Sunday, 24 May 2020 07:31

हिंदुस्तानी फिल्मों का वित्त-व्यापार

Written by चंद्रप्रकाश झा
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फिल्मों का वित्तीय प्रबंधन और ।९व्यापार शुरू से से ही भारत की आर्थिक राजधानी माने जाने वाले महानगर मुंबई में केंद्रित है। समयांतर के इस अंक के अर्थातर स्तंभ में हम भारत की फिल्मों के पीछे ही नहीं बल्कि और आगे के भी वित्तीय प्रबंधन और व्यापार आदि की संपुष्ट चर्चा करेंगे।शुरुआत लॉन टेनिस के पूर्व खिलाड़ी आनंद अमृतराज के एक कथन से है, जो उन्होंने फिल्म एवं मनोरंजन के वैश्विक व्यवसाय पर भारतीय वाणिज्य एवं उद्योग मंडल परिसंघ (फिक्की) द्वारा मुंबई में. केंद्रित वार्षिक सम्मेलन, फिक्की फ्रेम्स, में कुछेक बरस पहले कही थी। उनका कहना था कि अमेरिका के हॉलीवुड में बनने वाली किसी भी फिल्म के बजट का अधिसंख्य भाग उसकी . 'स्टोरीलाइन' पर खर्च किया जाता है।जो उन्होंने खुल कर नहीं कहा वो यह है हिंदुस्तानी फिल्मों में, जिनमें बॉलीवुडयानी मुंबईया और तेलुगु, तमिल, मलयालम, कन्नड़, मराठी, बांग्ला से लेकर भोजपुरी जैसी अन्य भाषाओं, बोलियों की हर बरस बनने वाली सैंकड़ों फिल्में भी शामिल हैं। - .

आनंद अमृतराज, भारतीय मूल के ही चर्चित . आनंद अमृतराज, भारतीय मूल केही चर्चित पूर्व टेनिस खिलाड़ी विजय अमृतराज के बड़े भाई हैं।अमृतराज बंधू अब अमेरिका में बस गए हैं।वे हॉलीवुड की फिल्मों के निर्माण आदि के व्यवसाय में लगे हुए हैं। विजय अमृतराज ने जेम्स बांड श्रृंखला की एक फिल्म ऑक्टोपुसी में काला' खलनायक की भूमिका निभाई थीसब जानते हैं किजेम्स बांड श्रृंखला की फिल्में, इयान फ्लेमिंग की कहानियों पर आधारित हैं। उनकी सारी कहानियों परजेम्स बांड शृंखलाकी फिल्में बन चुकी हैं। फिर भी शीत युद्ध की पृष्ठभूमि में कल्पित गोरा, ग्लैमरस, ब्रिटिश खुफिया एजेंट नायक, जेम्स बांड श्रृंखला की फिल्में बनती रहती हैं तो उसका कारण अश्वेतों परश्वत का प्रभुत्व बनाए रखने की कोशिश के अलावा फिल्मों के वित्त-व्यापार का विशाल वैश्विक मुनाफा में हिस्सा भी लेना है। हम औपनिवेशिक ताकतों के सैन्य और वैचारिक प्रभुत्व की अभिलाषा में हॉलीवुड में बनाई जाने वाली फिल्मों के वैश्विक व्यापार पर और कोई चर्चा, भारतीय धरातल पर फिल्मों के निर्माण में लगने वाली पूंजी और उस पूंजी से होने वाली कमाई आदि का मूल्यांकन करने के बाद करेंगे। 

बताया जाता है कि हिंदुस्तानी फिल्मों के स्टार अदाकार इन दिनों अपने काम के एवज में नगदी और अचल संपत्तियों के अलावा संबंधित फिल्म के किसी घरेलू टेरिटरी अथवा समुद्रपारीय वितरण के अधिकार भी लेने पर जोर देने लगे हैं। यह उनकी कमाई में कालाधन छिपाने का एकजरिया भी माना जाता है। फिल्मों के समुद्रपारीय वितरण, संगीत, टेलीविजन . प्रसारण ही नहीं उन फिल्मों के सीक्वेल - - प्रीक्वेल' के अधिकारों की भी खरीद-फरोख्त अलग से होती है। भारत में कॉपीराइट कानूनों पर अमल में प्रयाप्त सख्ती न होने की वजह से दूसरे देशों की फिल्मों की नकल पर हिंदुस्तानी फिल्में खूब बनती रही हैं। कुछ ऐसे भी दृष्टांत हैं कि हॉलीवुडके फिल्म निर्माताओं ने अपने हॉलीवुड की ही फिल्मों की नकल पर बनी हिंदुस्तानी फिल्मों के प्रीक्वेल.अथवा सीक्वेल के राइट्स खरीदने की कोशिश की ताकि वे अपने देश में सख्त कॉपीराइट्कानूनों की गिरफ्त से बच सकें। 

सख्त कॉपीराइट्कानूनों की गिरफ्त से बच सकें। अपुष्ट चर्चा है कि इसी कारण हॉलीवुड फिल्म निर्माताओं ने राजकुमार हिरानी द्वारा बनाई गई और संजय दत्त अभिनीत 'मुन्ना भाई' श्रृंखला के सीक्वेल -प्रीक्वेल अधिकारों की खरीद की कोशिश की। कॉपीराइट्स के खरीद-फरोख्त के बढ़ते भारतीय और वैश्विक व्यापार पर चर्चा हम बाद में करेंगे।

हम बाद में करेंगे। ... फिल्मों के वितरण के लिहाज से अर्से पहले मुंबई, दिल्ली-यूपी, ईस्ट पंजाब, सीपी (सेंट्रल प्रोविंस), सीआई (सेंट्रल इंडिया), राजस्थान, निजाम, मैसूर, वेस्ट बंगाल, बिहार-झारखंड, असम, ओडिसा, टीएनके (तमिलनाडु एंड केरला) के जो.13 क्षेत्र थे वे आज भी लगभग वैसे ही बरकरार है। पहले हर क्षेत्र का एक मुख्य वितरक होता था, जिनके अधीन उस क्षेत्र में अनेक अन्य वितरक होते थे। ये वितरक फिल्म उद्योग में लगाई जाने वाली पूंजी और उस पूंजी की बदौलत की जाने वाली कमाई के धंधे की . रीढ़ की हड्डी माने जाते थे। वे मुख्य वितरक ही फोन से अपने मातहत वितरकों और थिएटर मालिकों आदि के जरिए इस पर नजर रखते थे कि किसी फिल्म की रिलीज के बाद विभिन्न जिलों में प्रदर्शन से कहां कितनी कमाई हुई।वे ही यह सब जानकारी सही-सही या फिर बढ़ाघटा कर फिल्म निर्माताओं को देते थे। अब किसी भी क्षेत्र में कोई मुख्य वितरक नहीं होता। फिल्म वितरण का धंधा बहुत हद तक केंद्रीकृत हो गया है।

है। वरिष्ठ फिल्म पत्रकार -लेखक अजय ब्रह्मात्मज ने बताया कि थियेटरों में फिल्मों के . प्रदर्शन से कमाई का हिसाब-किताब अब मल्टीप्लेक्स युग में और डिजिटल संप्रेषण के नए दौर में बहुत व्यवस्थित हो गया है, जिसमें आसानी से हेरा-फेरी नहीं की जा सकती है। - तरण आदर्श, कोमल नाहटा आदि अनेक फिल्म ट्रेड विश्लेषक देशभर के थिएटरों में फिल्मों के प्रदर्शन के पहले दिन, दूसरे दिन, पहले सप्ताहांत और फिर बाद की भी कमाई का कुल मिलाकर विश्वसनीय लेखा-जोखा सार्वजनिक करते रहते हैं। यह हिसाब -. किताब, निजी क्षेत्र में है और इसमें सरकारी स्तर पर कोई योगदान नहीं है।सूचना-प्रसारण मंत्रालय आदि ने इसके नियमन का कोई कदम नहीं उठाया है।आयकर विभाग को सिर्फ कर वसूली से मतलब है और उसके आगे-पीछे की सांख्यिकी जुटाने की फुरसत नहीं है। फिल्म ट्रेड की पत्रिकाओं में से एक, बॉक्स . ऑफिस इंडिया के सितंबर 2018 के विशेष . वर्षगांठ अंक में पिछले 10 बरस की फिल्मों के बिजनेस का ब्योरा दिया गया है। इसके अनुसार वर्ष 2009-10 में वितरित फिल्मों में से रिलायंस इंटरटेनमेंट की 'थ्री इडियट्स', यूटीवी मोशन पिक्चर्स की राजनीति', यशराज फिल्म्स की सेल्समैन ऑफ द ईयर' यशराज फिल्म्स की सेल्समैन ऑफ द ईयर' और फॉक्स स्टार स्टुडियोज की 'माई नेम इज खान' समेत 38 फिल्मों ने कुल 10,77; 49,91,000 रुपए की कमाई की थी।इन 38 फिल्मों में से सर्वाधिक दस यूटीवी मोशन पिक्चर्स की थीं। लेकिन सर्वाधिक 3, 32, 28, 82, 000 रुपए की कमाई रिलायंस इंटरटेनमेंट की सात फिल्मों से हुई। इसके अगले वित्त वर्ष में वितरित फिल्मों में से 47 ने कुल 14, 32, 17, 58, 000 रुपए की कमाई कीइस वर्ष भी सर्वाधिक कमाई रिलायंस इंटरटेनमेंट की ही थी, जिसकी सर्वाधिक 11 फिल्मों में 'सिंघम' फिल्म शामिल थी। इरोज इंटरनेशनल मीडिया की 'गोलमाल 3' और 'जिंदगी ना मिले दोबारा' समेत आठ फिल्मों की बदौलत यह कंपनी कमाई के मामले में दूसरे नंबर पर रही। नो वन किल्ड जेसिका', 'गुजारिश' आदि अपनी आठ फिल्मों की बदौलत यूटीवी मोशन पिक्चर्स कमाई चार्ट में तीसरे नंबर पर रही। 

फिल्मों में से 47 ने कुल 18, 61, 08,10, 000 रुपए की कमाई की। इस बार कमाई चार्ट में रिलायंस इंटरटेनमेंट सातवें नंबर पर पिछड़ गई। 'रॉकस्टार', 'हाउसफुल 2', 'फेरारी की सवारी' आदि अपनी दस फिल्मों की बदौलत इरोज इंटरनेशनल मीडिया कंपनी कुल 5, 60, 65, 63, 000 रुपए का ट्रेड कर कमाई चार्ट में अव्वल नंबर पर पहुंच गई। अगले बरस वितरित फिल्मों में से 70 की कुल कमाई 25, 94, 09,66, 000 करोड़रुपए पहुंच गई। इसमें सर्वाधिक 87,97, 28, 500 रुपए का हिस्सा 'बर्फी' आदि 12 फिल्में बनाने वाले यूटीवी मोशन पिक्चर्स का था। रिलायंस इंटरटेनमेंट . इस बरस भी पिछड़कर आखरी दूसरे पायदान पर रह गई। वर्ष 2013-14 में वितरित फिल्मों में से 65 में से कुल 24, 45, 46, 63,000 रुपए में से 4, 63, 22, 24,000 रुपए की आमद के साथ शोले 3 डी' आदि दस फिल्में बनाने वाली यूटीवी मोशन पिक्चर्स फिर कमाई चार्ट में अव्वल रही।

पिक्चर्स फिर कमाई चार्ट में अव्वल रही। अगले बरस कुल 25, 93, 06, 00, 000 रुपए · के कमाई चार्ट में 6, 86, 58, 00, 000 रुपए की आमद के साथ 'बजरंगी भाईजान' आदि, नौ फिल्में बनाने वाली इरोज इंटरनेशनल मीडिया अव्वल रही। यही कंपनी 2015-- 16 की भी कुल 23, 55, 65, 00, 000 रुपए की कमाई चार्ट में 5,64, 11, 00, 000 रुपए की हिस्सेदारी के साथ अव्वल रही, जिसकी ..11 फिल्मों में 'बाजीराव मस्तानी' और 'अलीगढ़' शामिल थीं।

वर्ष 2016-17 में वितरित फिल्मों में से 27, 52, 21, 00, 000 रुपए की कमाई चार्ट में अव्वल आने की बाजी, 'बाहुबली : द कन्क्लू जन' आदि 12 फिल्में बनाने वाली कंपनी ए.ए. फिल्म्स ने मारी। वर्ष 2017-18 में वितरित फिल्मों में से अपनी 18 फिल्मों में · 'सिमरन' आदि 12 के फ्लॉप हो जाने के बावजूद सुपर हिट 'फुकरे रिटर्न्स' ब्लॉकबस्टर 'राजी', 'सोनू के टीटू की स्वीटी' और 'स्त्री' की बदौलत ए.ए. फिल्म्स कमाई चार्ट में अव्वल रही। अंबानी उद्योग समूह की वायकॉम 18 मोशन पिक्चर्स की विवादित फिल्म 'पद्मावत' 2, 83, 00; 00, 000 रुपए की कमाई कर आल टाइम ब्लॉकबस्टर करार दी गई।

अजय ब्रह्मात्मज के अनुसार पिछले छह अजय ब्रह्मात्मज के अनुसार पिछले छह सालों में दिल्ली और हिंदी प्रदेशों में हिंदी फिल्मों के दर्शकों की संख्या बढ़ी है। इस बढ़त के बावजूद अभी तक हिंदी फ़िल्मों की कमाई में मुंबई की हिस्सेदारी सबसे ज्यादा होती है। ताजा आंकड़ों के अनुसार इस साल मुंबई की हिस्सेदारी.31.37 प्रतिशत रही है। 2012 में मुंबई की हिस्सेदारी 36:28 प्रतिशत थी। लगभग पांच प्रतिशत की कमी शिफ्ट होकर दिल्ली और दूसरी टेरिटरी में चली गई है। कारोबार के हिसाब से भारत में 13 टेरिटरी की गणना होती है। दशकों से ऐसा ही चल रहा है। इनके नए नामकरण और क्षेत्रों के विभाजन पर कभी सोचा नहीं गया। मसलन, अभी भी सीपी, ईस्ट पंजाब और निजाम जैसी टेरिटरी चलती हैं। राज्यों के पुनर्गठन के बाद इनमें से कई टेरिटरी एक से अधिक राज्यों में फैली हैं। पारंपरिक रूप से दिल्ली और यूपी एक ही टेरिटरी मानी जाती है |

हिंदी प्रदेशों के हिंदी भाषी दर्शक इस भ्रमित गर्व में रहते हैं हिंदी फिल्में उनकी वजह से ही चलती हैं । सच्चाई यह है राजस्थान, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों को मिलाने के बावजूद फिल्मों की कुल कमाई में हिंदी प्रदेशों का प्रतिशत 25 से अधिक नहीं होता। बिहार-झारखंड का ही उदाहरण लें तो इस साल बढ़त के बावजूद उनका योगदान 2.9 प्रतिशत है। मैसूर, ईस्ट पंजाब और बेस्ट बंगाल का योगदान पांच प्रतिशत से अधिक ही है। हिंदीभाषी दर्शकों को निराधार इतराने से निकलना चाहिए। कोशिश होनी चाहिए कि वे थियेटर में जाकर फिल्में देखें। जाहिर सी बात है कि हिंदी प्रदेशों में ज्यों-ज्यों मल्टीप्लेक्स बढ़ेंगे त्यों-त्यों दशकों में इजाफा होगा। 

· पिछले छह सालों में मुंबई समेत सीआई, राजस्थान, निजाम और उड़ीसा में हिंदी फिल्मों के दर्शकों की संख्या में गिरावट आई है, जबकि दिल्ली-यूपी, ईस्ट पंजाब, सीपी, मैसूर, वेस्ट बंगाल, बिहार-झारखंड, असम और टीएनके में हिंदी फिल्मों के दर्शक बढ़े हैं। यह परिवर्तन शुभ है। दर्शकों की तादाद फिल्मों के विषय तय करती है। गौर करें तो पिछले कुछ सालों में हिंदी फिल्मों की कहानियां मुंबई से निकल कर देश के अंदरूनी इलाकों में जा रही हैं। निश्चित ही हिंदी प्रदेशों में हिंदी फिल्मों के दर्शक हैं । यह स्वाभाविक है। दिक्कत यह है ‘कि इन दर्शकों में से अधिकांश सिनेमाघरों में जाकर फिल्में नहीं देखते। इसके कई कारण हैं। सिनेमाघर लगातार टूट और बंद हो रहे हैं। कस्बों के सिनेमाघरों पर ताले लग रहे हैं। पहले रिपीट या देर से रिलीज की सुविधा होने से छोटे । सिनेमाघरों में भी फिल्में आ जाती थीं। अब होकर नई से नई फिल्म रिलीज के दिन ही देश। विदेश में पहुंच जाती है। रिलीज के वीकेंडही दर्शक फिल्में देखना चाहते हैं। सिनेमाघरन होने । से वंचित दर्शक दूसरे प्लेटफॉर्म पर फिल्में देख लेते हैं। मुंबई के निर्माताओं को यकीन नहीं होगा, लेकिन यही कड़वा तथ्य है कि दर्शक स्मार्टफोन पर उनकी ताजा फिल्में देख रहे हैं।

देख रहे हैं। दर्शकों की प्राथमिकताओं का खयाल रखते हुए निर्माताओं, वितरक और प्रदर्शकों को युक्ति निकालनी पड़ेगी। मोबाइल नेटवर्क, डाटा डिस्ट्रीब्यूटर और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म की मदद से वे दर्शकों तक पहुंच कर खो रहे रेवेन्यूको हासिल कर सकते हैं। छोटे और स्मार्ट सिनेमाघरों के निर्माण पर भी ध्यान देने की जरूरत है। कम सीटों और आधुनिक सुविधाओं से लैस सिनेमाघर हों। स्थिति यह है कि राज्यों की राजधानियों के बाहर के शहरों-कस्बों में सिनेमाघर बनाने में प्रशासन और स्थानीय व्यापारियों का ध्यान नहीं है। इसके साथ ही मौजूद मल्टीप्लेक्स में टिकट दर भी कम करनी होगी।

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