अर्थ जगत

अर्थ जगत (7)

 

आम - बसट पेश होना है, लेकिन सरकार की दुश्वारियां हैं कि कम होने का नाम ही नहीं ले रहीं हैं। आर्थिक मंदी और गिरती जीडीपी दर से सरकार जी जान पहले से ही हलकान कर रखी है। फिर अर्थव्यवस्था में जारी नरमी के कारण चालू  वर्ष में कर से प्राप्त राजस्व के भी लक्ष्य की तुलना में दो लाख करोड़ रुपये कम रह जाने की आशंका है। तमाम कोशिशों के बावजूद सरकार निराशा भरे माहौल को खुशगवार बनाने में नाकाम रही है। उच्च महंगाई दर से लेकर मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र की सुस्ती ने उसकी फजीहत कर रखी है। जाहिर है कि उसकी कोशिश सकारात्मक और उम्मीदों से लबरेज बजट पेश करने की होगी। सवाल उठता है कि देश के मध्य आय वर्ग या नौकरीपेशा को इस बजट से क्या अपेक्षा करनी चाहिए?

            वेतन भोगियों और छोटे उद्यमियों का प्रतिनिधित्व करने वाला देश का यह मध्य आय वर्ग हमेशा की तरह मुंह बाये खड़ा है। साल दर साल और बजट दर बजट लाभ और राहत पाने की उम्मीदें उसके लब तक आते-आते छलक जाती हैं। सरकार टुकड़ों-टुकड़ों में यानी कभी वरिष्ठ नागरिकों के लिए, कभी महिलाओं या अन्य वर्गों के लिए नाम मात्र की राहत पेश करती भी है, लेकिन पहले नोटबंदी और अब महंगाई से जूझ रहे इन वर्गों के लिए यह राहत जल्द ही काफूर हो जाती है।

            आम बजट 2020 में मध्य आय वर्ग के लिए सरकार का बड़ा कदम व्यक्तिगत आय कर की दरों में कटौती से संबंधित हो सकता है क्योंकि इसका सीधा वास्ता उपभोक्ता उपभोग में बढ़ोतरी से है। सितम्बर में काॅरपोरेट टैक्स रेट में कटौती होने से कंपनियों को काफी राहत मिली थी। बेशक, राजकोषीय बाध्यताओं की वजह से सरकार की अपनी सीमाएं हैं, लेकिन इस कदम से मांग बढ़ेगी जिसका लाभ पूरी अर्थव्यवस्था को प्राप्त होगा। वर्तमान में, 5 लाख रुपये से ऊपर की कर योग्य आय पर 20 प्रतिशत की दर से कर लिया जाता है, और 10 लाख रुपये से ऊपर की कर योग्य आय पर 30 प्रतिशत की दर से। जाहिर है कि 10 लाख रुपये तक की कमाई पर कर की दर खासी अधिक है। 10 लाख रुपये तक की आय के लिए कर की दर खासी अधिक है। 10 लाख रुपये की आये के लिए कर की दर में 10 प्रतिशत तक की कटौती या पांच से 15 लाख रुपये की सीमा में करदाताओं पर 15 प्रतिशत की विवेकसम्मत दर से कर लगाने पर करदाताओं के पास अधिक राशि आएगी जिसका उपयोग मांग बढ़ने के रूप में सामने आएगा या अगर पांच से 10 लाख रुपये तक की वार्षिक आय पर मौजूदा 20 फीसद की दर को घटाकर 10 फीसद तथा 10 से 20 लाख रुपये तक की वार्षिक आय पर मौजूदा 30 फीसद आय कर को घटाकर 20 फीसद कर दिया जाता है, तो भी इससे कम से कम फिलहाल वेतन भोगियों और मध्य वर्ग के लोगों को काफी राहत मिलेगी।  

लोकसभा में शनिवार को वित्त वर्ष 2020 - 21 के लिए पेश बजट में महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के लिए 30 हजार करोड़  रुपए का प्रावधान किया गया है। मौजूदा वित्त वर्ष के लिए आवंटित राशि से यह 14 फीसद अधिक है।

पोषण, सामाजिक सुरक्षा एवं कल्याण समेत सामाजिक सेवा क्षेत्र के लिए भी बजटीय आवंटन में वृद्धि हुई है। वर्ष 2019-20 के 3891.71 अपेक्षा 2020-21 में इसके लिए 4036.49 करोड़ रुपए का आवंटन किया गया है। राष्ट्रीय पोषण अभियान के लिए भी मौजूदा वित्त वर्ष के 3400 करोड़ रुपए की अपेक्षा आगामी वित्त वर्ष के लिए 3700 करोड़ रुपए का आवंटन किया गया है।

‘वन स्टाप सेंटर’ योजना के लिए भी बजटीय आवंटन में बड़ी वृद्धि हुई है और मौजूदा वित्त वर्ष के 204 करोड़ रुपए की अपेक्षा आगामी वित्त वर्ष के लिए 385 करोड़ का आवंटन किया गया है। प्रधन मंत्री मातृ वंदना योजना के लिए बजटीय आवंटन 2300 करोड़ रुपए से बढ़ा कर 2500 करोड़ रुपए कर दिया गया है। इस योजना के तहत गर्भवती महिलाओं तथा स्तनपान कराने वाली महिला को उसके बच्चे के जन्म पर 6000 रुपए दिए जाते हैं।

बाल सुरक्षा सेवा के लिए बजट का आवंटन 1350 करोड़ रुपए से बढ़ाक कर 1500 करोड़ रुपए कर दिया गया है। इस प्रकार महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के बजटीय आवंटन में मौजूदा वित्त वर्ष की अपेक्षा 14 फीसद वृद्धि के साथ्ज्ञ आगामी वित्त वर्ष के लिए कुल मिला कर 30,007.10 करोड़ रुपए का आवंटन किया गया है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ ’ योजना के लिए 220 करोड़ रुपए आवंटित किए गए हैं। महिला शक्ति केंद्र के लिए बजटीय आवंटन दोगुन कर इसे 50 करोड़ रुपए से बढ़ाकर 100 करोड़ रुपए कर दिया गया है। केंद्र प्रायोजित योजनाओं के लिए कुल 29 हजार 720.38 करोड़ रुपए के बजट का आवंटन किया गया है जो पिछले साल की अपेक्षा 3804 करोड़ रुपया अधिक है।

          डॉ मनमोहन सिंह

 पूर्व प्रधानमंत्री एवं प्रख्यात अर्थशास्त्री

             साभार : द हिन्दू 

 

भारतीय अर्थव्यवस्था की स्थिति बेहद चिंता में डाल देने वाली है | मै ऐसा विपक्ष की पार्टी के सदस्य के रूप में नहीं कहता बल्कि इस देश के एक नागरिक के रूप में कह रहा हूँ , अर्थशास्त्र के एक विद्यार्थी के रूप में कहता हूँ | अब तक यह जग जाहिर हो चुका है कि जी॰डी॰पी॰ की सामान्य दर पंद्रह वर्ष के सबसे निचले स्तर पर है , बेरोजगारी पिछले 45 वर्षों में सबसे ज्यादा बढ़ी है | लेकिन अर्थव्यवस्था इन परेशान कर जाने वाले आंकड़ों से चलती ही नहीं है | किसी देश की अर्थव्यवस्था की स्थिति उस देश के समाज के कार्यकलाप की झलक भी होती है | किसी अर्थव्यवस्था का काम-काज उसके नागरिकों और संस्थानो के बीच सामाजिक आदान-प्रदान तथा परस्पर लेन – देन से होता है | इस प्रकार के आदान-प्रदान की बुनियाद में आत्मविश्वास निहित होता है जिससे ही अर्थजगत में रवानी आती है |

आज समाज में भय का माहौल है , अनेक उद्योगपतियों ने मुझे बताया है कि वे सरकारी प्राधिकारों के उत्पीड़न से भयभीत हैं | कार्यवाही हो जाने के डर से बैंक नए ऋण देने में आनाकानी कर रहे हैं | निहित स्वार्थ के चलते नाकामी के डर से व्यापारी नए प्रोजेक्ट्स लगाने से हिचक रहे हैं | रोजगार पैदा करने वाले नए स्टार्ट-अप्स को गहरे संशय से देखा जा रहा है | सरकार और सरकारी संस्थाओं के नीति निर्माता सच कहने से बच रहे हैं , नागरिकों और संस्थानो के बीच ऐसा अविश्वास हो जाने के कारण आर्थिक गतिविधियों पर उल्टा असर पड़ता है जो कि आर्थिक सुस्ती कि नीव रखता है और आर्थिक शिथिलता का बुनियादी कारण बनता है |

मीडिया , न्यायपालिका और जाँच एजेंसियों जैसी स्वतंत्र संस्थानो पर जनता का विश्वास काफी कम हो गया है| विश्वास के क्षरण के कारण ही उद्योगपति जोखिम से बचने के लिए नई योजनाओं में नए रोजगार पैदा करने में असफल होते हैं | उद्योगपति , बैंकर , नीति निर्माता और नागरिकों के बीच सरकार के प्रति जो अविश्वास पैदा हुआ है उसके कारण ही देश कि आर्थिक रफ्तार थम सी गई है | जहाँ एक ओर बैंकर ऋण देने में असमर्थ हैं , उद्योगपति निवेश करने में असमर्थ हैं | आय बढ़ नहीं रही तो वहीं उपभोक्ता मांग धीमी पड़ गई है |

पिछली सरकारों के कार्यकालों में जो भी ऋण दिए गए उन्हे लेकर माना जा रहा है कि वो अयोग्य लोगों को दिए गए | अब जो नई औद्योगिक परियोजनाएं सरकार द्वारा चलाई गईं हैं वे सब सरकार के इष्ट मित्रों द्वारा ही जमाई जा रही हैं |

मेरा मानना है कि भारत की कमजोर अर्थव्यवस्था की मांग बढ़ाने के लिए दोतरफा उपाए करने होंगे , वित्तीय उपाए के साथ ही सामाजिक नीति के जरिए निजी निवेश को प्रोत्साहन देना होगा | इसके तहत हमारे समाज के आर्थिक भागीदारों में विश्वास बहाली करनी होगी | भारत अभी तीन ट्रिलियन डॉलर का वैश्विक आर्थिक पावर हाउस है जो कि कोई छोटी अर्थ व्यवस्था नहीं है जिसे अपने मन मुताबिक हाँका जा सके और न ही इसे रंगीन सुर्खियों और मीडिया के शोर से नियंत्रित किया जा सकता है | खराब खबरों को दबाना और आर्थिक आंकड़ों को छुपाना उज्ज्वल अर्थव्यवस्था के लिए घातक है |

वर्तमान में विश्व की अर्थव्यवस्था में भारत के लिए अवसरों का अंबार है , चीनी निर्यात में गिरावट से भारत के लिए निर्यात के मोर्चे पर खासे अवसर उभर आए हैं | वैश्विक बाजार में कच्चे तेल के दामों में गिरावट के रुझान के मद्देनजर भारत के सामने अप्रत्याशित अवसर हैं | मै प्रधानमंत्री से आग्रह करूंगा कि उद्योगपतियों के प्रति संशय न पालें , हम समाज में परस्पर विश्वास की दिशा में चलेंगे तो अपनी अर्थ व्यवस्था को सिकुड़ने से रोक सकेंगे |   

    

 

रघुराम राजन
रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर और अन्तर्राष्ट्रीय मुद्राकोष के मुख्य अर्थशास्त्री 
 
अमेरिका की ब्रोन यूनिवर्सिटी के ओपी जिंदल लेक्चर में रघुराम राजन के वक्तव्य का संपादित अंश 
साभार - सर्वोदय जगत 
 
बहुसंख्यकवाद और निरंकुशता से देश अंधकार में जाता है और अस्थिरता बढ़ती है । भारत की अर्थवयवस्था में वृद्धि दर टिकाऊ नहीं है और लोकप्रिय नीतियों के कारण खतरा है कि अर्थव्यवस्था कहीं लातिन अमरीकी देशों की तरह न हो जाए । 
वर्तमान भारतीय अर्थव्यवस्था में सुस्ती का एक अहम कारण नोटबंदी और जी•एस•टी रहा है । और वहीं पूर्व में सरकार पर प्रोत्साहन पैकेज को लेकर काफी दबाव था । 
मोदी सरकार में सारी शक्तियां एक जगह थीं , ऐसे में सरकार के पास अर्थव्यवस्था को लेकर कोई दृष्टिकोण नहीं था । मंत्रियों के पास कोई ताकत नहीं थी और ब्यूरोक्रेट्स फैसले लेने की इक्षा शक्ति नहीं थी।  गंभीर सुधार के लिए कोई आइडिया नहीं था । यहां तक कि सीनियर अधिकारियों को बिना किसी सबूत के हिरासत में ले लिया गया । मै इस बात को लेकर दुखी हूं कि पूर्व वित्त मंत्री को बिना किसी जांच के जेल में कई हफ्तों रखा गया । संस्थानों की कमजोरी से सभी सरकारों के निरंकुश बनने की आशंका रहती है , ऐसा 1971 में इंदिरा गांधी के वक्त में भी था और अब 2019 में मोदी के वक्त में भी है ।
 
 

 
 

जनमानस - economic,s desk 

आर्थिक मंदी : नीतियों की विफलता या बदहाली का भ्रम

पिछले दिनों ' ईज ऑफ डूइंग बिजनेस ' में 190 देशों के बीच भारत 14 पायदान की छलांग लगाकर 63 वें नंबर पर पहुंचा , तमाम चुनौतियों के बीच हम प्रवासियों से सबसे ज्यादा हिस्सेदारी पाने की अपनी अव्वल पोजीशन को कायम रखने में कामयाब रहे ।
वहीं देश में अर्थ व्यवस्था परस्पर चिंता का विषय बनी हुई है। वर्तमान अर्थव्यवस्था चुनौतियों का सामना करते तो देखी जा सकती है क्योंकि जी•डी•पी• ग्रोथ रेट आगे बढ़ने के बजाए लगातार पीछे की ओर खिसक रही है । न औद्योगिक उत्पादन बढ़ रहा है , न मांग में इजाफा हो रहा है।
इसका एक प्रमुख कारण पूंजीपतियों का डर है ।

• जुलाई 2019 में सी सी डी कैफे कॉफी डे के संस्थापक ने नदी में कूद कर जान दे दी क्योंकि उन्हें लगा कि वो मुनाफे वाला बिजनेस मॉडल नहीं दे पाए ।
• जून 2019 में कारोबारी साजन पारायली ने केरल के कन्नूर में इसलिए खुदकुशी कर ली क्योंकि स्थानीय प्रशासन उनके सभागार को कथित तौर पर लाइसेंस देने में आनाकानी कर रहा था । साजन विदेश में सफल कारोबारी थे , लेकिन अपने देश की संस्थागत बाधाओं से जान देकर भी पार नहीं पा सके ।
• इनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका के सी ई ओ विनीत विग उम्मीदों के आसमान में मनचाही उड़ान नहीं लगा पाए तो 2016 में गुरुग्राम में अपने अपार्टमेंट से कूद कर जान दे दी।
• 2016 में स्टार्टअप की सफलता की रफ्तार से निराश कारोबारी लकी गुप्ता ने नाइट्रोजन गैस से खुदकुशी कर ली।

यह घटनाएं कोई किस्सागोई नहीं बल्कि हमारे आस पास की हकीकत बयान करती है ।

पांच ट्रिलियन डॉलर की इकोनॉमी भले ही नामुमकिन न हो लेकिन प्रथम प्राथमिकता इस बात की होनी चाहिए कि भारत इस आर्थिक मंदी से कैसे निकलेगा जिस विचार की बुनियादी आवश्यकता यह है कि इस सच को झुठलाने के बजाए स्वीकारा जाए ।

अभी हमारे देश में प्रति व्यक्ति सालाना आय करीब 2000 डॉलर है । इकोनॉमी जब 5 ट्रिलियन डॉलर होगी तो प्रति व्यक्ति सालाना आय 3600 डॉलर तक पहुंचेगी । लेकिन सालाना 3600 डॉलर की तरक्की के बावजूद भारत विकसित देशों में शुमार नहीं हो पाएगा । क्योंकि विकसित देश होने के गौरव की न्यूनतम शर्त सालाना 12 हजार डॉलर की आय है । यानी मौजूदा आय का 6 गुणा इसलिए 5 ट्रिलियन का सपना बहुत मुश्किल है लेकिन अगर सरकार भविष्य पर नज़र रखते हुए , इतिहास से प्रेरणा ले कर कार्य करे तो यह असम्भव भी नहीं है । क्योंकि उदारीकरण 1992 में शुरू हुआ था और पिछले 27 साल की उपलब्धि यह है कि हमारी प्रति व्यक्ति आय चार गुणा हुई है ।
चुनौती से निपटने की सबसे बुनियादी जरूरत का अवसर तो सरकार के सामने ही है कि वह कम से कम इस बात को तो स्वीकार करे कि देश में मंदी है ।

केंद्र सरकार ने सभी टोल प्लाजा पर एक दिसंबर से फास्टैग अनिवार्य कर दिया है। यदि किसी टोल पर स्कैनर में कोई खराबी है और फास्टैग को स्कैन नहीं कर पा रहा है, तो वाहन चालक को कोई पैसा नहीं चुकाना होगा। वह फ्री में ही टोल से गुजर सकेगा।

एनएचएआई के क्षेत्रीय अधिकारी अब्दुल बासित ने बताया कि किसी टोल प्लाजा पर स्कैनर में कोई खराबी आ जाती है और वह आपका फास्टैग स्कैन नहीं कर पा रहा है तो इसके लिए वाहन चालक जिम्मेदार नहीं होगा। इस स्थिति में चालक को कोई पैसा नहीं चुकाना होगा और वह फ्री में टोल से गुजर सकेगा। साथ ही वह मैनुअल तरीके जीरो फीस की रसीद भी काटेंगे, ताकि उस गाड़ी का रिकॉर्ड दर्ज हो जाए। इसके लिए टोल पर बोर्ड लगाने के लिए भी कहा गया है, जिससे जागरूकता फैलाई जा सके। 

फास्टैग का रंग निर्धारित
एनएचएआई के मुताबिक कार, जीप वैन के लिए नीले रंग का फास्ट टैग निर्धारित किया गया है। हल्के वाणिज्य वाहनों के लिए लाल व पीला रंग, बस के लिए हरा व पीला रंग, मिनी बस के लिए संतरी रंग निर्धारित किया गया है। 

ट्रक को क्षमता के अनुसार मिलेगा रंग
ट्रक को उनकी क्षमता के अनुसार रंग दिया गया है। 12 से 16 हजार किलो वजन वाले ट्रक को हरा रंग, 14,200 से 25 हजार किलो के ट्रक को पीला रंग, 25 से 54 हजार किलो के वजनी ट्रक को गुलाबी तथा 54,200 किलो से अधिक वजन के ट्रक को आसमानी रंग दिया गया है। जेसीबी व अन्य निर्माण कार्य में प्रयोग होने वाली मशीन के लिए ग्रे रंग का फास्ट टैग निर्धारित हुआ है।

फास्टैग की कमी से घंटों करना पड़ा इंतजार
राजधानी के सभी टोल प्लाजा पर गुरुवार को भी काफी भीड़ रही, लेकिन फास्टैग की कमी और सर्वर की समस्या के कारण लोगों को घंटों इंतजार करना पड़ा। इस दौरान रायबरेली रोड स्थित दखिना टोल प्लाजा, सीतापुर रोड स्थित इटौंजा टोल प्लाजा, नवाबगंज टोल प्लाजा सहित सभी जगहों पर फास्टैग न मिलने से लोग परेशान दिखे।

टाटा स्टील यूरोप ने अपनी पुनर्गठन योजना पर यूरोपीय वर्क्स काउंसिल (ईडब्ल्यूसी) के साथ विचार विमर्श शुरू कर दिया है। योजना पर अमल से तीन हजार के करीब रोजगार का नुकसान होगा। इनमें से 1,000 राजगार ब्रिटेन में कम होंगे। भारत की इस्पात क्षेत्र की इस प्रमुख कंपनी ने पिछले सप्ताह ही व्यापक बदलाव के अपने कार्यक्रम के तहत रोजगार में कटौती की घोषणा की है। कंपनी ने इसकी वजह वैश्विक मोर्चे पर इस्पात उद्योग के समक्ष लगातार जारी चुनौतियों के चलते उसे हो रहे नुकसान को बताया है।

कंपनी ने बुधवार (27 नवंबर) को जारी वक्तव्य में कहा है, ''व्यापक प्रस्ताव जो किया गया है उसके तहत टाटा स्टील यूरोप रोजगार की लागत को कम करना चाहती है।" इसमें कहा गया है, ''कार्यक्रम पर अमल होने से 3,000 के करीब कर्मचारियों की संख्या में कमी आ सकती है। इनमें से दो तिहाई कटौतियां प्रबंधन और कार्यालय आधारित कर्मियों में होंगी। इसके अलावा 1,600 के करीब नौकरियां नीदरलैंड, 1,000 ब्रिटेन में और 350 नौकरियां दुनिया में अन्य जगहों पर जा सकतीं हैं।

टाटा स्टील ने कहा है कि उसका इरादा वित्तीय रूप से मजबूत और वहनीय यूरोपीय कारोबार बनाना है। ऐसा कारोबार जो कि नवोन्मेष को बढ़ाने और कंपनी को कार्बनरहित इस्पात विनिर्माता बनाने की दिशा में जरूरी निवेश करने में सक्षम हो।

टाटा स्टील यूरोप के सीईओ हेनरिक एडाम ने कहा, ''इस व्यवसाय में हर किसी के समर्पण भाव को देखकर मुझे काफी गर्व होता है। कठिन परिस्थितियों में भी हर कोई सफल होने के लिये प्रतिबद्ध दिखाई देता है। मैं इन प्रस्तावों को लेकर सहयोगियों की चिंताओं को समझता हूं।

उन्होंने कहा, ''बदलाव से अनिश्चितता पैदा होती है, लेकिन हम रुके नहीं रह सकते हैं - हमारे ईद गिर्द पूरी दुनिया तेजी से बदल रही है और हमें इसके साथ चलना होगा। हमारी रणनीति एक मजबूत और निरंतर टिकाऊ बने रहने वाले यूरोपीय व्यावसाय को खड़ा करने की है जो कि भविष्य की सफलता के लिये जरूरी निवेश करने में सक्षम हो।"