Saturday, January 17, 2026

क्रांतिवीर शिव वर्मा को याद करने आगे आई कानपुर लिटरेचर सोसाइटी

क्रांतिवीर शिव वर्मा जी की 29वीं पुण्यतिथि के अवसर पर कानपुर लिटरेचर सोसाइटी ने एक अनौपचारिक कार्यक्रम का आयोजन सिविल लाइन्स स्थित लिटिल शेफ होटल में किया| इस अवसर पर शिव वर्मा के जीवन और उनके योगदान को याद किया गया और उनके संस्मरण साझा किए गए।

शिव वर्मा का जन्म 9 फरवरी 1904 को हरदोई जिले में हुआ था। वे हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन के सदस्य थे और भगत सिंह व चंद्रशेखर आजाद के साथ काम किया। उन्होंने अपनी शिक्षा कानपुर में पूरी की और जल्द ही स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल हो गए|

कार्यक्रम में शामिल होने के लिए शहर के विभिन्न हिस्सों से लोग पहुँचे। इस अवसर पर शिव वर्मा की चर्चित पुस्तक ‘संस्मृतियाँ’ पर चर्चा होनें के साथ ही उनके जीवन से जुड़े अहम सामान जैसे जेल जीवन के दौरान पं जवाहरलाल नेहरू द्वारा उन्हें तोफे में दी गई प्लेट व दुर्गा भाभी द्वारा भेंट किए गए ग्लास व शिव वर्मा जी के परिचय पत्र, रेल पास, प्रेस कार्ड, घड़ी, चश्मा इत्यादि की फोटो प्रदर्शनी दिखाई गई|

कार्यक्रम में कानपुर लिटरेचर समिति के डॉ. आलोक बाजपेई व डॉ. अंजली बाजपेई ने शिव वर्मा से रहे पारिवारिक संबंधों और तत्कालीन राजनीतिक बहसों के किस्से सुनाए… क्रांतिकारी गया प्रसाद कटियार के पुत्र क्रांति कटियार ने कहा शिव वर्मा से मेरी कई मुलाकातें और यादें हैं मगर मुझे लगता है कि उनकी अहम रोचक पुस्तक “मौत के इंतज़ार में” पाठकों तक उस तरह ना पहुँची, इस पुस्तक में शिव दा ने जेल में बंद फाँसी का इंतेज़ार कर रहे कैदियों की कहानी दर्ज की है|

क्रांतिकारी सुरेन्द्र पाण्डेय के पौत्र सुधीन्द्र पाण्डेय ने कहा मेरे बाबा सुरेन्द्र पाण्डेय का जिक्र कई जगह शिव वर्मा ने अपने लेखों में किया, उनकी याद में बना ”शिव वर्मा पार्क” की दुर्दशा शहर पर एक दाग़ जैसा है| वरिष्ठ अधिवक्ता सईद नक़वी ने कहा शिव वर्मा के राजनैतिक चुनावों में जनता ने उस तरह का समर्थन नहीं किया, जैसा समाज को करना चाहिए| जनमानस फाउंडेशन के निदेशक लेखक, प्रखर श्रीवास्तव ने शिव वर्मा के जेल जीवन को याद करते हुए बताया की शिव वर्मा की अध्ययनशील आँखों को अंग्रेजी हुकूमत ने काला पानी जेल के दौरान एक आँख में शराब डाल कर ख़राब कर दिया था| जेल जीवन के साथ ही उन्होंने अपनी कलम से राष्ट्र की साहित्य सेवा भी खूब की….

साहित्यकार भावना मिश्रा ने शिव वर्मा जी द्वारा उल्लेखित राजगुरु और उनके सम्बन्धों पर अपने विचार रखते हुए आगरा निवास दौरान चंद्रशेखर आज़ाद के कथनो के हवाले से अपनी बात रखी| लेखिका अनीता मिश्रा ने शिव वर्मा के हवाले से सुखदेव के व्यक्तित्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि अपनी पुस्तक ‘संस्मृतियाँ’ में शिव वर्मा ने सुखदेव की भूख हड़ताल के संबंध में रोचक जानकारी लिपिबद्ध की है| प्रो. पंकज चतुर्वेदी ने कहा कि शिव वर्मा और भगत सिंह के संपर्क और संबंध भी बेहद मजबूत रहा, कानपुर का डी.ए.वी. कॉलेज दोनों की स्मृतियों का गवाह है| शिव वर्मा के इस शहर कानपुर में ही भगत सिंह ने बलवंत के नाम से पत्रकारिता भी की थी|

प्रो.खान अहमद फारूक़ ने कहा बिस्मिल की गज़ल “मिट गया जब मिटने वाला फिर सलाम आया तो क्या, दिल की बर्बादी के बाद उनका प्याम आया तो क्या….” को पेश करते हुए उसके मायने बताए तो वहीं सामाजिक कार्यकर्त्ता देवेंद्र श्रीवास्तव ने बताया कि कॉमरेड शंकर दयाल तिवारी के कहने पर ही मैं पहली बार शिव दा से मिला, वो किताबों को पूंजी ही मानते थे| सन 1951 में शिव दा द्वारा 5 खण्डो में संपादित मार्क्सवाद परिचय माला ऐसी कृति थी जिसने तमाम युवाओं को क्रांति हेतु प्रोत्साहित किया| कार्यक्रम में रज़ा जी, आनंद शुक्ला, राजेश अरोड़ा, खुशी, युसरा नक़वी, सुमन बाला कटियार आदि लोग मौजूद रहे|

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