
पिछले कई दशकों से भारतीय मेडिकल शिक्षा को सीटों की कमी की समस्या के रूप में देखा जाता रहा है। हर वर्ष लाखों छात्र मेडिकल प्रवेश परीक्षाओं में सम्मिलित होते हैं और सीमित सीटों के लिए कठिन प्रतिस्पर्धा करते हैं। परंतु वर्ष 2025 में एक ऐसा तथ्य सामने आया है जिसने इस पूरी धारणा को चुनौती दी है—NEET-PG और कुछ सुपर-स्पेशियलिटी पाठ्यक्रमों की लगभग 20 प्रतिशत सीटें खाली रह गईं। यह स्थिति विशेष रूप से निजी मेडिकल कॉलेजों और नॉन-क्लिनिकल विषयों में अधिक स्पष्ट है। यह केवल एक प्रशासनिक समस्या नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम के भीतर व्याप्त गहरी संरचनात्मक कमजोरी का संकेत है।
आज का पोस्टग्रेजुएट अभ्यर्थी वह युवा नहीं है जो केवल डिग्री की चाह में किसी भी सीट को स्वीकार कर ले। वह पहले से एक प्रशिक्षित डॉक्टर है, जिसने अस्पतालों की भीड़, संसाधनों की कमी, फैकल्टी की अनुपलब्धता और प्रशिक्षण के नाम पर श्रम शोषण को निकट से देखा है। इसलिए जब वह किसी उपलब्ध पीजी सीट को ठुकराता है, तो यह अहंकार नहीं बल्कि विवेकपूर्ण निर्णय होता है। यह स्पष्ट करता है कि समस्या छात्रों की संख्या की नहीं, बल्कि शिक्षा की गुणवत्ता की है।
पिछले एक दशक में भारत में मेडिकल कॉलेजों की संख्या में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है। नेशनल मेडिकल कमीशन के आँकड़ों के अनुसार, सैकड़ों नए कॉलेज खोले गए हैं, परंतु इसके साथ-साथ न तो प्रशिक्षित शिक्षकों की संख्या समानुपातिक रूप से बढ़ी है और न ही अस्पतालों में मरीजों का वास्तविक क्लिनिकल एक्सपोज़र। कई संस्थानों में आधुनिक भवन तो हैं, पर सीखने के लिए न पर्याप्त मरीज हैं और न अनुभवी शिक्षक। ऐसे में छात्र यह महसूस करने लगे हैं कि केवल इमारतें और मान्यता पत्र किसी मेडिकल कॉलेज को श्रेष्ठ नहीं बनाते; उसे श्रेष्ठ बनाते हैं वहाँ के मरीज और शिक्षक।
फैकल्टी की कमी से निपटने के लिए नियामक संस्थाओं द्वारा मानकों में ढील दी गई है—सेवानिवृत्ति की आयु बढ़ाई गई, सेवानिवृत्त शिक्षकों की पुनर्नियुक्ति की गई और विज़िटिंग या साझा फैकल्टी की व्यवस्था को मान्यता दी गई। ये उपाय तात्कालिक समाधान हो सकते हैं, पर दीर्घकाल में यह अकादमिक गुणवत्ता को कमजोर करते हैं। अनुभव और ऊर्जा का संतुलन टूटने से शिक्षण-प्रशिक्षण की जीवंतता प्रभावित होती है। मानकों को नीचे करने से केवल फॉर्म पूरे होते हैं, दक्ष डॉक्टर तैयार नहीं होते।
इस संकट का सबसे मूक और गंभीर प्रभाव नॉन-क्लिनिकल विषयों में दिखाई देता है। एनाटॉमी, फिज़ियोलॉजी, बायोकेमिस्ट्री, कम्युनिटी मेडिसिन जैसे विषय चिकित्सा शिक्षा की बौद्धिक नींव हैं। परंतु इन क्षेत्रों में करियर के सीमित अवसर, कम सामाजिक-आर्थिक सम्मान और शोध के अभाव ने इन्हें छात्रों की प्राथमिकता सूची से बाहर कर दिया है। जब शिक्षक और शिक्षण दोनों अवमूल्यित होते हैं, तब पूरी चिकित्सा प्रणाली की जड़ें कमजोर पड़ जाती हैं।
निजी मेडिकल कॉलेजों की भूमिका इस पूरे परिदृश्य में अत्यंत महत्वपूर्ण है। आज भारत के बड़ी संख्या में डॉक्टर निजी संस्थानों से प्रशिक्षित हो रहे हैं, किंतु कई कॉलेजों में घोस्ट फैकल्टी, न्यूनतम मरीज संख्या, कृत्रिम लॉगबुक और रेज़िडेंट्स से प्रशिक्षण के बजाय सेवा कार्य कराए जाने जैसी शिकायतें आम हैं। परिणामस्वरूप, छात्र इन संस्थानों पर भरोसा नहीं कर पा रहे हैं। वे समझ चुके हैं कि डिग्री भले ही पैसे से खरीदी जा सके, पर पेशेवर विश्वसनीयता केवल वास्तविक प्रशिक्षण और मरीजों के बीच रहकर ही अर्जित होती है।
बाल रोग जैसे संवेदनशील विषय में यह स्थिति और भी चिंताजनक है। बच्चों के स्वास्थ्य से जुड़ा निर्णय केवल तकनीकी दक्षता पर नहीं, बल्कि नैतिकता, अनुभव और समग्र दृष्टिकोण पर आधारित होता है। यदि अधकचरा प्रशिक्षण पाए विशेषज्ञ तैयार होंगे, तो इसका प्रभाव केवल चिकित्सा पर नहीं, बल्कि समाज के भविष्य पर पड़ेगा।
यह भी महत्वपूर्ण है कि इन खाली सीटों को केवल विदेश पलायन से जोड़कर न देखा जाए। अधिकांश पोस्टग्रेजुएट छात्र भारत में ही रहकर पढ़ना चाहते हैं, बशर्ते उन्हें गुणवत्तापूर्ण प्रशिक्षण मिले। वे देश से नहीं, बल्कि खराब व्यवस्था से दूरी बना रहे हैं। इस प्रकार खाली सीटें एक चेतावनी हैं—कि शिक्षा का विस्तार बिना गुणवत्ता के आत्मघाती सिद्ध होता है।
अंततः यह स्पष्ट है कि भारत को मेडिकल कॉलेजों की संख्या बढ़ाने से अधिक, मेडिकल शिक्षा की आत्मा को पुनर्जीवित करने की आवश्यकता है। पारदर्शी मान्यता प्रक्रिया, वास्तविक मरीज-आधारित प्रशिक्षण, फैकल्टी विकास और शिक्षकों को सम्मान—ये सभी अनिवार्य कदम हैं। यदि हमने समय रहते सुधार नहीं किया, तो भविष्य में संकट सीटों की कमी का नहीं, बल्कि भरोसे की कमी का होगा। और चिकित्सा जैसे विश्वास-आधारित पेशे में यह सबसे बड़ा खतरा है।




