Sunday, 24 May 2020 12:18

स्त्री की हदबंदी से जाति को पकड़ने का प्रयास

Written by प्रमोद मीणा
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दलित निर्देशक नागराज मंजले की हाल ही में प्रदर्शित हई मराठी फिल्म 'सैराट' ने बॉक्स ऑफिस पर कामयाबी के नये कीर्तिमान रचते हुए हिंदी भाषी सिने दर्शकों को भी आकर्षित किया है। लेकिन कुछ सवर्ण आलोचक फिल्म में लोकप्रिय गानों विशेषतः 'झिंग झिंगाट' की उपस्थिति और दीन-हीन-अनपढ़ दलितों के उत्पीड़न और चित्रण की बनी-बनाई परिपाटी की अनुपस्थिति देख करके इस फिल्म को एक दलित निर्देशक की फिल्म के रूप में नकारने से भी पीछे नहीं रहे हैं। हाँ, यह सच है कि इस फिल्म में कुछ बेहद लोकप्रिय हो गये गीत हैं। लेकिन वे प्रायः पृष्ठभूमि में हैं और आंतरिक भावों की व्यंजना हेतु हैं। संगीत निर्देशक पटकथा और किरदारों के प्रति प्रतिबद्ध रहे हैं। इसके सभी गीत अनगढ़ ग्रामीण भाषा में हैं। फिल्म की भाषा और गीतों की भाषा समान है। अन्यथा भाषा और गीतों की भाषा अधिकांश फिल्मों में गीत फांक की तरह होते हैं जहाँ किरदार यकायक कवि बन जाते हैं। दूसरा यह 21वीं सदी के भारत में दलित जीवन का यथार्थ दिखाती है और आज लोकतांत्रिक देश में पिछली सदी के पूर्वार्द्ध या मध्ययुग की तरह खुल्लमखुल्ला दलितों को कुचला नहीं जा सकता। अंबेडकर द्वारा बनाये गये कानूनी संरक्षण के प्रावधानों के साथ अपने अधिकारों के प्रति पढ़-लिखकर जागरूक बनते दलित अब आजादी और स्वाभिमान की खुली हवा में सांस लेने लगे हैं। अतः कल का दलित उत्पीड़न आज का दलित निर्देशक ज्यों का त्यों कैसे दिखा सकता था ? किंतु ऐसा भी नहीं है कि इस भमंडलीय नवउदारवादी बयार में मध्ययगीन जातिवादी मानसिकता से भारतीय समाज मक्त हो चका हो। जाति और जातीय उत्पीड़न अपने बदले हये रूपों में आज भी बरकरार है। और यह फिल्म इसीप्रकार के जातीय भेदभाव और पूर्वाग्रहों को 21वीं सदी के आधुनिक भारत में दिखाती है। 

में दिखाती है। वास्तव में यह फिल्म भारतीय स्त्री की यौनिकता के ऊपर सांस्कृतिक स्तर पर स्वीकृत पितृसत्ता की जकड़बंदियों के खिलाफ बोलते-बोलते बड़ी सूक्ष्मता किंतु मुखरता के साथ हमारे समाज में जाति की उपस्थिति और उसके क्रूर यथार्थ को पकड़ती है। फिल्म की पूरी पटकथा और कथानक के उतार-चढ़ाव इसी सूत्र से संचालित हैं। इस फिल्म में जाति और लिंग. के अंतर्संबंधों की वही समझ निर्देशक मंजुले ने दिखाई है, जो आप को अंबेडकर के यहाँ मिलेगी। अंबेडकर ने अपने लेखन में स्पाय किया है कि जाति की उत्पत्ति, बुनावट और विकास का आधार रही है सजातीय विवाद व्यवस्था। फिल्म की नायिका अर्चना या आर्ची इसी सजातीय विवाह व्यवस्था या प्रकारांतर से कहें तो जाति व्यवस्था में खिलाफ संघर्ष का केंद्र बनकर उभरती है। यह उसकी देह और उस देह से प्रेम करने की स्वातंत्र्य अभिलाषा ही है जो समाज में चले आ रहे जातीय मानकों को उलट-पलट कर रख देती है। और जिन्हें बनाये रखने के लिए जाति के ठेकेदारों के लिए उस पर नियंत्रण रखना आनवाय हा जाता है। लोकन आर्ची अपने दिमाग और दिल दोनों को अच्छे से जानती है आर वह अपन परिवार और समाज के दबाव को परे रख इन्हीं की सुनती है। 

सुनती है। ___ यथार्थ में फिल्म की नायिका अर्चना पाटिल अन्य आम लड़कियों की तरह चुपचाप पितृसत्ता की गुलामी को स्त्री का गहना और इज्जत-आबरू मानकर चलने वाली लड़की नहीं है। वह हमारे इस गुलाम स्त्री समाज में एक अपवाद के रूप में है। वह अपना दायित्व किसी दूसरे पुरूष के कंधों पर डाला जाना स्वीकार नहीं करती, चाहे ये कंधे उसके पिता के हों या प्रेमी के जो आगे चलकर उसका पति भी बनता है। इस प्रकार फिल्म में उसकी भूमिका परंपरागत लैंगिक भूमिकाओं को विस्थापित करने वाली है। लेकिन यहाँ यह है आची मिला है उसकी स्वयं कीसे। उसके पिता बाहुबली राजनीतिक गरे यहाँ यह भी ध्यातव्य है कि म दबंग व्यक्तित्व को खाद-पानी की स्वयं की वर्चस्वशील पृष्ठभूमि के पिता का पाटिल परिवार एक राजनीतिक गुंडे का परिवार है। पास लंबे-चौड़े गन्ने के खेत हैं। उसके पिता एक त पिता एक सफल स्थानीय नेता भी आर्ची के चाल-चलन और स्वभाव में आप फिल्म के पहले सिक्वेंस से ही In प्रकार की बाहुबल आधारित मर्दानगी की झलक पाते हैं। उस अपने परिवार की तरफ से एनफिल्ड बुलेट मोटरसाइकिल और ट्रैक्टर चलाने की छूट है। वह स्थानीय लड़कों को भी जब-तब धमकाती रहती है।

लड़कों को भी जब-तब धमकाती रहती है। वह गाँव के बाहर स्थित खुले-चौड़े कुंए में भी बिना किसी भय या संकोच के अधिकारपूर्वक कूदकर नहाती दिखलाई गई है। किंतु उसे यह सब करने की छूट वहीं तक है जहाँ तक उसकी इच्छायें और आजादी उसके अपने परिवार के पुरूष सदस्यों की मर्दानगी से न टकराये। अपने पाटिल परिवार की पितृसत्ता द्वारा निर्धारित हदबंदी में रहकर ही आर्ची अपनी स्त्रैणता से मुक्ति का स्वाद चख सकती है।

का स्वाद चख सकती है। और एक जीवित और आजाद लड़की के रूप में आर्ची की यह आजादी उसके परिवार की आँखों में तब खटकने लगती है जब वे उसे एक मछुआरे के बेटे पाा के प्रेम में पड़ा पाते हैं। पाया का परिवार स्थानीय मुसलमानों के बगल में एक साधारण से घर में रहता है। जिस क्षण आची के घरवालों को इस दलित युवक के साथ उसके संबंध की जानकारी लगती है, उसी क्षण से वे उसके लिए किसी उपयुक्त नरश्ते की तलाश में जुट जाते हैं। फिल्म के पूर्वार्द्ध में ऊपर से देखने पर आर्ची के पाटिल परिवार में अपनी लड़की को दी जा रहा आजादी के पीछे छिपे पंसवाद के लये हाय और नाखून चाहे न दिखाई देते हों, पर पाटिल परिवार के विशाल आलीशान का नाम भी आर्ची के नाम पर ही रखा हा लेकिन एक सार्वजनिक कार्यक्रम आची के पिता ने स्थानीय नेता की हैसीयत से अपने चुनाव क्षेत्र में जो कहा उससे उनके अंदर गहराई में बैठे मर्दवादी अहं का साफ पता चल जाता है। उन्होंने मंच से अपने क्षेत्र के लोगों से पछा था कि क्या वे स्थानीय मामलों में विपक्ष पर भरोसा कर सकते हैं जबकि वे अपनी स्त्रियों के ऊपर भी नियंत्रण नहीं कर सकते? इसप्रकार वे अपने इस भाषण में विपक्ष को नामर्द साबित करते दिखते हैं क्योंकि विपक्ष के लोगों ने अपनी स्त्रियों को जीवन जीने की आजादी दी हुई है! स्पष्ट है कि पाटिल परिवार के इस मुखिया की मर्दानगी का सीधा लक्ष्य है--पाया के साथ अपनी बेटी आर्ची के रिश्ते और उसकी यौनिकता पर शिकंजा कसना। यहाँ पाया के विद्यालय में उसके नये अंग्रेजी अध्यापक ने जिस घृणित और क्रूर सच्चाई को सबके सामने रखा है, उसकी ओर ध्यान आकृष्ट करना भी जरूरी है। यह सच्चाई है पाटिल जैसी उच्च जातियों के पुरूषों का निम्न जातियों की स्त्रियों के साथ नियमित तौर पर बिना किसी लज्जा और दंड के सोना। इस प्रकार एक ओर सवर्ण पितृसत्ता अपनी बेटियों को प्रेम करने की आजादी देने को भी तैयार नहीं है, दूसरी ओर वह दलित स्त्री की यौनिकता को अपने पैरों तले कुचलना अपना अधिकार मानकर चलती है।

अपना अधिकार मानकर चलती है। दलित पाा के साथ आर्ची के संबंध का खुलासा होने के बाद प्रभावशाली पाटिल लोग आर्ची की यौनिकता पर अपनी उच्च जातीय पितसत्ता का नियंत्रण पुनः स्थापित करने के लिए कई कदम उठाते हैं जैसे किसी समकक्ष सुयोग्य पाटिल परिवार के साथ उसका वैवाहिक रिश्ता करने का प्रयास आदि। किंत वे एक और कदम भी उठाते हैं जिसके तहत आर्ची और पाा के प्रेम प्रसंग से खड़े हुये तथाकथित सार्वजनिक बेइज्जती के आख्यान को एक नया रंग देने का प्रयास किया जाता है ताकि मर्दवादी दुनिया में अपने दामन को पाक-साफ साबित किया जा सके और सारा अपराध पाया का ठहराया जा सके। इस योजना के तहत आर्ची पर दबाव डाला जाता है कि वह उन कागजों पर हस्ताक्षर करे जिसमें पाया और उसके मित्रों पर उसके साथ (आर्ची के साथ) बलात्कार करने और अपहरण करने के आरोप जड़े गये थेयह सब इसलिए किया जा रहा था कि यौनिक निष्क्रियता के रूप में उसकी स्त्रैणता को पुनः साबित करने के साथ उसकी और उसके समुदाय की इज्जत की पुनः स्थापित किया जा सके। लेकिन जब आर्ची को इस परे षड्यंत्र का पता चलता है तो वह अपने पाटिल परिवार और जाति के इशारों पर नाचने से इंकार कर देती है और कागजों को फाड़ देती है।

और कागजों को फाड़ देती है। भारतीय जातिवादी समाज में प्रेम से जाति के समक्ष पैदा होने वाले आसन्न संकटों के निवारणार्थ प्रेम में त्याग और कष्ट सहिष्णुता पर एकांगी रूप से बल दिया गया है और दैहिक स्तर से ऊपर उठकर किये जाने वाले प्लूटोनिक प्रेम का महिमा मंडन किया गया है। किंतु आर्ची का प्रेम और उस प्रेम को बचाने के लिए · किया जाने वाला उसका प्रतिरोध अपने को मिटाने वाले आत्मघाती भारतीय प्रेम के आदर्श की भेंट नहीं चढ़ता। वह पाया के साथ अपने घर से भाग निकलती है ताकि अपनी और पाया की जिंदगियाँ बचा सके। अपनी और पाया की जिंदगियाँ बचा सके। वह अपने प्रेम के लिए और अपने जीवन के लिए अपना घर, अपना गाँव छोड़ देतो है। घर-परिवार की पुंसवादी मर्यादा को वरीयता देने वाले आदर्श प्रेम के अनुयायियों को यह पलायन लग सकता है लेकिन यह पलायन नहीं कहा जा सकता। यह तो परिस्थितियों के समक्ष हथियार न डालकर संघर्ष करने की जद्दोजहद है क्योंकि अपनी और अपने प्रेम की रक्षा करके ही आप आगे संघर्ष कर सकते हैं।

संघर्ष कर सकते हैं। वैसे तमाम किंतु-परंतु के बावजूद किसी भी स्त्री के लिए अपने बचाव का सबसे सुरक्षित क्षेत्र अंततः सदैव से परिवार ही रहता आया है। लेकिन यह एक ऐसी संस्था है जो नियंत्रणकारी भूमिका में रहती है और बहुत ही घातक ढंग से दमनकारी भी हो सकती है। लेकिन फिर भी यह आपको आश्रय और सांत्वना देती है। जब आप सब जगह से निराश हो जाते हैं तो हारकर फिर परिवार में ही लौटते हैं। परिस्थितियों के कारण आर्ची को अपनी उम्र से कहीं ज्यादा बढ़कर वयस्क होना पड़ा है किंत आर्ची के चरित्र को भी इस संघर्ष से गुजरना पड़ता है। जब वह अपनी नई साथी से अपने अतीत और घर पर पीछे छुट गये परिवार के बारे में बताती है तो वह अपने घरवालों को अनिवार्यतः अच्छे लोग ही बताना पसंद करती है। महानगर की मलिन बस्ती में अपने नये घर की गंदगी के बीच वह अपने साफ-सथरे बंगले को बहत याद करती है। वह अपनी माँ और अपने परिजनों की कमी महसूस करती है। वह अपने पिता द्वारा माफ कर दिये जाने के लिए तरसती हैपीछे छूट गये अपने घर और परिवार की यादें और परिजनों की चिंता उसे अंदर ही अंदर खाये जाती है। ये चिंता उसे अंदर ही अंदर अतीत की सुखद स्मृतियाँ और वर्तमान के अभाव ही थे जो भावावेग में उसे अपने प्रेमी पाया को छोड वापिस घर लौटने को विवश कर जाते हैं। यह अलग बात है कि अपनी गलती का अहसास और यथार्थ की भयावहता से साक्षात्कार के बाद वह पुनः बीच रास्ते से पाया के पास लौट आती है। किंतु - विवाह के उपरांत भी, पर्याप्त पैसा कमाने और अपना फ्लैट खरीद लेने के बाद भी, - पटरी से उतर चुकी जीवन की गाड़ी के पुनः पटरी पर आ जाने के बाद भी वह जानना चाहती है कि उसके तात्या कभी उससे ..बात भी करेंगे या नहीं, उनकी माफी ही उसके लिए सर्वोपरि रहती है। वर्षों बाद उसके लिए सर्वोपरि रहती है। वर्षों बाद जब फोन के माध्यम से वह पुनः अपने ..घरवालों के साथ संपर्क साधती है तो बारंबार उनके सामने अपना यही प्रश्न दोहराती है। लेकिन कुछ सांस्कृतिक-पारिवारिक कानून ऐसे होते हैं जिनके उल्लंघन पर कोई रहम, कोई माफी नहीं मिल सकती। अपने ही पिता और भाई से भी आप उदारता की आशा नहीं कर सकते चाहे वे आपके प्रति कितने ही स्नेहिल रहे हों। आर्ची की यौनिकता पर नियंत्रण के पाटिल परिवार के प्रयास आखिरकार उस नशंसता पर जा करके ही दम लेते हैं जहाँ आर्ची और उसके पति पाया को मरना ही थाआर्ची के स्वयं के भाई और चाचा-ताऊ ही उनकी हत्याओं के निमित्त बनते हैं। पितसत्ता का दोहरा चरित्र इस हत्याकांड से ठीक पहले भी आपको दिखाई देता है जब अपनी बेटी के अंतर्जातीय विवाह और घर छोड़ देने से टूट चके उसके पिता को आप महाराष्ट्र की स्त्री नेताओं की परंपरा पर एक मंच से बोलते पाते हैं। हकीकत में समय के दबाव के सामने पितसत्ता को जब-तब झकना भी पड़ रहा है लेकिन उसके मूल चरित्र में आज भी कहीं कोई विशेष बदलाव नहीं आ पाया है।

. कई सवर्ण आलोचकों के पेट में इस बात से दर्द हो रहा है कि 'सैराट' में जाति का जब नामोल्लेख ही लगभग नहीं है तो क्यों इसे दलित निर्देशक की दलित चेतना संपन्न फिल्म कहा जा रहा है। असल में इन्हें एक दलित निर्देशक की बाक्स ऑफिस पर यह सफलता पच नहीं पा रही है। किसी दलित फिल्म को अकादमिक इनाम- विनाम देने तक तो ये किसी तरह सहन कर जाते हैं क्योंकि राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त - फिल्में आम दर्शक की पहँच से दर होने के कारण व्यापक प्रभाव नहीं डाल पाती और ब्राह्मणवादी पूर्वाग्रहों के सामने उनसे तात्कालिक खतरा खड़ा नहीं होता। अंगेजी उप शीर्षक के साथ प्रदर्शित इस फिल्म में पाटिल के घर को एक उच्च जाति का घर बताया गया है जबकि मूल मराठी संस्करण में मराठी संवादों में बारंबार पाटिल और आर्ची के लिए 'मोठ्या घरताले' शब्द का इस्तेमाल हुआ है जिसका शाब्दिक अर्थ होता है बड़े घर वाला। किसी भी समद्ध परिवार से ताल्लुक रखने वाले व्यक्ति के लिए इसका इस्तेमाल किया जाता है। असल में भारतीय समाज में वर्ग और जाति को आप एक-दसरे का लगभग पर्याय मान सकते हैं। यहाँ जो दलित हैं, वे प्रायः सर्वहारा भी हैं और जो उच्च जातियाँ हैं, वे कमोबेश रूप से मालदार तबके से आती हैं।

किंतु जाति का चाह मुखर अभिव्यक्ति शाब्दिक स्तर पर न हुई हो लेकिन पी फिल्म में शुरू से लेकर अत तक इसकी व्यंजना होती चली गई है। आर क्लाइमेकर के चरम तक पहुंचते-पहुचत जातीय भेदभान और उत्पीड़न की गूज इतनी तीखी और तीव्र हो जाती है कि आप दोनों हाथों में अपने कान बंद कर लेन पर भी उस गॅज को सुने बिना नहीं रह सकते। फिल्म के अंतिम दृश्यों का खामाशा बिना कुछ कहे, भी सब कुछ कह जाता है। नागराज मंजले का संदेश साफ-साफ आपके दिल और दिमाग का झकझार कर रख दता है कि जब आप स्त्री और उसकी इच्छाओं व यौनिकता के नियंत्रण को सामने लात हैं तो आप जाति पर भी साथ-साथ प्रकाश डाल रहे होते हैं । स्त्री और जाति के सवाल एक-दूसरे से नाभिनाल आवद्ध है।.साथ विचारन क लिए बाध्य कर दता है। फिल्म के अंत में अदर तक चीर कर रख देने वाली जो चुभने वाली खामाशा है, उस पर स्वयं नागराज मंजुले ने द हिंदू क साथ एक साक्षात्कार में जो कहा है, वह अत म .हमे जरूर देखना चाहिए "मूलतः यह एक गहन उदासी है। विभिन्न तरीकों से आप भी बिल्कुल इसे व्यक्त करते है। कई बार आप क्रोधित हो जाते हैं, अन्य समय आप स्तब्ध हो जाते हैं। मैं फिल्म के अंत वाला स्तब्धता में श्रोताओं को सुनाना चाहता था। हम अखबारों में त्रासदियों के बार में पढ़ते हैं किंतु अविचलित रह जाते हैं। म देखना चाहता था कि लोग स्वयं को सुनेंग कि नहीं, अपनी स्वयं की सिसकियों को मान में सुनेंगे कि नहीं। मैं उन्हें (सिसाकया का) बाहर खींच ले आना चाहता था। म यह देखना चाहता था कि जो झिंगाट गाने पर नाचने वाले हैं, क्या वे चिंतनशील मनोदशा के साथ बाहर निकलते है या नहीं।" 

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