने मालिकों के समक्ष नहीं नत मस्तक होंगेवे (नामजद सदस्य) तर्क और प्रेम के सामने झुकेंगे और न कि किसी और के सामने। पृथ्वीराज कपूर ने देश की सांस्कृतिक एकता के अनिवार्य तत्व को रेखांकित करते हए 15 जुलाई 1952 को राज्यसभा में एक राष्ट्रीय थिएटर के गठन का सुझाव दिया था। जिसके माध्यम से विभिन्न संप्रदायों और भिन्न-भिन्न भाषाएं बोलने वाले व्यक्तियों को एक साथ लाने और एक समान मंच साझा करने तथा जा सकें। "उचित व्यवहार सीखने के अवसर प्रदान किए जा सकें।

वर्ष 1954 में संगीत नाटक अकादमी के "रत्न सदस्यता सम्मान' से सम्मानित होने के बावजूद उन्होंने पृथ्वी थिएटर के लिए किसी भी तरह की सरकारी सहायता लेने से इंकार कर दिया। भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने उन्हें कई सांस्कृतिक प्रतिनिधिमंडलों में विदेश भेजा। पृथ्वीराज कपूर, और बलराज साहनी वर्ष 1956 में चीन की यात्रा पर गए एक भारतीय सांस्कृतिक प्रतिनिधिमंडल का हिस्सा थे। .रंगमंच का कलाकार होने और फर्श से अर्श तक पहुँचने के कारण वे रंगमंच की चनौतियों और कलाकारों को रोजमर्रा से परिचित के जीवन में होने समस्याओं से अच्छी तरह से परिचित थे |

उन्होंने राज्यसभा के थे। उन्होंने राज्यसभा के । सदस्य के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान मंचीय. कलाकारों के कामकाज की स्थिति को सुधारने के लिए कड़ी मेहनत की। इसी -लाकारों के लिए रेल किराए में का नतीजा था कि वे मंचीय 75 प्रतिशत की रियायत प्राप्त करने में सफल रहे उनकी MUCHALपोती और पृथ्वी थिएटर CHAND को दोबारा सँभालने वाली संजना कपर के अनसार, "मेरे दादा के कारण ही आज हम 25 प्रतिशत रेल किराए में पुरे देश भर में यात्रा करने में सक्षम हैं अन्यथा हम अपना अस्तित्व ही नहीं बचा पाते।" इतना ही नहीं, पथ्वीराज ने देश के अनेक शहरों में रवींद्र नाट्य मंदिरों की भी स्थापना की।

थिएटर में रूझान के कारण कानून की अपनी पढ़ाई को बीच में ही छोड़कर पेशावर से मुंबई अपनी किस्मत आजमाने पहुंचे और पृथ्वीराज इंपीरियल फिल्म कंपनी से जड़े। वर्ष 1931 में प्रदर्शित पहली भारतीय बोलती फिल्म 'आलमआरा' में पृथ्वीराज ने बतौर सहायक अभिनेता काम करते हुए चौबीस वर्ष की आय में ही अलग-अलग आठ दाढ़ियां लगाकर जवानी से बढापे तक की भूमिका निभाई। फिर राज रानी (1933), सीता (1934). मंजिल (1936). प्रेसिडेंट, विद्यापति (1937). पागल (1940) के बाद पृथ्वीराज फिल्म सिकंदर (1941) की सफलता के बाद कामयाबी के शिखर पर पहंच . गए। उनकी अंतिम फिल्मों में राज कपूर की 'आवारा' (1951), 'कल आज और कल', जिसमें कपूर परिवार की(195 तीन पीढियों ने अभिनय किया था और ख्वाजा अहेमदन अब्बास की 'आसमान महल' थी। उन्होंने कुल नौ मूक और 43 बोलती फिल्मों में काम किया।

हिंदी सिनेमा के सितारे पृथ्वीराज कपूर ने कनॉट प्लेसः के सिनेमाघरों में कई नाटकों का प्रदर्शन किया। 

फिल्मों का वित्तीय प्रबंधन और ।९व्यापार शुरू से से ही भारत की आर्थिक राजधानी माने जाने वाले महानगर मुंबई में केंद्रित है। समयांतर के इस अंक के अर्थातर स्तंभ में हम भारत की फिल्मों के पीछे ही नहीं बल्कि और आगे के भी वित्तीय प्रबंधन और व्यापार आदि की संपुष्ट चर्चा करेंगे।शुरुआत लॉन टेनिस के पूर्व खिलाड़ी आनंद अमृतराज के एक कथन से है, जो उन्होंने फिल्म एवं मनोरंजन के वैश्विक व्यवसाय पर भारतीय वाणिज्य एवं उद्योग मंडल परिसंघ (फिक्की) द्वारा मुंबई में. केंद्रित वार्षिक सम्मेलन, फिक्की फ्रेम्स, में कुछेक बरस पहले कही थी। उनका कहना था कि अमेरिका के हॉलीवुड में बनने वाली किसी भी फिल्म के बजट का अधिसंख्य भाग उसकी . 'स्टोरीलाइन' पर खर्च किया जाता है।जो उन्होंने खुल कर नहीं कहा वो यह है हिंदुस्तानी फिल्मों में, जिनमें बॉलीवुडयानी मुंबईया और तेलुगु, तमिल, मलयालम, कन्नड़, मराठी, बांग्ला से लेकर भोजपुरी जैसी अन्य भाषाओं, बोलियों की हर बरस बनने वाली सैंकड़ों फिल्में भी शामिल हैं। - .

आनंद अमृतराज, भारतीय मूल के ही चर्चित . आनंद अमृतराज, भारतीय मूल केही चर्चित पूर्व टेनिस खिलाड़ी विजय अमृतराज के बड़े भाई हैं।अमृतराज बंधू अब अमेरिका में बस गए हैं।वे हॉलीवुड की फिल्मों के निर्माण आदि के व्यवसाय में लगे हुए हैं। विजय अमृतराज ने जेम्स बांड श्रृंखला की एक फिल्म ऑक्टोपुसी में काला' खलनायक की भूमिका निभाई थीसब जानते हैं किजेम्स बांड श्रृंखला की फिल्में, इयान फ्लेमिंग की कहानियों पर आधारित हैं। उनकी सारी कहानियों परजेम्स बांड शृंखलाकी फिल्में बन चुकी हैं। फिर भी शीत युद्ध की पृष्ठभूमि में कल्पित गोरा, ग्लैमरस, ब्रिटिश खुफिया एजेंट नायक, जेम्स बांड श्रृंखला की फिल्में बनती रहती हैं तो उसका कारण अश्वेतों परश्वत का प्रभुत्व बनाए रखने की कोशिश के अलावा फिल्मों के वित्त-व्यापार का विशाल वैश्विक मुनाफा में हिस्सा भी लेना है। हम औपनिवेशिक ताकतों के सैन्य और वैचारिक प्रभुत्व की अभिलाषा में हॉलीवुड में बनाई जाने वाली फिल्मों के वैश्विक व्यापार पर और कोई चर्चा, भारतीय धरातल पर फिल्मों के निर्माण में लगने वाली पूंजी और उस पूंजी से होने वाली कमाई आदि का मूल्यांकन करने के बाद करेंगे। 

बताया जाता है कि हिंदुस्तानी फिल्मों के स्टार अदाकार इन दिनों अपने काम के एवज में नगदी और अचल संपत्तियों के अलावा संबंधित फिल्म के किसी घरेलू टेरिटरी अथवा समुद्रपारीय वितरण के अधिकार भी लेने पर जोर देने लगे हैं। यह उनकी कमाई में कालाधन छिपाने का एकजरिया भी माना जाता है। फिल्मों के समुद्रपारीय वितरण, संगीत, टेलीविजन . प्रसारण ही नहीं उन फिल्मों के सीक्वेल - - प्रीक्वेल' के अधिकारों की भी खरीद-फरोख्त अलग से होती है। भारत में कॉपीराइट कानूनों पर अमल में प्रयाप्त सख्ती न होने की वजह से दूसरे देशों की फिल्मों की नकल पर हिंदुस्तानी फिल्में खूब बनती रही हैं। कुछ ऐसे भी दृष्टांत हैं कि हॉलीवुडके फिल्म निर्माताओं ने अपने हॉलीवुड की ही फिल्मों की नकल पर बनी हिंदुस्तानी फिल्मों के प्रीक्वेल.अथवा सीक्वेल के राइट्स खरीदने की कोशिश की ताकि वे अपने देश में सख्त कॉपीराइट्कानूनों की गिरफ्त से बच सकें। 

सख्त कॉपीराइट्कानूनों की गिरफ्त से बच सकें। अपुष्ट चर्चा है कि इसी कारण हॉलीवुड फिल्म निर्माताओं ने राजकुमार हिरानी द्वारा बनाई गई और संजय दत्त अभिनीत 'मुन्ना भाई' श्रृंखला के सीक्वेल -प्रीक्वेल अधिकारों की खरीद की कोशिश की। कॉपीराइट्स के खरीद-फरोख्त के बढ़ते भारतीय और वैश्विक व्यापार पर चर्चा हम बाद में करेंगे।

हम बाद में करेंगे। ... फिल्मों के वितरण के लिहाज से अर्से पहले मुंबई, दिल्ली-यूपी, ईस्ट पंजाब, सीपी (सेंट्रल प्रोविंस), सीआई (सेंट्रल इंडिया), राजस्थान, निजाम, मैसूर, वेस्ट बंगाल, बिहार-झारखंड, असम, ओडिसा, टीएनके (तमिलनाडु एंड केरला) के जो.13 क्षेत्र थे वे आज भी लगभग वैसे ही बरकरार है। पहले हर क्षेत्र का एक मुख्य वितरक होता था, जिनके अधीन उस क्षेत्र में अनेक अन्य वितरक होते थे। ये वितरक फिल्म उद्योग में लगाई जाने वाली पूंजी और उस पूंजी की बदौलत की जाने वाली कमाई के धंधे की . रीढ़ की हड्डी माने जाते थे। वे मुख्य वितरक ही फोन से अपने मातहत वितरकों और थिएटर मालिकों आदि के जरिए इस पर नजर रखते थे कि किसी फिल्म की रिलीज के बाद विभिन्न जिलों में प्रदर्शन से कहां कितनी कमाई हुई।वे ही यह सब जानकारी सही-सही या फिर बढ़ाघटा कर फिल्म निर्माताओं को देते थे। अब किसी भी क्षेत्र में कोई मुख्य वितरक नहीं होता। फिल्म वितरण का धंधा बहुत हद तक केंद्रीकृत हो गया है।

है। वरिष्ठ फिल्म पत्रकार -लेखक अजय ब्रह्मात्मज ने बताया कि थियेटरों में फिल्मों के . प्रदर्शन से कमाई का हिसाब-किताब अब मल्टीप्लेक्स युग में और डिजिटल संप्रेषण के नए दौर में बहुत व्यवस्थित हो गया है, जिसमें आसानी से हेरा-फेरी नहीं की जा सकती है। - तरण आदर्श, कोमल नाहटा आदि अनेक फिल्म ट्रेड विश्लेषक देशभर के थिएटरों में फिल्मों के प्रदर्शन के पहले दिन, दूसरे दिन, पहले सप्ताहांत और फिर बाद की भी कमाई का कुल मिलाकर विश्वसनीय लेखा-जोखा सार्वजनिक करते रहते हैं। यह हिसाब -. किताब, निजी क्षेत्र में है और इसमें सरकारी स्तर पर कोई योगदान नहीं है।सूचना-प्रसारण मंत्रालय आदि ने इसके नियमन का कोई कदम नहीं उठाया है।आयकर विभाग को सिर्फ कर वसूली से मतलब है और उसके आगे-पीछे की सांख्यिकी जुटाने की फुरसत नहीं है। फिल्म ट्रेड की पत्रिकाओं में से एक, बॉक्स . ऑफिस इंडिया के सितंबर 2018 के विशेष . वर्षगांठ अंक में पिछले 10 बरस की फिल्मों के बिजनेस का ब्योरा दिया गया है। इसके अनुसार वर्ष 2009-10 में वितरित फिल्मों में से रिलायंस इंटरटेनमेंट की 'थ्री इडियट्स', यूटीवी मोशन पिक्चर्स की राजनीति', यशराज फिल्म्स की सेल्समैन ऑफ द ईयर' यशराज फिल्म्स की सेल्समैन ऑफ द ईयर' और फॉक्स स्टार स्टुडियोज की 'माई नेम इज खान' समेत 38 फिल्मों ने कुल 10,77; 49,91,000 रुपए की कमाई की थी।इन 38 फिल्मों में से सर्वाधिक दस यूटीवी मोशन पिक्चर्स की थीं। लेकिन सर्वाधिक 3, 32, 28, 82, 000 रुपए की कमाई रिलायंस इंटरटेनमेंट की सात फिल्मों से हुई। इसके अगले वित्त वर्ष में वितरित फिल्मों में से 47 ने कुल 14, 32, 17, 58, 000 रुपए की कमाई कीइस वर्ष भी सर्वाधिक कमाई रिलायंस इंटरटेनमेंट की ही थी, जिसकी सर्वाधिक 11 फिल्मों में 'सिंघम' फिल्म शामिल थी। इरोज इंटरनेशनल मीडिया की 'गोलमाल 3' और 'जिंदगी ना मिले दोबारा' समेत आठ फिल्मों की बदौलत यह कंपनी कमाई के मामले में दूसरे नंबर पर रही। नो वन किल्ड जेसिका', 'गुजारिश' आदि अपनी आठ फिल्मों की बदौलत यूटीवी मोशन पिक्चर्स कमाई चार्ट में तीसरे नंबर पर रही। 

फिल्मों में से 47 ने कुल 18, 61, 08,10, 000 रुपए की कमाई की। इस बार कमाई चार्ट में रिलायंस इंटरटेनमेंट सातवें नंबर पर पिछड़ गई। 'रॉकस्टार', 'हाउसफुल 2', 'फेरारी की सवारी' आदि अपनी दस फिल्मों की बदौलत इरोज इंटरनेशनल मीडिया कंपनी कुल 5, 60, 65, 63, 000 रुपए का ट्रेड कर कमाई चार्ट में अव्वल नंबर पर पहुंच गई। अगले बरस वितरित फिल्मों में से 70 की कुल कमाई 25, 94, 09,66, 000 करोड़रुपए पहुंच गई। इसमें सर्वाधिक 87,97, 28, 500 रुपए का हिस्सा 'बर्फी' आदि 12 फिल्में बनाने वाले यूटीवी मोशन पिक्चर्स का था। रिलायंस इंटरटेनमेंट . इस बरस भी पिछड़कर आखरी दूसरे पायदान पर रह गई। वर्ष 2013-14 में वितरित फिल्मों में से 65 में से कुल 24, 45, 46, 63,000 रुपए में से 4, 63, 22, 24,000 रुपए की आमद के साथ शोले 3 डी' आदि दस फिल्में बनाने वाली यूटीवी मोशन पिक्चर्स फिर कमाई चार्ट में अव्वल रही।

पिक्चर्स फिर कमाई चार्ट में अव्वल रही। अगले बरस कुल 25, 93, 06, 00, 000 रुपए · के कमाई चार्ट में 6, 86, 58, 00, 000 रुपए की आमद के साथ 'बजरंगी भाईजान' आदि, नौ फिल्में बनाने वाली इरोज इंटरनेशनल मीडिया अव्वल रही। यही कंपनी 2015-- 16 की भी कुल 23, 55, 65, 00, 000 रुपए की कमाई चार्ट में 5,64, 11, 00, 000 रुपए की हिस्सेदारी के साथ अव्वल रही, जिसकी ..11 फिल्मों में 'बाजीराव मस्तानी' और 'अलीगढ़' शामिल थीं।

वर्ष 2016-17 में वितरित फिल्मों में से 27, 52, 21, 00, 000 रुपए की कमाई चार्ट में अव्वल आने की बाजी, 'बाहुबली : द कन्क्लू जन' आदि 12 फिल्में बनाने वाली कंपनी ए.ए. फिल्म्स ने मारी। वर्ष 2017-18 में वितरित फिल्मों में से अपनी 18 फिल्मों में · 'सिमरन' आदि 12 के फ्लॉप हो जाने के बावजूद सुपर हिट 'फुकरे रिटर्न्स' ब्लॉकबस्टर 'राजी', 'सोनू के टीटू की स्वीटी' और 'स्त्री' की बदौलत ए.ए. फिल्म्स कमाई चार्ट में अव्वल रही। अंबानी उद्योग समूह की वायकॉम 18 मोशन पिक्चर्स की विवादित फिल्म 'पद्मावत' 2, 83, 00; 00, 000 रुपए की कमाई कर आल टाइम ब्लॉकबस्टर करार दी गई।

अजय ब्रह्मात्मज के अनुसार पिछले छह अजय ब्रह्मात्मज के अनुसार पिछले छह सालों में दिल्ली और हिंदी प्रदेशों में हिंदी फिल्मों के दर्शकों की संख्या बढ़ी है। इस बढ़त के बावजूद अभी तक हिंदी फ़िल्मों की कमाई में मुंबई की हिस्सेदारी सबसे ज्यादा होती है। ताजा आंकड़ों के अनुसार इस साल मुंबई की हिस्सेदारी.31.37 प्रतिशत रही है। 2012 में मुंबई की हिस्सेदारी 36:28 प्रतिशत थी। लगभग पांच प्रतिशत की कमी शिफ्ट होकर दिल्ली और दूसरी टेरिटरी में चली गई है। कारोबार के हिसाब से भारत में 13 टेरिटरी की गणना होती है। दशकों से ऐसा ही चल रहा है। इनके नए नामकरण और क्षेत्रों के विभाजन पर कभी सोचा नहीं गया। मसलन, अभी भी सीपी, ईस्ट पंजाब और निजाम जैसी टेरिटरी चलती हैं। राज्यों के पुनर्गठन के बाद इनमें से कई टेरिटरी एक से अधिक राज्यों में फैली हैं। पारंपरिक रूप से दिल्ली और यूपी एक ही टेरिटरी मानी जाती है |

हिंदी प्रदेशों के हिंदी भाषी दर्शक इस भ्रमित गर्व में रहते हैं हिंदी फिल्में उनकी वजह से ही चलती हैं । सच्चाई यह है राजस्थान, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों को मिलाने के बावजूद फिल्मों की कुल कमाई में हिंदी प्रदेशों का प्रतिशत 25 से अधिक नहीं होता। बिहार-झारखंड का ही उदाहरण लें तो इस साल बढ़त के बावजूद उनका योगदान 2.9 प्रतिशत है। मैसूर, ईस्ट पंजाब और बेस्ट बंगाल का योगदान पांच प्रतिशत से अधिक ही है। हिंदीभाषी दर्शकों को निराधार इतराने से निकलना चाहिए। कोशिश होनी चाहिए कि वे थियेटर में जाकर फिल्में देखें। जाहिर सी बात है कि हिंदी प्रदेशों में ज्यों-ज्यों मल्टीप्लेक्स बढ़ेंगे त्यों-त्यों दशकों में इजाफा होगा। 

· पिछले छह सालों में मुंबई समेत सीआई, राजस्थान, निजाम और उड़ीसा में हिंदी फिल्मों के दर्शकों की संख्या में गिरावट आई है, जबकि दिल्ली-यूपी, ईस्ट पंजाब, सीपी, मैसूर, वेस्ट बंगाल, बिहार-झारखंड, असम और टीएनके में हिंदी फिल्मों के दर्शक बढ़े हैं। यह परिवर्तन शुभ है। दर्शकों की तादाद फिल्मों के विषय तय करती है। गौर करें तो पिछले कुछ सालों में हिंदी फिल्मों की कहानियां मुंबई से निकल कर देश के अंदरूनी इलाकों में जा रही हैं। निश्चित ही हिंदी प्रदेशों में हिंदी फिल्मों के दर्शक हैं । यह स्वाभाविक है। दिक्कत यह है ‘कि इन दर्शकों में से अधिकांश सिनेमाघरों में जाकर फिल्में नहीं देखते। इसके कई कारण हैं। सिनेमाघर लगातार टूट और बंद हो रहे हैं। कस्बों के सिनेमाघरों पर ताले लग रहे हैं। पहले रिपीट या देर से रिलीज की सुविधा होने से छोटे । सिनेमाघरों में भी फिल्में आ जाती थीं। अब होकर नई से नई फिल्म रिलीज के दिन ही देश। विदेश में पहुंच जाती है। रिलीज के वीकेंडही दर्शक फिल्में देखना चाहते हैं। सिनेमाघरन होने । से वंचित दर्शक दूसरे प्लेटफॉर्म पर फिल्में देख लेते हैं। मुंबई के निर्माताओं को यकीन नहीं होगा, लेकिन यही कड़वा तथ्य है कि दर्शक स्मार्टफोन पर उनकी ताजा फिल्में देख रहे हैं।

देख रहे हैं। दर्शकों की प्राथमिकताओं का खयाल रखते हुए निर्माताओं, वितरक और प्रदर्शकों को युक्ति निकालनी पड़ेगी। मोबाइल नेटवर्क, डाटा डिस्ट्रीब्यूटर और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म की मदद से वे दर्शकों तक पहुंच कर खो रहे रेवेन्यूको हासिल कर सकते हैं। छोटे और स्मार्ट सिनेमाघरों के निर्माण पर भी ध्यान देने की जरूरत है। कम सीटों और आधुनिक सुविधाओं से लैस सिनेमाघर हों। स्थिति यह है कि राज्यों की राजधानियों के बाहर के शहरों-कस्बों में सिनेमाघर बनाने में प्रशासन और स्थानीय व्यापारियों का ध्यान नहीं है। इसके साथ ही मौजूद मल्टीप्लेक्स में टिकट दर भी कम करनी होगी।

विलेज रॉकस्टार' निर्देशक की तरफ से एक विजुअल ट्रीट है। यहां परिवेश अपनी पूरी प्रामाणिकता के साथ मौजूद है। असम के खुले आसमान के नीचे इस परिवेश को समेटने में फिल्म की निर्देशक रीमा दास ने पर्याप्त धैर्य का परिचय दिया है। इस फिल्म में जितना इत्मिनान खुले आसमान. के नीचे धूप में ऊंघते या मछली फंसने का इंतजार करते बच्चों में दिखता है, रीमा दास का कैमरा भी उतना ही फुरसत में है, छोटे से छोटे, बारीक से बारीक डिटेल को पकड़ने के दौरान वह कोई हड़बड़ी नहीं दिखाता।

पूरी फिल्म में कोई संगीत नहीं है। परिवेश की आवाजें हैं। हवा बहने की, बच्चों के खिलखिलाने और शोर मचाने की, बकरी और गाय की, पत्तों की सरसराहट और बारिश की बूंदों की आवाज । यही सब मिलकर इस फिल्म का बैकग्राउंड संगीत बनता है। रीमा को कहानी कहने की भी बेचैनी नहीं है। यह वजह है कि फिल्म में कोई प्लॉट नहीं है। यही शायद कुछ जगह फिल्म की कमजोरी भी है। फिल्म में दिखने वाले खूबसूरत से खूबसूरत लैंडस्केप लगातार आते हैं तो एक डाक्यूमेंटेशन का आभास देते हैं न कि कहानी कहते दिखते हैं। फिल्म के ज्यादातर विभाग रीमा ने खुद संभाले हैंइस मायने में ये एक सच्ची इंडिपेंडेंट फिल्म है। 

धनु के किरदार में बनिता दास और धनु की मां का रोल करने वाली अभिनेत्री ने दर्शकों को बांधे रखा है। सभी कलाकार नए हैं और गैर-पेशेवर हैं। इसीलिए निर्देशक ने जानबूझकर किसी के चेहरे पर कैमरे का फोकस नहीं रखा। इसकी जगह एक्शन या शारीरिक गतिविधियों पर ज्यादा जोर दिया गया। इसे देखकर पर्ल एस बक के या अमेरिकी लेखकों के उपन्यास याद आ सकते हैं, जहाँ किरदार प्रकृति के विशाल कैनवस के बीच अपनी तमाम आशाओं, उमंगों और उल्लास के साथ नजर आते हैं। बारिश और बाढ़ के दृश्यों में ऐसा विस्तार है जो फिल्मों में दुर्लभ है। फिल्म में हास्य से पगे बहुत से क्षण हैं जो इसे ओढ़ी हुई गंभीरता से बचाते हैं और अलग बनाते हैं। 

इस फिल्म को देखकर 'पाथेर पांचाली' की याद आ सकती है। वैसे ही दृश्य, अपरिपक्व कलाकारों का चयन, बिल्कुल प्रामाणिक परिवेशमगर जो नहीं है वह है मन को झकझोर देने वाले क्षण, भीतर के उल्लास और दुख का बाहर निकलकर स्क्रीन पर छा जाना। इसके बावजूद रीमा की मेहनत और उनकी ईमानदारी को सलाम किया जाना चाहिए। यह फिल्म बेहद विपरीत और जीवन की कठिनतम परिस्थितियों में कुछ बच्चों के माध्यम से उल्लास, उमंग, इच्छाओं और उन्हें हासिल करने की कहानी है। यही वजह है कि इस फिल्म को दुनिया भर में सराहना मिली। क्योंकि रीमा दास एक अंचल की कहानी कहने के साथ-साथ शाश्वत भावनाओं को छूती हैं। 

बात 1970-71 की है। दिल्ली या विश्वविद्यालय में सहमत नाम सीएक कश्मीरी लड़की पढ़ती है। वो बेहद रहमदिल है। पक्षियों से उसे बहुत प्यार है। एक गिलहरी कहीं चलती कार से न कुचल जाए इसके लिए खतरे से खेल जाती है। वो इतनी नाजुक है कि टेटनस की सुई लगवाने से भी डरती है। पर हालात बदलते हैं और उसकी कायापलट हो जाता है। वो भारत की जासूस बनके पाकिस्तान पहुंच जाती है। एक पाकिस्तानी सेना अधिकारी के बेटे से उसका निकाह होता हैभारत- पाकिस्तान युद्ध के पहले दोनों देशों के बीच तनाव बढ रहा है और सहमत खतरों से जूझते हुए भी अपना काम करती रहती है। वो खुफिया जानकारियां भेजती रहती है। भारत के लिए उसके मन में इतना प्यार है कि ये भी नहीं सोचती कि वो जो कर रही है उसका अंजाम क्या होगा? कर रही है उसका अंजाम क्या होगा? आखिर वो पाकिस्तान में है। पति और देश में वो देश को चुनती है। पाकिस्तान में वो दो लोगों की हत्या भी करती है, वरना उसका राज खुल जाता। उसका पति भी भारत की खुफिया एजेंसी की उस कार्रवाई में मारा जाता है जो उसके यानी सहमत को पाकिस्तान से निकालने के लिए की गई थी। ... अपना काम करने के बाद सहमत विधवा होकर अपने देश भारत लौट जाती है।

मेघना गुलजार की नई फिल्म 'राजी' का लब्बोलुवाब यही है। आलिया भट्ट ने इसमें सहमत नाम की उस लड़की का किरदार निभाया है। वैसे तो ये जासूसी कहानी है पर फिल्मों में दिखाई जानीवाली जासूसी कहानियों से काफी अलग। सहमत कोई जेम्स बांड मार्का जासूस नहीं है।

फिल्म में सस्पेंस तो भरपर है लेकिन वैसे एक्शन इसमें नहीं हैं जो. ज्यादातर थ्रिलर फिल्मों में दिखते हैं। एक घरेलू सामान्य औरत घर के सदस्यों के लिए पराठे बनाते हुए और टोस्ट सेंकते हुए किस तरह जाससी करती है और इसी का किस्सा है ये फिल्म। आलिया भट्ट ने जिस किरदार को निभाया है उसके अपने डर और संकोच हैं। सहमत कभी भी पकड़ी जा सकती है। आखिर जिस घर में वो खुफियागिरी कर रही है वो पाकिस्तानी सेना के मेजर जनरल का घर है। उसका राज कभी भी फाश हो सकता है। राज अब खुला तब खुला वाली हालत कई बार पैदा होती है। आलिया ने ऐसी परिस्थिति में फंसी सहमत के मानसिक तनाव के हर क्षण को जिस तरह सामने लाया है वो उनको एक बेहतरीन अभिनेत्री की कतार में खड़ा कर देता है। इसमें संदेह नहीं कि ये अब तक का आलिया भट्ट का सबसे अच्छा काम है। परी फिल्म आलिया या उनके चरित्र पर केंद्रित है। सहमत के पति इकबाल की भमिका में विकी कौशल का काम भी अच्छा है। आलिया भट्ट की असली मां सोनी राजदान इसमें सहमत की मां बनी हैं।

आलिया भट्ट की शानदार भूमिका के अलावा फिल्म तीन और बातों के लिए उल्लेखनीय हएक तो भारत-पाकिस्तान के तनावपूर्ण संबंधों पर आधारित होने के बावजूद किसी तरह के अंधराष्ट्रवाद को नहीं दिखाती। ये राष्ट्रवाद नहीं बल्कि देशभक्ति को दिखानेवाली फिल्म है। दूसरे, ये बड़े ही ताकतवर तरीके से दिखाता है कि मुस्लिम भी, खासकर कश्मीरी मुस्लिम भी, सहज रूप से देशभक्त हो सकते हैं और भारत के लिए अपनी जान की बाजी लगा सकते हैं। सहमत के पिता भी भारत । के लिए पाकिस्तान में जासूसी करते हैं निभाया ये भी फिल्म में दिखाया गया है। जयदीप अहलावत ने जिस भारतीय खुफिया अधिकारी की भूमिका निभाई है वो भी मुस्लिम है। तीसरे ये फिल्म युद्ध की व्ययंता और अमानवीयता को सामने लाती है। जंग में मरनवाले ज्यादातर निरीह और निर्दोष होते हैं। ये अक्सर भुला दिया जाता है। फिल्म इसकी याद दिलाती है। 

 'राजी' हरिंदर सिक्का के उपन्यास 'कॉलिंग सहमत' पर आधारित है। सिक्का भारतीय नौसेना के अधिकारी रहे हैं और कारगिल युद्ध के समय रिटायर्ड सेना के अधिकारी के रूप में हालात का जायजा लेने उस इलाके में गए थे। वहीं उन्होंने एक ऐसी लड़की की जानकारी मिली जो भारत के लिए पाकिस्तान में जासूसी करने गई थी। सहमत उसका वास्तविक नाम नहीं था। लड़की, जो अब इस दुनिया में नहीं है, भारत आने के बाद लंबे समय तक जीवित रही और उसका बेटा भी भारतीय सेना में या! वो खुद गुमनाम-सी रही और भारत पाकिस्तान युद्ध के इतिहास में उसका नाम दर्ज नहीं है। इसीलिए ये फिल्म उन अनाम लोगों की याद में भी है जो भारत-पाक युद्ध के समय मोर्चे पर नहीं थे पर देश के लिए अपने को या तो कुर्बान कर रहे थे या कुर्बान होने को तैयार थे। युद्ध में सिर्फ सैनिक नहीं लड़ता, सिर्फ वही नहीं मरता और लोग भी तड़ते हैं और मरते हैं।

- मेघना गुलजार की इस फिल्म को देखने के बाद 2017 में संकल्प रेड्डी के निर्देशन में आई फिल्म 'द गाजी अटैक की याद आती है। उसमें ये दिखाया गया या कि 1971 भारत-पाक युद्ध के समय पाकिस्तान ने भारतीय युद्धपोत 'आईएनएस विक्रांत' को ध्वस्त करने के लिए गुप्त तरीके से अपने युद्धपोत 'पीएनएस गाजी' को भेजा था। 'राजी' में ये जिक्र आता है, कि सहमत ने ये खुफिया जानकारी मंत्री थी कि पाकिस्तान नौसेना के माध्यम से कोई भारत के खिलाफ कोई बड़ी कार्रवाई करने जा रहा है। इस तरह का संदेश उस लड़की ने भारतीय खुफिया एजेंसी को भेजा था जिसका हरिंदर सिक्का की किताब में उल्लेख है। वक्त आ गया है कि सहमत के असली नाम को सामने लाया जाए। हरिंदर सिक्का ने अपने एक साक्षात्कार में कहा है कि 1971 के युद्ध के दौरान पाकिस्तान के फौजी शासक और तत्कालीन राष्ट्रपति के यहां यही कश्मीरी लड़की बच्चों को पढ़ाती थी और भारत के लिए खुफियागिरी करती थी।

लेखक : मनोज चतुर्वेदी

किसी विश्व चैंपियनशिप में राष्ट्र गान के बजने पर हर भारतीय को गर्व होना स्वाभाविक है। बैडमिंटन में अब तक भारतीयों को यह गौरव हासिल नहीं हो सका था। पर पीवी सिंधु ने बासिल में विश्व चैंपियन बनकर यह गौरव दिला दिया है। असल में स्वर्ण पदक जीतने वाले खिलाड़ी के देश की राष्ट्र धुन ही पदक समारोह में बजती है। सिंधु के विश्व चैंपियन बनने पर जब यह धुन बजी तो सिंधु की आंखें में भी खुशी में गीली हो गई। सिंधु ने भारत लौटने पर कहा भी कि राष्ट्र गान बजने पर वह अपनी भावनाओं पर काबू नहीं रख पाई और उसकी आंखों में आंसू छलक पड़े। सिंधु को यह सफलता भले ही तीसरे प्रयास में मिली है पर यह गौरव हासिल करने वाली वह पहली भारतीय हैं। वह पिछले दो मौकों पर फाइनल में पहुंचने के बाद भी खिताब का सपना साकार नहीं कर सकीं थीं। 2017 में तो वह नोजोमी ओकुहारा से मैराथन मुकाबले में हारीं और पिछले साल केरोलिना मारिन के हाथों हारकर खिताब से हाथ धो बैठीं थीं।

  पीवी सिंधु ने का यह विश्व चैंपियनशिप में पांचवां पदक है। वह अब तक इस स्वर्ण के अलावा दो रजत और दो कांस्य पदक जीत चुकी हैं। इस तरह उन्होंने चीनी खिलाड़ी झांग निंग के विश्व चैंपियनशिप में पांच पदकों के रिकॉर्ड की बराबरी कर ली है। चीनी खिलाड़ी भी सिंधु की तरह लंबे कद की खिलाड़ी थीं और दोनों के खेल में  काफी समानता दिखती है। पर उनके पास सिंधु जैसे तूफानी स्मैश नहीं थे। सिंधु ने फाइनल में ओकुहारा को फतह करने के दौरान तेज स्मैशों से ही जीत की राह बनाई।

अगर हम सिंधु के स्मैशों की तेज गेंदबाजों से तुलना करें तो 100 मील की रफ्तार वाले शोएब अख्तर भी उनके सामने बौने नजर आते हैं। बैडमिंटन में आई रैकेट की नई स्ट्रिंग की वजह से ही यह संभव हो पाया है।

  पीवी सिंधु विश्व खिताब जीतने वाली पहली भारतीय  शटलर हैं। उन्होंने ओकुहारा को फतह करने के दौरान जिस तरह की फिटनेस का प्रदर्शन किया, वैसी फिटनेस अन्य किसी खिलाड़ी में देखने को नहीं मिलती है। सिंधु ने फाइनल में हारने के ऊपर लगे टैग को हटाने के लिए जी तोड़ मेहनत की है। उनके खेल की कुछ खूबियां हैं, जिन्होंने उन्हें विश्व चैंपियन तक पहुंचाया है। स्मैश लगाते वक्त पूरी छलांग लगाती हैं, जिससे उनके स्मैश के लौटकर आने की उम्मीद कम हो जाती है। इसके अलावा वह शटल को अपने से आगे रहने पर ही प्रहार करती हैं। वह 350 से लेकर 360 किमी प्रति घंटे की रफ्तार वाले स्मैशों को अच्छे कोंण भी देती हैं। इससे विपक्षी खिलाड़ी गति और कोंण से मात खा जाता है। सिंधु के इस खेल में पांच फुट11 इंच का कद भी अहम भूमिका निभाता है।

  सिंधु के खेल में आए बदलाव में अहम भूमिका कोरियाई कोच किम जी ह्युन ने निभाई है। किम खुद भी हिरोशिमा एशियाई खेलों की स्वर्ण पदक विजेता हैं। पुलेला गोपीचंद ने इस साल अप्रैल में ही उन्हें अपनी अकादमी के साथ जोड़ा है। किम का मानना है कि आप जब उच्च स्तर पर खेलते हैं तो आपका स्मार्ट होना बेहद जरूरी है। इसके लिए वह तकनीक के साथ-साथ हिटिंग पॉवर और मानसिक मजबूती के तालमेल को जरूरी मानती हैं। उन्होंने सिंधु के नेट पर खेल को सुधारने के अलावा उन्हें मानसिक रूप से मजबूत बनाया। इसका ही परिणाम था कि वह पिछली दो विश्व चैंपियनशिपों के फाइनल में हारने के बावजूद इस बोझे के साथ कभी खेलती नहीं दिखीं। इसका ही परिणाम है कि उन्होंने सेमीफाइनल में चेन यू फेई और फाइनल में ओकुहारा के खिलाफ मुकाबला जिस एकतरफा अंदाज में जीता, ऐसा प्रदर्शन करते वह किम के आने से पहले कभी नजर नहीं आई थीं। इसके अलावा किम यह भी मानती हैं कि आप क्या रणनीति बना रहे हैं, इसकी जानकारी सामने वाले खिलाड़ी को नहीं होनी चाहिए। इससे पहले सिंधु ओकुहारा के खिलाफ उसके लंबी रैलियों के ट्रेप में फंसती नजर आती थीं। पर इस बार लंबी रैलियों में फंसने के बजाय वह रैलियों को खत्म करने की रणनीति के साथ खेलीं।

  पीवी सिंधु को अपने शरीर को इसी शेप में अगले तीन चार साल बनाए रखने में सफल रहती हैं तो यह सिंधु युग कहलाना तय है। हाल फिलहाल तो उनकी निगाह कुछ सुपर सीरीज खिताब जीतकर अगले साल टोक्यो में होने वाले ओलंपिक खेलों में स्वर्ण पदक जीतने पर होगी। सिंधु का यही खेलना का अंदाज रहा तो उनका टोक्यो से स्वर्ण पदक के साथ लौटने की उम्मीद की जा सकती है।

लेखक : मनोज चतुर्वेदी

इंग्लैंड में हुए आईसीसी क्रिकेट विश्व कप में टीम इंडिया खिताब जीतने के इरादों में तो सफल नहीं हो सकी। पर इस अभियान के दौरान एक नायाब प्रशंसक जरूर मिल गई। यह प्रशंसक कोई और न होकर 87 वर्षीय चारूलता पटेल हैं। उन्होंने अपने जज्बे से साबित किया है कि उम्र के कोई मायने नहीं होते। वह ऐजबेस्टन पर भारत और बांग्लादेश के बीच खेले गए मैच को देखने के लिए व्हील चेयर पर आई थीं और वह इस मैच में रोहित शर्मा के शतक लगाने के दौरान लगातार पीले रंग का बिगुल (वुवुजेला) बजाकर लगातार भारतीय टीम का उत्साहवर्धन कर रहीं थीं। इससे यह बुजुर्ग चारूलता सोशल मीडिया पर एकदम से लोकप्रिय हो गई।

  यही नहीं उनके इस प्रयास पर भारतीय कप्तान विराट कोहली और रोहत शर्मा चारूलता पटेल से मिलने गए और उनका आशीर्वाद लिया। इन दोनों क्रिकेटरों का इस महिला से मिलना सोशल मीडिया पर ट्रेंड कर गया। विराट ने ट्वीट करके इस महिला का आभार जताते हुए कहा कि मैं सभी प्रशंसकों और खासकर चारूलता पटेल जी को प्यार और सहयोग के लिए धन्यावाद देना चाहेंगे। विराट ने उन्हें भारत के अन्य मैचों को देखने आने पर मैच देखने की व्यवस्था करने का प्रस्ताव भी दिया। इस सबसे चारूलता की लोकप्रियता इतनी बढ़ी कि पेप्सीको ने विश्व कप के दौरान चले स्वैग स्टार कैंपेन में शामिल कर लिया। इस कैंपेन से प्रियंका चोपड़ा जैसी अभिनेत्री जुड़ी हुई थीं।

  इस मैच में भारत बांग्लादेश को फतह करके सेमीफाइनल में स्थान पक्का करने में सफल हुआ था। चारूलता पटेल ने मैच में भारत को जीतने के लिए शुभकामनाएं दीं और कहा कि मैं चाहती हूं कि भारत विश्व कप जीते। यह पहला मौका नहीं था, जब वह भारतीय टीम की हौसलाअफजाई के लिए मैदान में आई थीं। वह तो 1983 में कपिलदेव की अगुआई में भारत के पहली बार विश्व चैंपियन बनने के समय भी मैदान पर मौजूद थीं। वैसे वह क्रिकेट की दीवानी और भी पुरानी हैं। 1975 में पहले विश्व कप में वेस्ट इंडीज के चैंपियन बनने के समय कप्तान क्लाइव लॉयड के ट्रॉफी उठाने के मौके की वह साक्षी बनीं थीं।

  चारूलता पटेल की इस मौजूदगी पर कमेंटेटर हर्षा भोगले की टिप्पणी काफी सही लगती है। उन्होंने कहा कि इस फैन को देखकर बहुत अच्छा लग रहा है। इस तरह के फैंस की वजह से ही क्रिकेट और रोमांचक बन गया है।

मुंबई के गोरे गाँव में लड़कों का एक समूह अक्सर फिल्मों का पहला शो देखा करता था |

फिल्म देखने के बाद वो लोगों को बताते कि फिल्म कैसी है | एक दिन निर्माता निदेशक व्ही शांताराम फिल्म देखने आए हुए थे | उन्होने लड़कों के समूह में एक लड़के को फिल्म के बारे में बात करते देखा |

व्ही शांताराम उस लड़के से काफी प्रभावित हुए और उन्होने निश्चय किया कि वह उसे अपनी फिल्म में काम करने का मौका देंगे | उन्होने उसे अपने पास बुलाकर अपनी फिल्म “गीत गाया पत्थरों ने” में काम करने की पेशकश की | यह लड़का रवि कपूर था जो बाद में फिल्म जगत में जितेंद्र के नाम से मशहूर हुआ |

7 अप्रैल 1942 को एक जौहरी परिवार में जन्मे जितेंद्र का रुझान बचपन से ही फिल्मों की ओर था और वो अभिनेता बनना चाहते थे |

वो अक्सर घर से भाग कर फिल्म देखने जाया करते थे | जितेंद्र ने अपने सिने करियर की शुरुवात 1959 में प्रदर्शित फिल्म “नवरंग” से की जिसमें उन्हें छोटी सी भूमिका निभाने का मौका मिला |

लगभग 5 वर्ष तक जितेंद्र फिल्म इंडस्ट्री में अभिनेता के रूप में काम पाने के लिए संघर्ष कर रहे थे | वर्ष 1964 में उन्हें व्ही शांताराम की फिल्म “गीत गाया पत्थरों ने” में काम करने का अवसर मिला जिस फिल्म के बाद जितेंद्र अपनी फिल्म बनाने में कामयाब हो गए | वर्ष 1967 में उनकी एक और सुपरहिट फिल्म फर्ज प्रदर्शित हुई | रवीकान्त नागाइच द्वारा निर्देशित फिल्म में जितेंद्र ने डांसिंग स्टार की भूमिका निभाई | इस फिल्म में उन पर फिल्माया गीत “मस्त बहारों का मै आशिक” श्रोताओं और दर्शकों के बीच काफी लोकप्रिय हुआ जिसके बाद जितेंद्र को जंपिंग जैक कहा जाने लगा इस सफलता के बाद डांसिंग स्टार के रूप में जितेंद्र की छवि बन गई | इस फिल्म के बाद अधिकांश फिल्म निर्माताओं ने जितेंद्र को नृत्य करने में सक्षम नायक के रूप में पेश किया , इन फिल्मों में हमजोली और कारवां जैसी सुपरहिट फिल्में शामिल हैं |

इस बीच जितेंद्र ने जीने की राह , दो भाई और धरती कहे पुकार के जैसी फिल्मों में हल्के-फुल्के रोल कर अपनी बहुआयामी प्रतिभा का परिचय दिया |

वर्ष 1973 में प्रदर्शित फिल्म जैसे को तैसा के हिट होने के बाद फिल्म इंडस्ट्री में उनके नाम के डंके बजने लगे और वो एक के बाद एक कठिन भूमिकाओं को निभाकर फिल्म जगत में स्थापित हो गए |

सत्तर के दशक में जितेंद्र पर आरोप लगने लगे कि वह केवल नाच गाने से भरपूर रूमानी किरदार ही निभा सकते हैं | उन्हें इस छवि से बाहर निकालने में निर्माता-निर्देशक गुलजार ने मदद की और उन्हें लेकर परिचय , खुशबू और किनारा जैसी पारिवारिक फ़िल्मों का निर्माण किया |

इन फ़िल्मों में उनके संजीदा अभिनय को देखकर दर्शक आश्चर्यचकित रह गया | जितेंद्र के सिने करियर पर नज़र डालने पर पता लगता है कि वह मल्टी स्टारर फिल्म का अहम हिस्सा रहें हैं |

फिल्मी पर्दे पर जितेंद्र की जोड़ी रेखा के साथ खूब जमी तो वहीं 80 के दशक में उनकी जोड़ी अभिनेत्री श्रीदेवी और जयाप्रदा के साथ खूब पसंद की गई | अपनी अनूठी नृत्य शैली के कारण इस जोड़ी को दर्शकों ने सिरआंखो पर बैठाया |

वर्ष 1982 से 1987 के बीच जितेंद्र ने दक्षिण भारत के फ़िल्मकार टी रामाराव , के राघवेंद्र राव आदि की फ़िल्मों में भी काम किया | नब्बे के दशक में अभिनय में एकरुपता से बचने और स्वयं को चरित्र अभिनेता के रूप में भी स्थापित करने के लिए उन्होने खुद को विभिन्न भूमिकाओं में पेश किया |

वर्ष 2000 के दशक में फ़िल्मों में अच्छी भूमिकाएँ नहीं मिलने पर उन्होने फ़िल्मों में काम करना काफी हद तक कम कर दिया | इस दौरान वह अपनी पुत्री एकता कपूर को छोटे पर्दे पर निर्मात्री के रूप में स्थापित करने के लिए उनके मार्गदर्शक बने रहे | जितेंद्र ने चार दशक लंबे सिने करियर में 250 से भी अधिक फिल्मों में अपने दमदार अभिनय से दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया |