Sunday, 24 May 2020 03:56

एक फिल्म जिसमें जिंदगी जैसा इत्मिनान है 

Written by दिनेश श्रीनेत - फिल्म समीक्षा
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विलेज रॉकस्टार' निर्देशक की तरफ से एक विजुअल ट्रीट है। यहां परिवेश अपनी पूरी प्रामाणिकता के साथ मौजूद है। असम के खुले आसमान के नीचे इस परिवेश को समेटने में फिल्म की निर्देशक रीमा दास ने पर्याप्त धैर्य का परिचय दिया है। इस फिल्म में जितना इत्मिनान खुले आसमान. के नीचे धूप में ऊंघते या मछली फंसने का इंतजार करते बच्चों में दिखता है, रीमा दास का कैमरा भी उतना ही फुरसत में है, छोटे से छोटे, बारीक से बारीक डिटेल को पकड़ने के दौरान वह कोई हड़बड़ी नहीं दिखाता।

पूरी फिल्म में कोई संगीत नहीं है। परिवेश की आवाजें हैं। हवा बहने की, बच्चों के खिलखिलाने और शोर मचाने की, बकरी और गाय की, पत्तों की सरसराहट और बारिश की बूंदों की आवाज । यही सब मिलकर इस फिल्म का बैकग्राउंड संगीत बनता है। रीमा को कहानी कहने की भी बेचैनी नहीं है। यह वजह है कि फिल्म में कोई प्लॉट नहीं है। यही शायद कुछ जगह फिल्म की कमजोरी भी है। फिल्म में दिखने वाले खूबसूरत से खूबसूरत लैंडस्केप लगातार आते हैं तो एक डाक्यूमेंटेशन का आभास देते हैं न कि कहानी कहते दिखते हैं। फिल्म के ज्यादातर विभाग रीमा ने खुद संभाले हैंइस मायने में ये एक सच्ची इंडिपेंडेंट फिल्म है। 

धनु के किरदार में बनिता दास और धनु की मां का रोल करने वाली अभिनेत्री ने दर्शकों को बांधे रखा है। सभी कलाकार नए हैं और गैर-पेशेवर हैं। इसीलिए निर्देशक ने जानबूझकर किसी के चेहरे पर कैमरे का फोकस नहीं रखा। इसकी जगह एक्शन या शारीरिक गतिविधियों पर ज्यादा जोर दिया गया। इसे देखकर पर्ल एस बक के या अमेरिकी लेखकों के उपन्यास याद आ सकते हैं, जहाँ किरदार प्रकृति के विशाल कैनवस के बीच अपनी तमाम आशाओं, उमंगों और उल्लास के साथ नजर आते हैं। बारिश और बाढ़ के दृश्यों में ऐसा विस्तार है जो फिल्मों में दुर्लभ है। फिल्म में हास्य से पगे बहुत से क्षण हैं जो इसे ओढ़ी हुई गंभीरता से बचाते हैं और अलग बनाते हैं। 

इस फिल्म को देखकर 'पाथेर पांचाली' की याद आ सकती है। वैसे ही दृश्य, अपरिपक्व कलाकारों का चयन, बिल्कुल प्रामाणिक परिवेशमगर जो नहीं है वह है मन को झकझोर देने वाले क्षण, भीतर के उल्लास और दुख का बाहर निकलकर स्क्रीन पर छा जाना। इसके बावजूद रीमा की मेहनत और उनकी ईमानदारी को सलाम किया जाना चाहिए। यह फिल्म बेहद विपरीत और जीवन की कठिनतम परिस्थितियों में कुछ बच्चों के माध्यम से उल्लास, उमंग, इच्छाओं और उन्हें हासिल करने की कहानी है। यही वजह है कि इस फिल्म को दुनिया भर में सराहना मिली। क्योंकि रीमा दास एक अंचल की कहानी कहने के साथ-साथ शाश्वत भावनाओं को छूती हैं। 

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