शिक्षा

शिक्षा (6)

Monday, 23 December 2019 13:36

शिक्षा पर हमला

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शिक्षा पर हमला

लेखक : बिमल कुमार 
 
आज शिक्षा जगत , कई तरफ से प्रहारों को झेल रहा है । इनमें दो घटनाएं प्रमुख हैं । एक बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के संस्कृत एवं धर्म विज्ञान संकाय में डॉ फिरोज खान की नियुक्ति का इस आधार कि वे मुस्लिम हैं । दूसरी जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में फीस बढ़ाने के विरूद्ध छात्रों का आंदोलन ।
बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के संस्कृत एवं धर्म विज्ञान संकाय में डॉ फिरोज खान की नियुक्ति की अनुशंसा जिस चयन समिति ने की थी , उसके सदस्य उस विभाग के अध्यक्ष भी थे । शायद विरोध कर रहे लोगों का मानना है कि विभागाध्यक्ष , कुलपति आदि को विभाग की नियमावली , परम्परा एवं शुचिता का ज्ञान नहीं है । केवल उन्हें ज्ञान है जो ', हिन्दू संस्कृति ' के स्वयंभू ठेकेदार हैं ।
 
इस संदर्भ में कई महत्वपूर्ण ज्ञान सम्बन्धी आयाम है , जिन्हें समझना जरूरी है । पहली बात तो यह की धर्मशास्त्र अलग क्षेत्र है तथा धर्म की ठेकेदारी की व्यवस्था को पोषित करने वाला ज्ञान अलग क्षेत्र है । ये दोनों भिन्न हैं । धर्म शास्त्र व्यापकता की ओर ले जाता है तथा धर्म की ठेकेदारी की व्यवस्था संकीर्णता की ओर ले जाती है । 
 
दूसरी बात यह कि भाषा या ज्ञान को धर्म से जोड़ना गलत है । शब्दकोश , भाषा कोष , एवं ज्ञान कोषों की रचना तभी संभव हुई , जब ऐसे बुद्धिमान आए जो दो या दो से अधिक भाषाओं के प्रकांड विद्वान थे । अपनी मातृ भाषा के अलावा अन्य भाषा का विकास जिस संस्कृति में हुआ , उसका मर्म समझकर व उसे आत्मसात करके ही वे ऐसे कोषों की रचना कर सके । वे कई संस्कृतियों को जोड़ने तथा उनकी सम्मिलित शक्ति का संवर्धन करने वाले लोग थे । जहां एक ओर कई भाषाओं , संस्कृतियों को समृद्ध करना है । वहीं इस प्रक्रिया में जन्म आधारित श्रेष्ठता का निषेध भी होता जाता है । 
 
यहां यह समझना जरूरी है कि साधना भी किसी एक धर्म से जुड़े लोगों में परिसीमित नहीं होती । बौद्ध साधना कि पद्धतियां बहुत लोगों ने सीखें हैं। जैसे कि महर्षि रमण , महर्षि अरविंदो आदि अनेक विभूतियां ज्ञान को उपलब्ध हुई हैं । जिनके शिष्यों में बड़ी संख्या में अन्य धर्मों के लोग भी थे । 
 
धर्म से भाषा या संस्कृति या कर्मकाण्ड या साधना को जोड़ने के पीछे का मकसद बहुलतावादी संस्कृति पर हमला है । शिक्षा के स्वरूप पर हमला , एक दूसरे तरफ से भी हो रहा है । जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय , नई दिल्ली में शैक्षणिक तथा छात्रावासों की फीस कई गुणा बढ़ा दी गई है।
फीस का मामला तो अपनी जगह है ही लेकिन छात्रों के आंदोलन का विरोध करने वालों ने जे एन यू के खिलाफ जिस तरह का मोर्चा खोला दिया , उससे जाहिर हो गया कि फीस तो बहाना है , असली हमला जे एन यू कि अस्मिता पर है । शिक्षा सर्वसुलभ हो इसलिए उच्च शिक्षा में फीस वृद्धि का एक ही नियम होना चाहिए ~ वो यह कि देश के सबसे ग़रीब 30 प्रतिशत परिवारों के छात्र उससे वंचित न रह जाएं । यह सिद्धांत देश भर के सभी राज्यपोषित शिक्षा संस्थानों पर लागू होना चाहिए । उच्च और प्रोफेशनल शिक्षा से गरीब वंचित किए जा रहे हैं , यह शिक्षा के स्वरूप पर एक बड़ा हमला है । यह जारी रहा तो शिक्षा अपने उच्च लक्ष्यों से भटक जाएगी और शिक्षा जिसे समता लाने का माध्यम बनना चाहिए , वह असमानता बढ़ाने का माध्यम बन जाएगी । 
 
शिक्षा पर जो चौतरफा हमला है , वह केवल छात्रों की चिंता का ही विषय नहीं होना चाहिए । सभी जागरूक नागरिकों को एकजुट होकर इसका विरोध करना होगा । ये राष्ट्र को बचाने की लड़ाई का हिस्सा है ।

स्पष्टता जरूरी नहीं है कि मात्रा का गुणवत्ता से कोई संबंध हो लेकिन समझा जा सकता है कि भारत किसी अन्य ब्रिक्स देश की तुलना में शिक्षा के मद पर कम खर्च करता है| विश्वसनीय आंकड़ों के अनुसार ब्राजील शिक्षा पर अपनी जीडीपी का 5.9% रूस 4.1 चीन 4.0 जबकि दक्षिण अफ्रीका करीबन 6% अपने नागरिकों को शिक्षा करने पर खर्च करता है इन्हीं स्रोतों के मुताबिक भारत इन मामले में खास पीछे है! जीडीपी का 3 पॉइंट आठ प्रतिशत शिक्षा पर खर्च करता है जबकि विश्लेषकों ने पिछले बजट में शिक्षा पर जीडीपी का लगभग 3.4 8% खर्च किए जाने बात कही है l चीन के साथ तुलना करने पर हमारे  आंकड़े काफी निराशाजनक है चीन की आबादी हमारी तुलना में ज्यादा है उन्हीं आंकड़ों के मुताबिक उसकी आबादी 1.38 बिलियन है जो भारत की आबादी 1.34 बिलियन से कोई ज्यादा नहीं है लेकिन चीन शिक्षा पर हम से 40 गुना  अदा खर्च आता है सर्वाधिक दुखद है कि चीन अपनी जीडीपी का 2.1 प्रतिशत शोध एवं विकास पर खर्च करता है जबकि भारत 1% से भी कम इस मद पर खर्च करता है इसका परिणाम हमें 2016 में देखने को मिला भी 11.3 4 मिलियन पेटेंट फाइल किए जबकि भारत के मामले में यह आंकड़ा 45000 से कुछ ज्यादा भारतीयों और अनिवासी भारतीयों दोनों को मिलाकर रहा l

जब शिक्षण की तरफ बढ़ते हैं तो वहां भी स्थिति बेहतर नहीं है जैसा कि एनुअल स्टेटस आफ एजुकेशन रूरल 2017 में कहा गया है स्कूल जाने वाले 14 से 18 वर्ष की आयु के आधे बच्चे बुनियादी गणित में निपुणता हासिल करने के लिए संघर्ष करते दिखते हैं उनकी भाषायी निपुणता भी कोई अच्छी नहीं है इसके बावजूद शिक्षा पर परिव्यय बढ़ाने के बजाय केंद्र में हमारे शासकों ने पहले से ही आपर्याप्त धन को पहले से बनिस्बत बेहतर उच्च शिक्षा संस्थानों की ओर भेजने का सिलसिला जारी रखा हुआ है मजे की बात यह है कि इसके बावजूद उच्च शिक्षा का कोई भी भारतीय संस्थान विश्व के मान्यता प्राप्त 100 संस्थानों की रैंकिंग में स्थान नहीं बना पाया है और मौजूदा स्थिति को देखते हुए नहीं कहा जा सकता कि आने वाले दशकों में कोई भारतीय संस्थान यह गौरव हासिल कर पाएगा दरअसल इस स्थिति के लिए 2 बुनियादी कारणों को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है पहला इन संस्थानों के लिए जितना धन मुहैया कराया जाता है वह विश्व में बाकी जगहों के उच्च शिक्षा संस्थानों को मुहैया कराए जाने वाले धन की तुलना में काफी कम हैl

द टाइम्स हायर एजुकेशन वर्ल्ड यूनिवर्सिटी रैंकिंग्स 2018 में यूनिवर्सिटी आफ पिट्सबर्ग 100  पायदान पर है 2017  मैं उसका परिचय आत्मक बजट 1.400 करोड़ रुपए था l और परिसंपत्तियों 2000 करोड़ रुपए की थी l उसी वर्ष इसका संचित कोष 22, 500 करोड़ रुपए था यह 2017 -18  मैं भारत के शिक्षा क्षेत्र के समूचे परिव्यय 67% है दूसरा कारण जो ज्यादा  महत्वपूर्ण है यह है कि आप प्राथमिक स्तर पर शिक्षा को मजबूत नहीं करेंगे तो उच्च शिक्षण के लिए अच्छे शोधार्थी कहां से पाएंगे ?  ग्रामीण क्षेत्रों के हाई स्कूलों के 50% बच्चों को गणित की बुनियाद समझ ही नहीं हो तो आने वाले समय में शोधार्थी कहां से मिलेंगे?  लाखों बच्चों को अच्छे से शिक्षित नहीं किया जा रहा है, तो इंस्टीट्यूशंस आफ एमएनएस बनाने की जरूरत ही क्या रह जाएगी ?

 

लेखक : विशेष गुप्ता

            कहने की जरूरत नहीं कि बच्चों के साथ ही उनके अभिभावक भी बच्चों के परीक्षा परिणाम और उनके भविष्य को लेकर भारी दबाव में रहते है। यह परीक्षा परिणाम से उपजे मानसिक दबाव का ही दुष्परिणाम है कि उत्तर प्रदेश माध्यमिक बोर्ड का परिणाम आते ही कई बच्चों ने अपनी जीवन लीला समाप्त कर ली। आँकड़े भी इस बात की पुष्टि करते है कि पिछले चार-पाँच साल में खराब नतीजों के चलते कई बच्चे आत्महत्या कर चुके है। फिलहाल इस गम्भीर मुदे पर चिन्तन और मनन की आवश्यकता है। परीक्षा में हासिल अंकों से नाखुश होकर अकेले पश्चिम उत्तर प्रदेश के तीन बच्चों ने आत्महत्या कर ली। पहली घटना मुजफ्फनगर की है, जहाँ एक छात्रा ने कम नम्बर आने की वजह से ट्रेन के आगे कूदकर जान दे दी। दूसरी घटना बुलन्दशहर जिले की है, जहाँ इण्टर के एक छात्र ने फेल होने पर फाँसी लगा ली। तीसरी घटना में बरेली जिले के एक हाईस्कूल की छात्रा ने आग लगाकर इसलिए जान दे दी कि वह स्कूल में अव्वल नहीं आ पायी थी। अगर देखा जाये तो इन तीनों ही घटनाओं में समानता यह है कि तीनों ने ही खेलने -खाने और भविष्य के सपने बुनने की उम्र बुनने की उम्र में यह आत्मधाती कदम उठाया। तीनों ही बच्चें कहीं न कहीं अपने भविष्य के बारे में खुद की राय को अलग रखते हुए परीक्षा में अच्छे अंक लाने को लेकर अपने - अपने परिवारों के दबाव में थे। बच्चों में बढ़ती आत्महत्या की प्रवृत्ति के विषय में हम कभी परीक्षाओं के साथ-साथ अच्छे परिणाम का दबाव, कभी अभिभावकों को अपेक्षाओं को दोषी टहराते है, परन्तु हम यह भूल रहे है कि आज का वैश्विक दौर कड़ी प्रतिस्पर्धा का है। जिन्दगी की इस होड़ ने बच्चों की नींद उड़ा दी है। बच्चो रोजगार से जुड़े भविष्य को लेकर असमंजस की स्थिति में है  इसलिए बच्चे अब पहले की तुलना में ज्यादा  निर्मम  आक्रामक और एकल होते जा रहे हैं l  अगर आज बच्चे की वास्तविक जिंदगी में परीक्षा परिणाम तक आसानी हो रहा है तो इसके लिए कहा कहीं हमारा परिवारिक व शैक्षिक माहौल दोषी है आज बच्चों का स्वाभाविक नैसर्गिक विकास बाधित हो रहा है उसका बचपन तमाम तरह की विसंगतियों से भरता जा रहा है विचारणीय है कि बच्चों का घर से भाग जाना आक्रामक होना एकांत में रहना दोस्तों के दबाव में रहकर लगातार सोशल मीडिया में डूबे एक कार को की पृष्ठभूमि इसी परिवारिक और शैक्षिक माहौल में तैयार हो रही हैl बच्चों के कैरियर विकास के दबाव और माता-पिता की बच्चों से असीम अपेक्षाओं के कारण बच्चे जो आत्मघाती कदम उठा रहे हैं उसके लिए केवल बच्चों को दोषी नहीं ठहराया जा सकता | इसके लिए बच्चों को समाज के शैक्षिक भांग और समाज की परिस्थितियों के अनुकूल ढालने और कैरियर संबंधी विकास को निश्चित दिशा देने का काम भी परिवार व स्कूल जैसी संस्थाओं का ही हैl शहरों और महानगरों में आप शैक्षिक और भौतिक जीवन में प्राथमिकताओं में क्रांतिकारी परिवर्तन हुआ है इसका ज्ञान ना तो परिवार और ना ही स्कूल दे रहे हैं यही कारण है कि स्कूल व परिवारों में बेहतर शिक्षण और बेहतर देखभाल चुनौती बन रही है l  बच्चों द्वारा उठाए जा रहे  इन  आत्मघाती कदमों के लिए सामाजिक माहौल भी कम दोषी नहीं है उक्त परिवार टूट रहे हैं और एकल परिवार समाज के आदर्श बन रहे हैं बच्चों का बचपन धीरे-धीरे सोना हो रहा है माता पिता और बच्चों के बीच स्वस्थ संवाद ना रहने से सामाजिक और शैक्षिक दुनिया का उपयोगी परिचय बच्चे के जीवन से फिसल रहा है l   यह इसी का परिणाम है कि बच्चों में समूह इत्ता धैर्य व संयम अनुशासन मूल व परंपराएं और संवेदनाएं जैसे शब्द उनके एकल जीवन से खिसक रहे हैं l  इसी संदर्भ में यहां यह कहना भी प्रासंगिक होगा कि स्कूल माता-पिता और बच्चों के बीच स्वस्थ संवाद ना होने का ही परिणाम है कि आज की फिल्में दूरदर्शन चैनलों और सोशल मीडिया के विभिन्न माध्यम इन एकल परिवारों में सिंह लगाकर बच्चों के बीच परिवार व स्कूल के स्थानापत्र बन रहे हैं| बच्चों में बढ़ती आत्महत्या की प्रवृत्ति  परीक्षा और उसके परिणाम के चलते कम बल्कि परिवारों में उनके करियर से जुड़ी गला काट प्रतिस्पर्धा की प्रवृत्ति को लगातार बढ़ाने के कारण अधिक हो रही है l  शोध बताते हैं कि भारतीय सामाजिक ढांचे में आ रहे सतत बिखराव शिक्षा व बच्चों के कैरियर विकास के बीच बढ़ती दूरी और अनभिज्ञता संयुक्त परिवार प्रणाली का विखंडन नगरों में माता-पिता के कार्य सेल होने से बच्चों की उपेक्षा जैसे कारक इसके लिए प्रमुख रूप से उत्तरदायी है |

वास्तविक स्थिति यह है कि आज मां बाप अपने बच्चों की तुलना अन्य बच्चों से करने के साथ-साथ अपना ध्यान बच्चों पर कम उनके परीक्षा नतीजे पर ज्यादा टिकाये  रहते हैं l  मां-बाप की इस सोच का दुष्परिणाम यह है कि परीक्षाओं में अथवा परीक्षा के परिणामों में बच्चों का श्रेष्ठ प्रदर्शन ना होने पर मां बाप बच्चों के प्रति उपेक्षा का भाव रखने लगते हैं              मनोचिकित्सको का भी मानना है कि इससे बच्चे आत्महत्या की ओर ले जाने वाले गहरे अवसाद में पहुंच जाते हैं l  दिल की यही स्थिति बच्चों में पनपते सफलता के भाव अथवा अप्रत्याशित त्रासदी आठवां सदमे का ही परिणाम होती है | 

 

शिक्षा क्षेत्र में फैसला आम तौर पर आम जनता की नजरों में आ नहीं पाते हैं कुछ बेतुके होते हैं कुछ अन्य स्पष्टता सही मालूम पड़ते हैं कि कोई भी उनकी फरक की जरूरत नहीं   महसूसता   इसलिए यह कदाचित ही राजनीतिक परिणामों को प्रभावित करते हो राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण होते हो यही  वह बड़ा कारण है शिक्षा का विषय ज्यादा वजनी चुनावी मुद्दा नहीं बन पाता इसलिए हालिया फैसले पर गौर करें जो इमानदारी से राजनीतिक  सर्वसम्मति से किया गया जो शिक्षा का अधिकार के तहत अनुत्री नहीं करने की नीति को हल्का किए जाने से संबंधित था तमाम राजनेताओं ने अपनी-अपनी पार्टी लाइन से ऊपर उठकर इसका समर्थन किया था मीडिया में भी इसकी ज्यादा आलोचना नहीं हुई| किए प्रतिगामी उपाय है भले ही देखने में सही प्रतीत होता है लोगों को यह अपने बालपन को याद करने पर बहुत सही लगता है उन्हें याद हो जाता है कि उन्होंने किस कदर कड़ी मेहनत की थी इस भय के चलते कि कहीं फेल ना हो जाएं इस तरह से सहेज ही इस नतीजे पर पहुंच सकते हैं कि बच्चों में फेल होने का डर जाता रहा | तो वे कड़ी मेहनत करना ही छोड़ देंगे इसलिए इस निष्कर्ष पर भी सहेजी भी पहुंच सकते हैं शिक्षण का स्तर निम्न है (क्योंकि संदिग्ध सर्वेक्षणों ने इसे बारंबार साबित किया है) क्योंकि अनुतीर्ण  न किए जाने के लिए कि नीति ने फेल होने का काफूर कर दिया है | यदि आप गरीब वर्ग के बच्चों की बाबत सोच रहे हैं तो ये त्वरित निष्कर्ष स्वयं सिद्ध हो जाते हैं|कदीमी खाता पीता मध्य वर्ग मानता है की पढ़ाई को लेकर हर दिन के डर से उनके बच्चे बेहतर प्रदर्शन करेंगे |

केंद्र राज्यों में फंसा मुद्दा

चुनावी चर्चा में शिक्षा के हिस्सा ना बन पाने का एक अन्य कारण है यह विषय केंद्र और राज्य के संबंधों में भ्रमित कर देने वाले विषय के रूप में विद्यमान है शिक्षा का समर समवर्ती दर्जा कोई नई बात नहीं है| अधिकांश लोगों को लगता है कि जिम्मेदारियों के बंटवारे को लेकर केंद्र और राज्यों के बीच भ्रम की स्थिति है वास्तविकता है भी कि दोनों पक्षों की जिम्मेदारियों में स्पष्ट विभाजन देखा नहीं है यहां तक की महत्वाकांक्षी राइट तू एजुकेशन जैसे कार्यक्रम को लेकर भी अभी तक केंद्र और राज्यों की भूमिका  परिभाषित नहीं हो सकी है | दोनों में से किस के चलते राइट टू एजुकेशन की गति  बंद पड़ी है  तय करना पाना आसान नहीं है और मतदाताओं तक यह बात पहुंचा पाना भी उतना आसान नहीं है भास्कर हिंदी पट्टी के मतदाताओं तक चुनावी बेला अपने देश में तमाम जटिल मुद्दों को गॉड कर देती है उसके शोर में बाकी सब कुछ परे धकेल दिया जाता है इससे हो स्पष्ट हो जाता है कि शिक्षा का मुद्दा चुनावी मुद्दा क्यों नहीं बन पाता स्कूलों और कक्षाओं में क्या कुछ चल रहा है कोई भी ज्यादा नहीं जान पाता शिक्षा को लेकर तमाम बड़े से बड़े दावे बड़े आराम से किए जा सकते हैं तकनीक आधारित समाधान की कचन में बड़ी आसानी से शिक्षा प्रणाली को प्रभावित करने वाले मुद्दों को अनदेखा कर दिया जाता है |

सेकेंडरी शिक्षा में जो स्लैब प्रणाली है उसमें केंद्र और राज्यों के बीच का विभाजन वर्गी विभाजन के रूप में मौजूद है उच्च समूहों के बच्चों को सेंट्रल बोर्ड ऑफ एग्जामिनेशन सीबीएसई तो समाज के बाकी हिस्सों के बच्चे स्कूल राज्य बॉर्डर से संबंध होते हैं दिल्ली इसका एक प्रमुख अपवाद है सीबीएसई और राज्य  गोल्ड में लाखों बच्चे हर साल फेल हो जाते हैं जिन्हें लेकर दिल्ली और राष्ट्रीय मीडिया को कोई ज्यादा चिंता नहीं होती जहां तक उच्च शिक्षा के बाद है तो अधिकांश बच्चे कालेज में प्रवेश तक नहीं ले पाते जाहिर है कि शिक्षा को नुकसान पहुंचाने वालों को कोई राजनीतिक नुकसान नहीं उठाना पड़ता! इतना ही नहीं  6 से 4 डिग्री वितरित करने वाली भूमिका में ही है यकीनन इसका एक बौद्धिक उद्देश है लेकिन एक औसत अभिभावक मतदाता के लिए यह ज्यादा मानी नहीं रखता |

 

शिक्षा क्षेत्र में गलत फैसले करने से भी राजनीतिक रूप से कोई ज्यादा नुकसान नहीं होता सवाल है कि यदि शिक्षा विकास के लिए इतनी महत्वपूर्ण है तो यह चुनावों की जीत हार पर असर क्यों नहीं डाल पाते इसके अनेक कारण हैं सवाल यह है कि शिक्षा क्षेत्र मतदाता का जैसे कोई मसला भी ना होता!

वह खराब सड़कें या बिजली को कमी  पर उदय लित होते हैं जिस राजनीतिक पार्टी के कार्यकाल में पानी की आपूर्ति सुधरी हो उसे शहरी मतदाता अच्छी पार्टी मानते हैं आपको याद करने पर भी कोई ऐसा चुनाव याद नहीं आएगा जब शिक्षा संबंधी किसी मांग को लेकर मतदाता एकजुट हुए हो

लेखक : प्रो॰ गिरीश्वर मिश्र

उच्च शिक्षा में सम्मिलित छात्रों के विशाल संख्या को देखने पर भारत की उच्च शिक्षा विश्व में अन्य तम सकती है लेकिन विस्तार में जाने पर उसकी स्थिति एक अंधी सुरंग जैसी लगती है जिसमें कई मोड़ एवं रुकावटें हैं और  गंतव्य स्पष्ट है इस अंधी सुरंग से बाहर निकलने का  कोई रास्ता भी नहीं दिख रहा है शिक्षक और शिक्षार्थी इस सुरंग में जगह-जगह ठहरे हुए हैं उन्हें रोशनी की प्रतीक्षा है इस सुरंग का निर्माण अंग्रेजों के समय शुरू हुआ था जब उन्होंने 19 वी सदी में भारत में आधुनिक विश्वविद्यालय की न्यू डाली थी औपनिवेशिक शासन की जरूरतों के मुताबिक सहायक तैयार करने के लिए उपाधि देने पाठ्यक्रम बनाने और उन पर निगरानी रखने की जिम्मेदारी संभालने के लिए विश्वविद्यालय बनाए गए हैं मद्रास में मेडिकल कॉलेज 1835 में रुड़की में थॉमसन इंजीनियरिंग कॉलेज 43 में और आगरा में सेंट जॉन्स कॉलेज 18 सो 50 में खुले विश्वविद्यालय को शिक्षण केंद्र बनाना बहुत  घटना है  कोलकाता में विश्वविद्यालय तो 18 57 में स्थापित हुआ पर वहां पर शिक्षण कार्य 1624 में शुरू हुआ इसके पहले यह विश्वविद्यालय केवल परीक्षा करवाता था यही स्थिति मुंबई और मद्रास विश्वविद्यालय को भी थी जो 1857 में स्थापित हुए थे तब शिक्षा कॉलेजों द्वारा ही दी जाती थी जो स्वयं स्वतंत्र इकाई की तरह कार्य करते थे|

उच्च शिक्षा की आरंभिक व्यवस्था में विश्वविद्यालय सीरवी प्रशासनिक कार्य करते हैं और शिक्षण और ज्ञान सर्वजन की दृष्टि से उनकी भूमिका नगण्य ही बनी रहे यही मॉडल भारतीय उच्च शिक्षा का मूल आधार बना औपनिवेशिक युग में ही आगे चलकर प्रांतीय सरकारों ने भी उच्च शिक्षा के केंद्र शुरू किए और कालेजों को संबद्धता देने वाले विश्वविद्यालय भी स्थापित कीजिए इससे उच्च शिक्षा का प्रसार और विस्तार हुआ वर्तमान में उच्च शिक्षा और स्तर पर 85% छात्र कॉलेजों में पढ़ रहे हैं और 15% विश्वविद्यालय में आज अधिकतर विश्वविद्यालय ज्ञान का सृजन करने वाले केंद्र कम और प्रमाण पत्र जारी करने वाली फैक्ट्री अधिक है स्वतंत्र भारत में केंद्र सरकार को उच्च शिक्षा के नियमन और विस्तार का अधिक अवसर और दायित्व दिया गया संविधान में शिक्षा को राज्य का विषय स्वीकार किया गया पर उच्च शिक्षा तकनीकी शिक्षा चिकित्सा शिक्षा और व्यवसायिक शिक्षा की दृष्टि से एक केंद्र को विशेष भूमिका दी गई स्कूली शिक्षक शिक्षा मूल्य ता राज्य का विषय है पर 14 वर्ष की आयु तक  प्राथमिक शिक्षा अनिवार्य रूप से उपलब्ध कराना राज्य और केंद्र दोनों का दायित्व है कुल मिलाकर केंद्र  शिक्षा के मामले में अधिक सक्षम है संविधान के 42 में संशोधन द्वारा शिक्षा को पूर्ण रूप से  समवर्ती सूची  में रखकर केंद्र को राज्यों को स्थाई सहयोगी बना दिया गया |

देश में 18 57 से 1947 के बीच कुल 20 विश्वविद्यालय स्थापित हुए 1947 में कॉलेजों की संख्या 500 से भी कम थी 2014-1015 आंकड़ों के हिसाब से देश में 757 विश्वविद्यालय और 40760 कॉलेज हैं केंद्रीय विश्वविद्यालय और उच्च शिक्षा के अन्य केंद्रीय संस्थान 162 है मानीत यानी डीम्ड विश्वविद्यालय  160 निजी विश्वविद्यालय 267 और 168 राज्य शासन के विश्वविद्यालय हैं छात्र संख्या बढ़ी जरूर है लेकिन अभी भी 18 से 23 वर्ष की आयु वर्ग में केवल 24% छात्र ही उच्च शिक्षा में अध्ययनरत हैं केंद्र सरकार ने उच्च शिक्षा को नियमित करने के लिए अन्य एक नियामक संस्थाओं जैसे यूजीसी नेट एमसीए एनसीटीई इत्यादि का गठन किया जो मान्यता देने कार्य दशाओं वर्तमान तय करने आदि का कार्य करती है|

केंद्र ही नेट, नीट, मैट, कैट, जेईई आदि प्रवेश परीक्षाएं कराता है| प्राय: यह माना जाता है कि उच्च शिक्षा के हर पक्ष पर केंद्र का नियंत्रण है अध्यापकों की सेवा शर्ते वेतनमान आरता कार्य के घंटे नीति आदि यूजीसी ही तय करती है  राज्य सरकार इन्हें लागू करने में ना केवल हीला हवाली करती है बल्कि पराया ग्रांट ना देने के कारण या फिर भविष्य में अपने बल पर वेतन आदि देने के बदले केंद्र की अनेक योजनाओं का लाभ ही नहीं उठाती है इसमें राज्य शासित अनेक विश्वविद्यालयों में स्वीकृति पद समाप्त हो जाते हैं राज्यों को लगता है कि अनेक अधिकारों का हनन हो रहा है यह विकल्प ढूंढते  है उन्होंने नेट की जगह  स्लेट चलाया|

केंद्र सरकार में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों भारतीय प्रबंधन संस्थानों केंद्रीय विश्वविद्यालयों और राष्ट्रीय प्रयोगशालाओं आदि की स्थापना की उन्हें पर्याप्त साधन मुहैया कराएं और उच्च शिक्षा की गुणवत्ता सुनिश्चित करने पर ध्यान दिया | दूसरी ओर राज्य सरकारों ने आंख मूंदकर उच्च शिक्षा के विस्तार को अंजाम दिया और अनेक केंद्रीय विश्वविद्यालय और संस्थान खोले|दूसरी ओर राज्य सरकारों ने राजनीतिक दबाव और लोकप्रियता अर्जित करने के लिए गुणवत्ता का ध्यान रखें बिना बिना उच्च शिक्षा को बढ़ावा दिया| इससे शिक्षा की गुणवत्ता गिरी| फिर निजी क्षेत्र भी इसमें शामिल हो गया और स्ववित्तपोषित कॉलेजों की भरमार हो गयी | आाज ज्ञान या कौशल से रहित शिक्षित बेरोजगारों की संख्या बढ़ती जा रही है। उच्च शिक्षा की व्यवस्था में स्वायत्तत्ता कम है और सरकारी नियंत्रण अधिक, जो अनपेक्षित दखल के रूप में बढ़ता जा रहा है। विश्वास की कमी के कारण शैक्षिक परिवेश में शोभ का वातावरण पनप रहा है। उच्च शिक्षा के क्षेत्र में निजीकरण एक और आयाम जोड़ा पहले तो सरकारी इससे बचती रही, लेकिन नौवं दशक में शुरू उदारीकरण  के दौर में निजी करण तेजी से बढ़ा | समवर्ती सूची का लाभ लेते हुए अनेक राज्यों ने अपने एक्ट बनाए| इसी के साथ निजी विश्वविद्यालयों की धूम मच गई | यूजीसी ने मात्र यह कहा कि ये विश्वविद्यालय संबद्धता नहीं हो देंगे और उनका कार्यक्षेत्र प्रदेश तक ही सीमित रहेगा | 2016 तक 236 निजी विश्वविद्यालय स्थापित हो गई| निजी कालेजों की संख्या में भी अनियंत्रित वृद्धि हुई और उन्होंने उच्च शिक्षा की रंगत बदल दी| सरकारी विश्वविद्यालयों से संबद्ध ये कालेज संख्याबल के कारण समूची व्यवस्था पर हावी हुए जा रहे हैं|

 

आपसी जोड़ तोड़ के चलते निहित स्वार्थ साधन के लिए विश्वविद्यालय प्रशासन पर अतिरिक्त दबाव बनता है| इसके दुष्परिणाम राज्यशासित विश्वविद्यालय में अनेक रूपों में दिखते है| शिक्षा का सुचारू रूप से संचालन केंद्र और राज्य का साजा दायित्व है साझा दायित्व में आपसी समझदारी और सहयोग की जरूरत होती है लेकिन आज राज्यों और केंद्र के बीच राजनीतिक उठापटक चलती रहती है अब तो सरकार बदलने के साथ उच्च शिक्षा की संस्थाए बलि का बकरा बन जाती हैं और उन पर येन केन प्रकारेण राजनीतिक नियंत्रण स्थापित करने की होड़ मच जाती है चौकी शैक्षिक गुणवत्ता ही विश्वविद्यालय की पूंजी है इसलिए उसकी रक्षा और संवर्द्धन की दृष्टि से विश्वविद्यालय के ढांचे पर ध्यान देना होगा और उन्हें स्वायत्त  केंद्रों के रूप में विकसित करना होगा|

 

ऐसा था नालंदा विश्वविद्यालय

नालंदा का नाम लेते ही मन में उस महान विश्वविद्यालय का ख्याल आता है और अपने सुधीर के परंपरागत वैभव पर आत्म गौरव होता है जो अत्यंत सुनियोजित ढंग से और विस्तार क्षेत्र में बना हुआ है दुनिया का पहला विश्वविद्यालय था जहां ना सिर्फ देश के कोने कोने से बल्कि विदेशों से भी छात्र पढ़ने आते हैं जिसकी स्थापना गुप्त शासक कुमारगुप्त प्रथम ने 450 - 470 ईसवी के बीच की थी  पटना से 88.5 किलोमीटर  दक्षिण-पूर्व और राजगीर से 11.5 किलोमीटर उत्तर में स्थापित इस विश्वविद्यालय में तब 12000 छात्र और 2000 शिक्षक हुआ करते थे |

गुप्त वंश के पतन के बाद भी सभी शासक वंश ने इसकी समृद्धि में अपना योगदान जारी रखा था किंतु कालांतर में एक तुर्क लुटेरे  भक्ति आखिरी ने 11 से 99 ईसवी में इस्लाम की चली आंधी से वशीभूत होकर इसे जला कर पूर्णतः नष्ट कर दिया |

विद्यार्थी यहां आकर ज्ञान की उस महान परंपरा में दक्ष होते थे, जहां से वे जीवन के भौतिक और आध्यात्मिक जगत के उन तमाम पहलुओं की शिक्षा ग्रहण कर सकें, जो उनके लिए उनके जीवन में  वरदान सिद्ध हो आज भी नालंदा का नाम लेने से यह विचार स्वत: स्फुरित उठता है कि मगध का नालंदा हमारी परंपरा की बहुत बड़ी जाती है जिसने दुनिया को ज्ञान मीमांसा तर्क मीमांसा वेद उपनिषद आयुर्वेद ब्रह्मांड का रहस्य ग्रह नक्षत्र वनस्पति शास्त्र परिस्थिति की इत्यादि विभिन्न विषयों का ज्ञान शरीर के विभिन्न अंगों के बारे में विस्तृत सुष्मिता जानकारी उस वक्त करा दी थी जब यूरोप अंधकार युग में था और खाड़ी के देश कब लिया जीवन जी रहे थे|

Wednesday, 27 November 2019 06:16

शिक्षा की बुनियाद

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लेखक : ज्योत्सना मिलन

      महात्मा गांधी ने सवाल उठाया था शिक्षा यानी क्या ? और जवाब देते हुए कहा था अगर इसका शिक्षा का अर्थ अक्षर ज्ञान जितना ही हो तब तो वह हथियार स्वरूप हो जाएगी जिस का सदुपयोग भी हो सकता है और दुरुपयोग भी  अक्षर ज्ञान का भी ऐसा ही है आमतौर पर अक्षर ज्ञान को ही शिक्षा कहा जाता है लोगों को पढ़ना लिखना हिसाब किताब करना सिखाने को शिक्षा देना माना जाता है l

      इस दृष्टि से भी हमारे समाज में महिलाओं में निरक्षरता अभी कम नहीं है और महिलाओं को पढ़ना लिखना सिखाने का काम आसान नहीं है | नई पीढ़ी की बहन बेटियां तो अब कुछ ना कुछ पढ़ लिख रही है लेकिन हमारी उन महिलाओं में भी पढ़ने का उत्साह अभी बचा हुआ है जो आधी उम्र पार कर आई हैं l बेबी सेवा जैसी संस्थाओं से जुड़ी होने पर साक्षर होने का मौका पा जाती है या मोहल्ले की पढ़ी-लिखी बहन बेटियों जो फुर्सत के समय पढ़ लिख लेती हूं l हिसाब किताब ना जाने की वजह से भी हमारे गरीब गैर साक्षर महिलाएं साहूकारों मालिकों और बिचौलियों के शोषण का भी शिकार होती रही है यह बात सभी जानते हैं|

      गांधी जी ने शिक्षा के संदर्भ में कुछ बहुत बुनियादी बातों का आगे रखा था, जैसे बाल को और बालिकाओं को साथ-साथ शिक्षा दी जानी चाहिए बच्चों का अधिक समय शारीरिक काम में लगना चाहिए वह भी शिक्षक की निगरानी में और शारीरिक काम को शिक्षा का अंग होना चाहिए l  हर बालक बालिका के झुकाव को  परख  कर उसे कोई काम सौंपा जाए lअक्षर ज्ञान से पहले उन्हें सामान्य ज्ञान दिया जाना चाहिए 9 साल के बाद के शिक्षा   स्वावलंबी  होनी चाहिए यानी कि विद्यार्थी सीखते सीखते ऐसे उद्योगों में लगा रहे कि उसके उत्पादन से स्कूल का खर्च चले l  शिक्षा मातृभाषा में ही दी जानी चाहिए l  हिंदी उर्दू को राष्ट्रभाषा के तौर पर और अंग्रेजी को दूसरी राष्ट्रों के साथ व्यवहार के लिए भाषा के तौर पर पढ़ाएं |

      हमने अपनी शिक्षा में गांधीजी के सबसे मौलिक और मूलभूत सुझाव को देश की आजादी के बाद जगह नहीं दी यह हमारी सबसे बड़ी चूक है l  सब कोई औपचारिक शिक्षा की पात्रता भी नहीं रखते हैं  कुछ लोगों का दिमाग अधिक सक्रिय होता है कुछ के हाथ और हाथ की उंगलियां और साथ में उनके कल्पना भी l इसलिए शिक्षा में बुनियादी तालीम को शुरू से ही जगह देने का गांधीजी का आग्रह जनहित में था बल्कि कहे सब के खेत में था शुरू में कहीं-कहीं बुनियादी तालीम  केंद्र जितनी जल्दी जिस तरह से गायब हुए उसी से पता चलता है कि हमारे शिक्षा तंत्र की उसमें कितनी आस्था थी वह इससे कितने अस्वस्थ थे ? अगर सरकार की और लोगों के गांधी जी द्वारा सुझाए शिक्षा प्रणाली में आस्था होती तो भारत की तस्वीर कुछ अलग होते अक्षर ज्ञान का मध्यम उद्योग होता तो हो सकता है आज इतनी बेकारी चारों और ना होती |

      हम मानते हैं कि विद्या विनयेन शोभते,  विद्या विनय से शोभित होती है पर अपना अनुभव शिक्षा के मामले में हताश करने वाला है l  कई बार देखने में आया कि हमारे बच्चे पढ़ लिख कर भी बेकार घूमते रहते हैं कुछ ऐसे काम हैं जिन्हें करने में उन्हें झिझक महसूस होती है l पढ़े लिखे हो कर बागवानी कैसे की जा सकती है गाय भैंस कैसे चराई  जा सकती है ?  बात गांवों  की हो या शहरों की इस मामले में पढ़े-लिखे लड़के लड़कियों का सोच लग पैरों की इस मामले में पढ़े-लिखे लड़के लड़कियों का सोच लगभग एक सा मिला l  यानी हम कह सकते हैं कि हमारी औपचारिक शिक्षा हमें काम में भेद करना सिखाती है काम को छोटा बड़ा बनाती है l

      गांधीजी का कहना था कि कोई भी काम काम होता है वह छोटा बड़ा नहीं होता l  उनके आश्रम में आकर रहना चाहने वाले व्यक्ति की वहां रह पाने की पात्रता की कसौटी शौचालय सफाई का काम होती थी शिक्षा में अधिकतर लोगों को बेकार बनाया है वह कहीं के नहीं रहे ना उनके पास कोई हुनर है ना कोई दूसरा काम ऊपर से पढ़े लिखे होने का अहंकार अलग पनप जाता है l  अपने गांवों के या शहरों के भी अनपढ़ और गरीब लोगों के प्रति हिकारत का-सा का स्वभाव  उनके मन में घर कर जाता है कि वह जाहिल गवार है जबकि हकीकत में पढ़े-लिखे चाहे वह ना हो पर जीवन के अनुभव से उर्जा ज्ञान उनके पास भरपूर होता है l हमारे किसानों को जमीन की मिट्टी की ठीक-ठीक जानकारी परंपरा से संवर्धित होती हुई विरासत में मिलती रही है l  जमीन का मिट्टी का रखरखाव बीज की हिफाजत मेड पर कौन से पेड़ कितने और कैसे लगेंगे खाद कैसे तैयार की जाएगी ? बारिश कब आएगी ?  सब कुछ कल संचित ज्ञान उन्हें विरासत में मिलता रहा था l

      नई तकनीकों रसायनिक खादों नए उपकरणों ने उनके ज्ञान को गड़बड़ा दिया है वे अपने ज्ञान को छोड़ करने के फेर में पड़ गए हैं l  अपनी मिट्टी से अपने बीच से उनका यह लगाओ भी नहीं रहा l  यही बात और भी कामों के बारे में कई जा सकती है पढ़ लिखकर पिता के पारंपरिक धंधे के ज्ञान को सहेजना उनके काम को लगाओ और जाओ से करना नई पीढ़ी को जरा भी  नहीं रुचता l

      पढ़े लिखो और गैर पढ़े लिखो के काम अलग हो गए हैं वह सम्मानजनक या आ सम्मानजनक हो गए हैं l  महिलाओं और पुरुषों के काम अलग हो गए हैं l  जैसे घर में कपड़े धोना खाना पकाना झाड़ू लगाना आदि काम महिलाओं के काम माने जाते हैं अगर सवाल पूछा जाए कि बड़े-बड़े होटलों के खाना  कौन पकाता है ?  लॉन्ड्री में कपड़े कौन धोता है ?  दफ्तरों में सफाई कौन करता है ? चक्की पर गेहूं कौन  पिस्ता है ?  तो जवाब होगा कि पुरुष फिर आप पूछेंगे फिर यह महिलाओं के काम कैसे हुए ?  तब आपको जवाब मिलेगा कि यह तो रोज का काम है रोजगार हैं l  तब आप सोचने पर मजबूर होंगे कि यानी अब समझ में आया कि खाना पका कर कपड़े धोकर पैसे मिलते हो तब वह एक आम आदमियों के हो जाते हैं और यही काम घर में मुफ्त में किए जाते हैं इसलिए वह महिलाओं के काम कहलाते हैं |

      हमारी महिलाओं के हिस्से सदा घर का काम रहा और लड़कियों को पढ़ाने के खिलाफ यह तर्क यह तन की पढ़ लिखकर क्या करोगी करना तो चूल्हा चौका ठीक है इसके अलावा महिलाओं के ऊपर बुद्धिहीनता का आरोप कि महिला की बुद्धि पैर के तलुए में होती है और उसकी औकात पैर की ज्योति के बराबर है कभी भी बदल लो पर अब जब  महिलाओं को पढ़ लिखकर  अपने को साबित करने का मौका मिला है शिक्षा और हुनर दोनो से सुसज्जित होकर वह आगे बढ़ते जाना चाहती है उसमें आत्मविश्वास  जागा है वह अपनी क्षमता को पहचान रही है बल्कि वह उससे चमत्कृत भी है l

      जब हम पढ़ते थे तो निजी स्कूल गिने-चुने ही थे वह भी लो प्रोफाइल वाले थे लेकिन सरकारी स्कूलों में जाना आम बात थी आज के विपरीत तब सरकारी स्कूलों में निचले तबके अलावा मध्य वर्ग उच्च मध्य वर्ग के भी बच्चे जाया करते थे l  आमतौर पर यह स्कूल घर के आस-पास ही होते थे यानी बच्चों की पैदल पहुंच में जिनके लिए किसी तरह के वाहन की जरूरत नहीं होती थी l  आज सरकारी स्कूलों को बंद करने की तैयारी में सरकार लगी है और और मां-बाप भी अपने बच्चों को दूर के तथाकथित अच्छे और महंगे स्कूलों में भेजना पसंद करते हैं परिणाम स्वरूप हर तबके बच्चों का साथ-साथ पल्ला बढ़ाना पढ़ना लिखना संभव नहीं रह गया है स्कूलों के घर से दूर होने के कारण बच्चे ऑटो से बैंक से या बसों से स्कूल जाते हैं |

      सुबह 7:00 बजे से निकले बच्चे ऊंघते हुए जाते हैं l  और दोपहर 2 या 3 बजे ऊंघते हुए थके लौटते हैं l  ढ़ेर सारा होमवर्क भी होता है l  यानी सबसे अधिक कटौती उनके खेल के समय होती है | पिछले वर्षों में इस बीच एक और राक्षस कार्टून नेटवर्क के रूप में विकसित हो गया है और बच्चे उसकी गिरफ्त में जकड़ते जा रहे हैं l

      मैं सदा कहती आई हूँ जब मुझे कोठारी आयोग के पड़ोसी स्कूल ही सिफारिश का पता भी नहीं था कि हमारे बच्चे हमारे मोहल्ले के ही स्कूल में क्यों ना  पढ़ें ? मोहल्ले के ही स्कूल को अच्छा स्कूल क्यों नहीं होना चाहिए ? 

 महंगी शिक्षा अच्छी ही होगी इसका क्या भरोसा है इसके अलावा यह भी है कि तकनीकी शिक्षा के विशेष स्कूल हमारे देश में खोलना चाहने वाला देशों के इरादे साफ हैं कि भारत के होशियार तकनीशियन पढ़ लिखकर उनके काम आए उनके देश में रहकर नौकरी करें लेकिन ना तो हम ना हमारी सरकार को समझने को तैयार है l

      इस साल अप्रैल में भारत सरकार ने पड़ोसी स्कूल वाली कोठारी आयोग की सिफारिश का मजाक उड़ाते हुए नई शिक्षा नीति लागू की है सिर्फ शिक्षा को अनिवार्य करने से समस्या हल नहीं होने वाली है,  इस शिक्षा का स्वरूप क्या हो कैसे हो यह भी सोचना जरूरी है l  1- 2  किलोमीटर की दूरी का प्राइवेट स्कूल जिसमें 75% बच्चे नवधनाढय वर्ग के हो और उसी में आरक्षित के नाम पर 25% बच्चे आसपास की गरीब बस्तियों के भी जबरन थोप दिए जाएं,  यह कोठारी आयोग के पड़ोसी स्कूल की परिकल्पना कतई नहीं है हर तबके बच्चे साथ-साथ पड़े यही पड़ोसी स्कूल का मतलब हैl

      हमने आजादी के इतने सालों बाद भी अपने देश के लोगों के अनुरूप कोई शिक्षा प्रणाली विकसित नहीं की है l  जो प्रणाली अंग्रेजों ने हमें थी उसी को हमने ज्यों का त्यों ले लिया l  औद्योगिक देशों और कृषि प्रधान देशों की शिक्षा एक्सी कैसी हो सकती है ?  आज भी हम अपने बच्चों को मानव दूसरे देशों की जरूरत के हिसाब से पढ़ा रहे हैं l

      अब हमारे शिक्षाविदों को चाहिए कि वे अपने देश के अनुरूप शिक्षा प्रणाली विकसित करने का प्रयत्न करें जिसमें औपचारिक शिक्षा पुनियानी उद्योग के माध्यम से दी जा सके  शिक्षा से बच्चे का सर्वांगीण विकास तभी हो सकता है जब बच्चों की बुद्धि,  उनके भाव जगत, उनके कल्पना जगत और उनके कर्म जगत (यानी हाथ से किए जाने वाले कारीगरों के काम) को  खेलने के विकसित होने के अधिक से अधिक अवसर उन्हें धर्म में,  स्कूल कॉलेजों में सुलभ हो सकेंl  इस दृष्टि से शिक्षा के संबंध में विचार करने की सख्त जरूरत है l