Monday, 23 December 2019 15:01

आर्थिक मंदी पर मनमोहन सिंह के मन की बात

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          डॉ मनमोहन सिंह

 पूर्व प्रधानमंत्री एवं प्रख्यात अर्थशास्त्री

             साभार : द हिन्दू 

 

भारतीय अर्थव्यवस्था की स्थिति बेहद चिंता में डाल देने वाली है | मै ऐसा विपक्ष की पार्टी के सदस्य के रूप में नहीं कहता बल्कि इस देश के एक नागरिक के रूप में कह रहा हूँ , अर्थशास्त्र के एक विद्यार्थी के रूप में कहता हूँ | अब तक यह जग जाहिर हो चुका है कि जी॰डी॰पी॰ की सामान्य दर पंद्रह वर्ष के सबसे निचले स्तर पर है , बेरोजगारी पिछले 45 वर्षों में सबसे ज्यादा बढ़ी है | लेकिन अर्थव्यवस्था इन परेशान कर जाने वाले आंकड़ों से चलती ही नहीं है | किसी देश की अर्थव्यवस्था की स्थिति उस देश के समाज के कार्यकलाप की झलक भी होती है | किसी अर्थव्यवस्था का काम-काज उसके नागरिकों और संस्थानो के बीच सामाजिक आदान-प्रदान तथा परस्पर लेन – देन से होता है | इस प्रकार के आदान-प्रदान की बुनियाद में आत्मविश्वास निहित होता है जिससे ही अर्थजगत में रवानी आती है |

आज समाज में भय का माहौल है , अनेक उद्योगपतियों ने मुझे बताया है कि वे सरकारी प्राधिकारों के उत्पीड़न से भयभीत हैं | कार्यवाही हो जाने के डर से बैंक नए ऋण देने में आनाकानी कर रहे हैं | निहित स्वार्थ के चलते नाकामी के डर से व्यापारी नए प्रोजेक्ट्स लगाने से हिचक रहे हैं | रोजगार पैदा करने वाले नए स्टार्ट-अप्स को गहरे संशय से देखा जा रहा है | सरकार और सरकारी संस्थाओं के नीति निर्माता सच कहने से बच रहे हैं , नागरिकों और संस्थानो के बीच ऐसा अविश्वास हो जाने के कारण आर्थिक गतिविधियों पर उल्टा असर पड़ता है जो कि आर्थिक सुस्ती कि नीव रखता है और आर्थिक शिथिलता का बुनियादी कारण बनता है |

मीडिया , न्यायपालिका और जाँच एजेंसियों जैसी स्वतंत्र संस्थानो पर जनता का विश्वास काफी कम हो गया है| विश्वास के क्षरण के कारण ही उद्योगपति जोखिम से बचने के लिए नई योजनाओं में नए रोजगार पैदा करने में असफल होते हैं | उद्योगपति , बैंकर , नीति निर्माता और नागरिकों के बीच सरकार के प्रति जो अविश्वास पैदा हुआ है उसके कारण ही देश कि आर्थिक रफ्तार थम सी गई है | जहाँ एक ओर बैंकर ऋण देने में असमर्थ हैं , उद्योगपति निवेश करने में असमर्थ हैं | आय बढ़ नहीं रही तो वहीं उपभोक्ता मांग धीमी पड़ गई है |

पिछली सरकारों के कार्यकालों में जो भी ऋण दिए गए उन्हे लेकर माना जा रहा है कि वो अयोग्य लोगों को दिए गए | अब जो नई औद्योगिक परियोजनाएं सरकार द्वारा चलाई गईं हैं वे सब सरकार के इष्ट मित्रों द्वारा ही जमाई जा रही हैं |

मेरा मानना है कि भारत की कमजोर अर्थव्यवस्था की मांग बढ़ाने के लिए दोतरफा उपाए करने होंगे , वित्तीय उपाए के साथ ही सामाजिक नीति के जरिए निजी निवेश को प्रोत्साहन देना होगा | इसके तहत हमारे समाज के आर्थिक भागीदारों में विश्वास बहाली करनी होगी | भारत अभी तीन ट्रिलियन डॉलर का वैश्विक आर्थिक पावर हाउस है जो कि कोई छोटी अर्थ व्यवस्था नहीं है जिसे अपने मन मुताबिक हाँका जा सके और न ही इसे रंगीन सुर्खियों और मीडिया के शोर से नियंत्रित किया जा सकता है | खराब खबरों को दबाना और आर्थिक आंकड़ों को छुपाना उज्ज्वल अर्थव्यवस्था के लिए घातक है |

वर्तमान में विश्व की अर्थव्यवस्था में भारत के लिए अवसरों का अंबार है , चीनी निर्यात में गिरावट से भारत के लिए निर्यात के मोर्चे पर खासे अवसर उभर आए हैं | वैश्विक बाजार में कच्चे तेल के दामों में गिरावट के रुझान के मद्देनजर भारत के सामने अप्रत्याशित अवसर हैं | मै प्रधानमंत्री से आग्रह करूंगा कि उद्योगपतियों के प्रति संशय न पालें , हम समाज में परस्पर विश्वास की दिशा में चलेंगे तो अपनी अर्थ व्यवस्था को सिकुड़ने से रोक सकेंगे |   

    

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