Monday, 23 December 2019 13:36

शिक्षा पर हमला

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शिक्षा पर हमला

लेखक : बिमल कुमार 
 
आज शिक्षा जगत , कई तरफ से प्रहारों को झेल रहा है । इनमें दो घटनाएं प्रमुख हैं । एक बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के संस्कृत एवं धर्म विज्ञान संकाय में डॉ फिरोज खान की नियुक्ति का इस आधार कि वे मुस्लिम हैं । दूसरी जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में फीस बढ़ाने के विरूद्ध छात्रों का आंदोलन ।
बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के संस्कृत एवं धर्म विज्ञान संकाय में डॉ फिरोज खान की नियुक्ति की अनुशंसा जिस चयन समिति ने की थी , उसके सदस्य उस विभाग के अध्यक्ष भी थे । शायद विरोध कर रहे लोगों का मानना है कि विभागाध्यक्ष , कुलपति आदि को विभाग की नियमावली , परम्परा एवं शुचिता का ज्ञान नहीं है । केवल उन्हें ज्ञान है जो ', हिन्दू संस्कृति ' के स्वयंभू ठेकेदार हैं ।
 
इस संदर्भ में कई महत्वपूर्ण ज्ञान सम्बन्धी आयाम है , जिन्हें समझना जरूरी है । पहली बात तो यह की धर्मशास्त्र अलग क्षेत्र है तथा धर्म की ठेकेदारी की व्यवस्था को पोषित करने वाला ज्ञान अलग क्षेत्र है । ये दोनों भिन्न हैं । धर्म शास्त्र व्यापकता की ओर ले जाता है तथा धर्म की ठेकेदारी की व्यवस्था संकीर्णता की ओर ले जाती है । 
 
दूसरी बात यह कि भाषा या ज्ञान को धर्म से जोड़ना गलत है । शब्दकोश , भाषा कोष , एवं ज्ञान कोषों की रचना तभी संभव हुई , जब ऐसे बुद्धिमान आए जो दो या दो से अधिक भाषाओं के प्रकांड विद्वान थे । अपनी मातृ भाषा के अलावा अन्य भाषा का विकास जिस संस्कृति में हुआ , उसका मर्म समझकर व उसे आत्मसात करके ही वे ऐसे कोषों की रचना कर सके । वे कई संस्कृतियों को जोड़ने तथा उनकी सम्मिलित शक्ति का संवर्धन करने वाले लोग थे । जहां एक ओर कई भाषाओं , संस्कृतियों को समृद्ध करना है । वहीं इस प्रक्रिया में जन्म आधारित श्रेष्ठता का निषेध भी होता जाता है । 
 
यहां यह समझना जरूरी है कि साधना भी किसी एक धर्म से जुड़े लोगों में परिसीमित नहीं होती । बौद्ध साधना कि पद्धतियां बहुत लोगों ने सीखें हैं। जैसे कि महर्षि रमण , महर्षि अरविंदो आदि अनेक विभूतियां ज्ञान को उपलब्ध हुई हैं । जिनके शिष्यों में बड़ी संख्या में अन्य धर्मों के लोग भी थे । 
 
धर्म से भाषा या संस्कृति या कर्मकाण्ड या साधना को जोड़ने के पीछे का मकसद बहुलतावादी संस्कृति पर हमला है । शिक्षा के स्वरूप पर हमला , एक दूसरे तरफ से भी हो रहा है । जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय , नई दिल्ली में शैक्षणिक तथा छात्रावासों की फीस कई गुणा बढ़ा दी गई है।
फीस का मामला तो अपनी जगह है ही लेकिन छात्रों के आंदोलन का विरोध करने वालों ने जे एन यू के खिलाफ जिस तरह का मोर्चा खोला दिया , उससे जाहिर हो गया कि फीस तो बहाना है , असली हमला जे एन यू कि अस्मिता पर है । शिक्षा सर्वसुलभ हो इसलिए उच्च शिक्षा में फीस वृद्धि का एक ही नियम होना चाहिए ~ वो यह कि देश के सबसे ग़रीब 30 प्रतिशत परिवारों के छात्र उससे वंचित न रह जाएं । यह सिद्धांत देश भर के सभी राज्यपोषित शिक्षा संस्थानों पर लागू होना चाहिए । उच्च और प्रोफेशनल शिक्षा से गरीब वंचित किए जा रहे हैं , यह शिक्षा के स्वरूप पर एक बड़ा हमला है । यह जारी रहा तो शिक्षा अपने उच्च लक्ष्यों से भटक जाएगी और शिक्षा जिसे समता लाने का माध्यम बनना चाहिए , वह असमानता बढ़ाने का माध्यम बन जाएगी । 
 
शिक्षा पर जो चौतरफा हमला है , वह केवल छात्रों की चिंता का ही विषय नहीं होना चाहिए । सभी जागरूक नागरिकों को एकजुट होकर इसका विरोध करना होगा । ये राष्ट्र को बचाने की लड़ाई का हिस्सा है ।
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