Sunday, 24 May 2020 13:06

फिर भी कुछ छूट जाता है मंटो

Written by प्रियदर्शन
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मंटो एक जलते हुए शोले का नाम म उसको छूना दुस्साहस का काम छते ही हाथ जल जाते हैं। मगर इस बदनाम लेखक के भीतर कोई ऐसी कशिश है कि उसको छूने की का म होती है, कोई ऐसी तपिश है जो अपनी ओर खींचती हैलेकिन एक लेखक को करीब से महसूस करना एक बात है और उस पर फिल्म बनाना दूसरी बातइस लिहाज से नंदिता दास का साहस दाद देने लायक है। यह दाद इस बात से कुछ और बड़ी हो सकती है कि नंदिता ने जो फिल्म बनाई है, वह मंटो के अलावा उन दिनों की मुंबई-यानी बंबई-को भी पकड़ती है लाहौर को भी, और इन सबके साथ उस पूरे जमाने को, जिसकी जलती हुई कहानियों - में तप कर मंटो नाम का शोला एक लेखक में बदला था।

है लाहौर को भी, और इन सबके साथ उस इस्मत चुगताई भी हैं जो लिहाफ जैसी नहीं, वह जिंदगी के उन अंधेरे हिस्सों का लेखक है जिनसे आंख मिलाते हमें उबकाई में बदला था। - ऐसी फिल्म बनाना आसान काम नहीं था- नंदिता के सामने मंटो की बेहद - जटिल शख्सियत थी, उसकी वे कहानियां थीं जिन पर अश्लीलता के आरोप लगे. वह जमाना था जो सांप्रदायिक नफरत की आग में बुरी तरह जल रहा था, दो हिस्सों में बंट - गए एक मुल्क के नागरिक थे जो अब । अलग-अलग ठिकानों में अपनी पहचान खोज रहे थे। इन सबके साथ वह फिल्मी दुनिया थी जिसकी चमक-दमक पर दम दुनिया थी जिसकी चमक-दमक पर इस बाहरी दुनिया के दबाव से पैदा दरारें धीरे- धीरे दिख रही थीं।

नंदिता दास नंदिता दास बहुत संजीदगी और सूक्ष्मता के साथ एक-एक ब्योरा चुनती हैं। फिल्म देखते हुए जैसे उस दौर की मुंबई हमारे सामने खुल जाती है-वह फिल्मी दुनिया भी जिसमें अशोक कुमार हैं, नरगिस हैं, नौशाद हैं, जद्दनबाई है और श्याम जैसा मंटो का स्टार-दोस्त है। इस बंबई में एक दुनिया उन गरीब, हांफती-खांसती बस्तियों की भी है जहां औरतें बिक्री का सामान हैं, जहां उनकी नींदें छीन ली गई हैं, जहां दिन उनके अंधेरों में डूबे हैं। इस बंबई में एक इस्मत चुगताई भी हैं जो लिहाफ जैसी कहानी लिखकर मुकदमा झेल रही हैं और मंटो के साथ बहस में उलझी हैं। इस बंबई में अशोक कुमार भी हैं जो दंगों से बंटे शहर में मंटो के साथ निकलते हैं और शहर उनके लिए अलग से रास्ता बना देता है। इसी बंबई में फिल्म स्टार श्याम पाता है कि नए बने पाकिस्तान में उसके अपने लोगों को मार दिया गया और वह मुसलमानों से इस कदर नफरत की बात सोचता है कि वे सामने पड़ जाएं तो उन्हें मार डालेगा |

श्याम के इस गुस्से का गवाह मंटो पूछता है, 'मुझे भी मार दोगे, मैं भी तो मुसलमान ह?' श्याम का जवाब है, तुम कहां के मुसलमान हो। मंटो का जवाब है --'इतना भर मसलमान तो हू कि मारा जा सकू। टूटी हुई बम्बई का यह टूटा हुआ मंटो एक रात अचानक अपना मुल्क छोड़ देने का फैसला करता है। वह लाहौर जाकर पाता है कि वहाँ इंडिया कॉफी हाउस पाक कॉफी हाउस में बदल गया है। लेकिन नाम के साथ इस बदली हुई पहचान के बावजूद बहुत कुछ नहीं बदला है। गांधी की हत्या लाहौर में भी हूक पैदा करती हैं |मंटो की कहानियों पर अश्लीलता का मुकदमा लाहौर में भी चलता रहता हैइन सबके बीच फैज़ अहमद फैज़ की नज्म गंजती रहती है.ये टाग-टाग उजाला ये शबगजीदा सहर....।

लेकिन इन सबके बावजूद यह कहना होगा कि नंदिता दास ने बहुत सारा मंटो इरादतन छोड़ दिया है तो बहुत सारा मंटो उनसे उनकी कोशिश के बावजूद छूट गया है। असल में मंटो कई वजहों से पकड़ में नहीं आता। वह कहीं से 'भद्रलोक' का लेखक नहीं है, मध्यवर्गीय विद्रोह का भी नहीं, वह जिंदगी के उन अंधेरे हिस्सों का लेखक है जिनसे आंख मिलाते हमें उबकाई आती है, जिसकी 'बू' हमें नाक बंद करने पर मजबूर करती है, हम लेखक के किरदारों से ही नहीं, लेखक से भी भय खाने लगते हैं-वह एक अस्पृश्य लेखक लगने लगता है जो जीवन की बजबजाती गलियों में उतरन का वह दुस्साहस दिखाता है जो शरीफ लेखकों को नहीं दिखाना चाहिए। - जब यह मंटो परदे पर आता है तो कुछ शरीफ, सुसंस्कृत और सहनीय हो जाता है। फिर 'खोल दो', 'ठंडा गोश्त' या 'टोबा टेक सिंह' जैसी कहानियां हमारी नसों को तड़काने की जगह पठनीय हो जाती हैं। वह भय, यातना और गंध महसूस नहीं होती जो मंटो को अलग से पढ़ते हुए महसूस की जा सकती है। दरअसल जिस्मों की मार्फत कही गई उसकी कहानियां हमारी पथराई. हुई रूहों का आईना है जिसे देखकर अपनी छुपी हुई गलाजत का भी एहसास हो।

अगर यह एहसास कुछ कम होता है तो इसलिए कि नन्दिता दास का मंटो कुछ शरीफ लगता है | सब कुछ तोड़फोड़ देने की वह आत्मघाती कामना उसमें नहीं दिखती जो शायद मंटो में रही होगी। नवाजुद्दीन ने अच्छा काम किया है, लेकिन शराब में खुद को गर्क करने वाले लेखक की तड़प और तकलीफ उनकी आंख, उनके चेहरे पर नहीं दिखती। बेशक, सफिया की भूमिका में रसिका दुग्गल बहुत भली लगती हैं- अपनी घुटती हुई यातनाओं को बहुत चुपचाप जज़्ब करती हुई और एक टूट रहे लेखक को संभालने का पूरा जतन करती हुई।

को संभालने का पूरा जतन करती हुई। बेशक, इस्मत चुगताई इस फिल्म में बहुत हल्की हो गई हैं। अपने समय की यह दुस्साहसी लेखिका-जो मंटो से लगातार संवादरत रहती है और अपने समाज से संघर्षरत- फिल्म में बहुत कटी-छंटी, मुलायम और नफीस सी लेखिका में बदल दी गई हैं। नफीस वे रही होंगी, लेकिन उनके जीवन के संघर्ष कहीं से मंटो से कम नहीं रहे और उन्होंने उनसे कुछ ऐसे जीवट से लोहा लिया कि सब अंततः हार गए।

फिर भी नंदिता दास का शुक्रिया अदा करना चाहिए। वे ऐसे समय में मंटो और उसके जमाने से हमें रूबरू करा रही हैं जो बहुत ही सपाट ढंग से खूखार और संवेदनहीन है। विकास की एक चमकीली पन्नी शहरों के मुख्य बाजारों में चिपका दी गई है और उसके पीछे का बदबूदार अंधेरा कितना गाढ़ा और कितना बड़ा है-यह देखने वाला कोई नहीं बचा है। हालांकि कहना मुश्किल है, इस जमाने में कितने लोगों को मंटो या किसी भी लेखक की परवाह है। ये फिल्म कम सिनेमाघरों में लगी और जहां लगी है, वहां भी दर्शक नहीं दिख रहे थे।

फिर भी जब हमारे समय से यह शिकायत होगी कि वह बहुत सारी बाजारू, समझौतापरस्त, सांप्रदायिकतापसंद, फासीवादी मंसूबों से लैस मानसिकता के आगे लगभग घुटने टेक रहा था तब भी प्रतिरोध की कुछ रचनात्मक आवाजे बची हुई थीं जो हमें हमारा मंटो लौटा रही थीं।

 

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