Sunday, 24 May 2020 13:18

फिल्म 'मोहल्ला अस्सी' : इतिहास के महावृतान्त गलियों में घटित होते

Written by विजय कुमार
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पिछले दिनों इंडियन एक्सप्रेस के आधे पृष्ठ पर में काशीनाथ सिंह जी एक-सी सुन्दर तस्वीर छपी थी जिसमें उनके लाल कुर्ते और धवल दाढ़ी वाले आकर्षक मुस्कराते चेहरे के साथ बनारस का अस्सी घाट भी दिखाई देता था। 'टी, टाइम एंड काशी' शीर्षक वाले इस फीचर की लेखिका दीप्ति नागपाल डिसूजा ने काशीनाथ जी के साथ गंगा तट पर टहलते हुए एक दिलचस्प बातचीत की थी। वाराणसी की एक पुरानी बहु सांस्कृतिक परम्परा का क्षरण, नब्बे के दशक का बाजारवाद, साम्प्रदायिक उभार, धार्मिक सांस्कृतिक स्थलों में पैठता एक लुम्पैन व्यावसायीकरण, संस्कति के बहद अर्थ का धार्मिक कट्टरता में रिड्यूस होते जाना तथा राम जन्म भूमि आन्दोलन व मंडल कमीशन की पृष्ठभूमि में एक जातीय परिवेश में आते सूक्ष्म बदलाव के मुद्दे इस बातचीत में उभरे थे ।

उभरे थे । 'काशी का अस्सी' उपन्यास पर आधारित डॉ. चन्द्र प्रकाश द्विवेदी की फिल्म 'मोहल्ला अस्सी' सेंसर की भारी काट-छांट के बाद आखिर पिछले नवम्बर में सिनेमाघरों में रिलीज हो ही गयी। छह वर्ष से कम फिल्म अटकी हुई थी। मल्टीप्लेक्स के बाजार समय में किसी गैर-मसाला फिल्म को देख पाना उस बस को पकड़ने जैसा है जो अभी आयी और अभी गयी। फिल्म पर - सेंसर की मार साफ दिखाई देती है। लगभग 20 मिनट की हिस्सों की काट-छांट से फिल्म का नरेटिव बुरी तरह से प्रभावित हुआ है। इसके बावजूद यह एक उल्लेखनीय फिल्म है। जनपदीय परिवेश और एक खास स्थानिकता की आंच को हिन्दी फिल्म में महसूस कर पाना दुर्लभ है। यदि किसी भी सिनेमा की सबसे बड़ी ताकत एक 'लोकेशन' और उसके वातावरण को रचने में है तो 'मोहल्ला अस्सी' में अपनी स्थानिकता में लिपटा यह वातावरण बड़े प्रभावशाली ढंग से उभरा है। गली, सडक, मोहल्ले इमारतें, भीड़, जीवन की एक खास परिपाटी, सामूहिकता और अकेलापन, बाहर गली का शोर और घर के भीतर के अंधेरे, आस्था और व्यावहारिक जरूरतों के बीच फंसी जिन्दगियाँ. संवाद और चप्पियाँ, पप्पू की चाय की दुकान और बहसें और इस सबका घेरता हुआ एक बड़ा राजनीतिक, सामाजिक कारवतना दशक की वे तमाम आन्दालन, बखूबी रचा गया है। नब्बे के की वे तमाम उत्तेजनाएं, राम जन्मभूमि जन, रथयात्रा, अयोध्या मार्च व मंडल न की पृष्ठभूमि में ग्रासरूट की नाइयों को यह फिल्म विश्वसनीय ढंग भारती है। फिल्म उन दबावों को लोकेट ती है जब जिन्दगियाँ बहुत सूक्ष्म स्तरों बदल रही हैंएक जुनून और आरोपित महिकीकरण समूचे सामाजिक परिवेश अवचेतन में किस तरह की भीतरी हलचलें पैदा कर रहा है!

फिल्म के शुरुआती दृश्यों में कहीं यह संवाद उभरता है कि 'करप्शन हमारा राष्ट्रीय चरित्र है'। यह व्यंग्य जैसे कि उस समचे सामाजिक ढाँचे पर है जिसमें सबसे बड़ी सच्चाई जिन्दा रहने का संघर्ष हैगंगा तट का वह पुराना अस्सी मोहल्ला, विदेशी टूरिस्टों के दलाल बनते पंडे या धर्म, आस्था, परम्परा, संस्कृति के पुराने 'क्लीशों' में लिपटा हुआ भौतिक मजबूरियों और पाखंड से भरा एक समय, पुराने विश्वासों पर हावी होता हुआ एक नये किस्म का अवसरवाद, चायघर में विभिन्न विचारवालों के बीच खुली बहसों का कम होते जाना, सार्वजनिक 'स्पेस' का संकुचन, कुछ विडम्बनाएं, कुछ तनाव, कुछ आन्तरिक क्षरण और कुछ निर्वासन-और इस सबके मिले जुले वातावरण को कुछ चरित्रों के मार्फत इस फिल्म में बखूबी रचा गया है। 

बखूबी रचा गया है। सिनेमा यदि ऐसे किसी परिवेश को स्वते हुए 'स्थान' और 'मनुष्यों के आन्तरिक विघटन का एक दस्तावेज बनता है तो यह उसका एक बड़ी उपलब्धि मानी जानी- यउसके 'नरेटिव' में इतिहास की बड़ा तारीखें और बृहद सामाजिक राजनीतिक पल पुथल की 'माइक्रोरियलिटी' यदि हता वह एक उल्लेखनीय बात है फर चाहे उसमें दूसरी बहुत सारी संभावनाएं अधूरी रह गयी होंकाशीनाथ सिंह का उपन्यास 'काशी का असी 'गंगातट' के अस्सी मोहल्ले के लोगों का सूक्ष्म अवलोकन भार इस उपन्यास पर बनी यह फिल्म उन अर्थों में एक ईमानदार फिल्म है कि उसकी विषयवस्त की चुनौतियाँ बहुत बड़ी थीं। . __

संस्कत शिक्षक और एक रूढ़िवादी धार्मिक पजारी (पंडित) की मुख्य भूमिका में अभिनेता सनी देओल और उनकी पत्नी की भमिका में अभिनेत्री साक्षी तंवर के यहत मार्मिक हैं। साक्षी तंवर अद्भुत रूप से प्रभावशाली हैं। रविकिशन, सौरभ शुक्ला का अभिनय भी जार जय भी जोरदार है। मुकेश तिवारी, राजेन्द्र गुप्ता गजेन्द्र गप्ता और सीमा आज़मी जैसे मंजे हुए कलाका लाकारों की बस झलकियाँ हैं फिल्म में । उन उन्हें बहुत मौका नहीं मिला। पप्प की चाय की दुकान को फिल्म का एक केन्द्रीय केन्द्रीय चरित्र बन कर जिस तरह से उभरना था, वह नहीं हो पाया। भारी काट-छाँट के कारण फिल्म अपने पीछे बहुत कुछ अधूरेपन की कसक छोड़ जाती है।

अधूरेपन की कसक छोड़ जाती है। इतिहास की तारीखें, ग्रास रूट की जिन्दगियाँ, इस जातीय जीवन में पैठे बहत सारे अन्तराल, सांस्कृतिक परिवेश और रोजमरी की लय का बदलना, भावनाओं के सघन क्षण, बहुत छोटे छोटे चरित्रों के माध्यम से एक महावृतान्त का उभरना हिन्दी फिल्मों में यह सब कहाँ हो पाता है। 'मोहल्ला अस्सी' बनाने के पीछे जो साहस और रचनात्मक दृष्टि है, उसे अनदेखा नहीं किया जा सकता। 

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