Thursday, January 29, 2026

भंते प्रियदर्शी जी का साक्षात्कार

भंते प्रियदर्शी थेरो श्रीलंका से भारत आए एक बौद्ध भिक्षु और धम्म प्रचारक हैं। वे अपने हिंदी प्रवचनों, विशेष रूप से बोधिसत्व के जन्म, गृहत्याग और बौद्ध शिक्षाओं के माध्यम से बुद्धत्व (बुद्ध कथा) के रसास्वादन पर जोर देते हैं। वे बोधिसत्वों के मार्ग पर चलते हुए ध्यान (योगिक साधना) और ज्ञान के माध्यम से निर्वाण रस प्राप्त करने पर केंद्रित हैं।

प्रश्न 1) प्रियदर्शी जी आप श्रीलंका से हमारे बीच भारत भूमि में आए हैं। हम आपके जीवन चक्र के विषय में और आप जिस उद्देश्य को लेकर के अलग-अलग देशों में यात्राएं कर रहे हैं उस पर बात करें उससे पहले हम ये जानना चाहेंगे कि आप अपने बचपन के विषय में भंते बनने से पूर्व अपनी परिवारिक पृष्ठभूमि और श्रीलंका में प्राप्त शिक्षा के संदर्भ में बताएं।

उत्तर 1) मेरा जन्म भी हिंदू परिवार में ही हुआ। फिर जब मेरे माता-पिता बौद्ध धर्म के संपर्क में आए उन्होंने बौद्ध धर्म को स्वीकार कर लिया। उसके बाद हमने भी स्वीकार कर लिया। शुरू से ही हमारे मन में एक सन्यासी बनने की इच्छा थी और जब हम बुद्ध को जाने तो बुद्ध धर्म में शामिल के एक बौद्ध भिक्षु हो गए।

फिर हमारी शुरू की पढ़ाई जो है भारत के नागपुर विश्वविद्यालय से हुई। बैचलर डिग्री फिर मास्टर डिग्रीयाँ कई हैं जो बनारस यूनिवर्सिटी से संपूर्णानंद से भी है द यूनिवर्सिटी ऑफ हांगकांग से है और भी अन्य डिग्रियाँ अर्जित की हैं अभी इस समय भी हम श्रीलंका से पीएचडी कर रहे हैं| विषय है अ कंपैरेटिव न्यू अप्रोच योग विपस्सना एक तुलनात्मक अध्ययन है|

प्रश्न 2) बेहद कम उम्र में भगवान बुद्ध बनने के लिए सिद्धार्थ भी निकले थे और आप बुद्ध कथा को प्रचारित प्रसारित कर रहे हैं क्योंकि जनमानस न्यूज़ जनमत की आवाज है तो एक प्रश्न हम जनता का लेते हैं हमारे पास लखनऊ से अपूर्वा विद्यार्थी का एक प्रश्न आया कि यशोधरा के पिताजी ने विवाह हेतु किस तरह की परीक्षाएं बुद्ध की ली थीं ?

उत्तर 2) अब पहली बात तो समझना चाहिए कि परीक्षा बुद्ध की नहीं हुई थी। सिद्धार्थ की हुई थी। उसमें 16 प्रकार की परीक्षाएं थी। जिसमें अंतिम परीक्षा लक्ष्य वेद की थी। यानी मछली की आंख में तीर लगाना। समस्त राजकुमार जब पराजित हो गए। यशोधरा के पिता जो दंड पाणी है उन्हें भरोसा नहीं था कि साधु संत जैसे दिखने वाले सिद्धार्थ कुमार क्या ये कर सकेंगे अगर कोई आपत्ति विपत्ति आई तो क्या ये मेरी पुत्री की भी रक्षा कर पाएंगे इसलिए उन्होंने जो है ये स्वयंवर का आयोजन किया और जब सभी पराजित हो जाते हैं तो राज कुमार सिद्धार्थ ही अंतत मात्र में भी विजय हो जाते हैं।

प्रश्न 3) एक पत्रकार के नाते जब हम साहित्य की दृष्टि से देखते हैं तो भारत में एक बड़े साहित्यकार और लेखक रहे मैथली शरण गुप्त जी उन्होंने जो लिखा उसको मैं कोट कर रहा हूँ| उन्होंने यशोधरा के मन की बात कुछ इस तरह से लिखी कि “सिद्ध हेतु स्वामी गए यह है गौरव की बात पर चोरी चोरी गए यही बड़ा आघात” इस संदर्भ में आपकी टिप्पणी

उत्तर 3) जी एक और भी कविता है ”वो मुझसे कह कर जाते कहते तो क्या वो मुझे अपने पथ की बाधा पाते” मैं ऐसा कहूँगा कि शायद उन्होंने बौद्ध जो मूल ग्रंथ है वो नहीं पढ़ा होगा इसलिए उन्होंने ऐसा लिखा है बौद्ध त्रिपिटक बौद्ध जो ग्रंथ कहीं पे भी सिद्धार्थ कुमार यशोधरा को या पुत्र राहुल को सोते हुए या बिना बताए बिना पूछे चले गए ऐसा नहीं है| वो पूछते हैं सारी प्रक्रिया है पहले अपनी पत्नी से वो सहमति लेते हैं कि मैं वैराग्य लेना चाहता हूँ| तुम्हारी क्या इच्छा है तो पूरी सहमति से माता पिता की सहमति से यशोधरा की सहमति से उनकी इच्छा से उनकी आंखों के सामने वो गृह त्याग करते हैं तो वो चुपके से चले गए, ऐसा सत्य नहीं है|

प्रश्न 4) भारत में हम बचपन से ही देखते आए कि लाफिंग बुद्धा सबके घर में रहता था, सभी दुकानों में या शोरूम में लोग गिफ्टिंग पर्पस से उसको यूज़ करते थे, जबकि उनका जुड़ाव चीन से था। तो उस संदर्भ में आप बताएं

उत्तर 4) आप सही कह रहे हैं। वो चीन से ही हैं। वो एक बौद्ध भिक्षु थे। महायान में जैन परंपरा के बौद्ध भिक्षु थे। उनका नाम केसी या होतोई कहते हैं।
– क्या बुदई भी कहते ?
हाँ बुदई या होतोई वही। इसका अर्थ होता है कि थैला लिया हुआ
भिक्षु उन्हें लाफिंग बुद्धा इसलिए कहते थे क्योंकि जैसे बुद्ध अपने उपदेशों से अपने दर्शन मात्र से ही लोगों के दुख को हर लेते थे वैसे ही वो जहाँ जाते थे ऐसा हंसते थे कि लोग अपने सारे दुखों को भूल करके प्रसन्न हो जाते थे इसलिए इन्हें लाफिंग बुद्धा कहा गया|

प्रश्न 5) हिन्दू परिवेश में जन्म लेने के बाद बौद्ध धर्म में जाने का विचार किन कारणों से बना और भंते बनने कि प्रक्रिया आपके लिए कितनी मुश्किल रही, संस्मरणों के हवाले से बताएं और ये भी बताएं की महिला भंतों की संख्या में कमी आने के क्या कारण हैं ?

उत्तर 5) पहली बात तो ये देखा जाए कि भगवान बुद्ध से 2600 वर्ष पहले वैसे बुद्धों का धर्म तो कल्पों पहले शुरू होता है अगर हम पूछे कि बौद्ध धर्म की स्थापना कब से हुई तो 2600 वर्ष पहले से नहीं हुई वो तनंतर बुद्ध से शुरू होती है और एक से दूसरे बुद्ध का समय जो कल्पों में होता है और सम्राट अशोक के काल में पूरी धरती बुद्धों की थी और सब बुद्धिस्ट थे| तो ये कहा जाए हमारे पूर्वज भी पहले बुद्ध को मानने वाले थे, तो ये गलत नहीं होगा और
बौद्ध धर्म में वापसी का मार्ग प्रेषित करेगा | यही मेरे साथ भी हुआ|

बौद्ध धर्म की जनसंख्या प्रबल ना होनें की स्थिति में शुरू में कई
सारी समस्याएं आईं, मैं शुरू में नागपुर में रहता था तो ना जानने वाले भी जो है बहुत परेशानी खड़ा करते शिक्षा भिक्षा में अन्य
सारी चीजों में बहुत सारी दिक्कतें आती थीं|

यही कारण है कि समाज अभी इतना अच्छे तरीके से बुद्ध को नहीं
जानता है इसलिए ही पुरुष भिक्षुओं की संख्या तो बढ़ रही है मगर महिला भिक्षुनियों / भंते की संख्या में थोड़ी कमी आई है| क्योंकि समाज में अधिक आस्था न होने की वजह से महिलाओं के लिए संरक्षण की कमी है|

वैसे महायान में जो तिब्बती भिक्षु जिसे एनी कहते हैं वो तो बहुत सबल है जैसे लामा और एनी जो होती हैं तो उसमें भिक्षुणी संघ अभी भी प्रबल है| भारत में ही आप सिक्किम में चले जाइए अरुणाचल में चले जाइए लद्दाख की तरफ चले जाइए हिमाचल में उधर मसूर में बहुत बड़ा सेंटर बना हुआ है|

प्रश्न 6) तो क्या इनका बुद्ध विहार में प्रवेश वर्जित होता है?

उत्तर 6) नहीं ऐसा नहीं है बिल्कुल नहीं समान रूप से बौद्ध धर्म में भिक्षुक को जो अधिकार प्राप्त हैं भिक्षुणियों को भी वो ही अधिकार प्राप्त हैं| दोनों को बराबर

प्रश्न 7) देश में कई ऐसे दलित परिवार रहे हैं जो बुद्धिस्ट हो गए, अब इसमें सामाजिक चर्चा है कि व्यक्ति जब बुद्धिस्ट हो गया तो क्या उसको तब भी आरक्षण मिलना चाहिए ?

उत्तर 7) देखिए क्योंकि संवैधानिक रूप से संविधान में शायद ऐसा अधिकार है कि जो एस.सी. या एस.टी. से बुद्धिस्ट बनते हैं तो उनको वो सारे अधिकार बौद्ध बनने के बाद भी प्राप्त होते हैं। तो संवैधानिक रूप से ऐसा ही नियम है। है ना ? जी। अब संविधान बनाने वाले डॉ• बाबा साहब तो बड़े ही है। अब उन्होंने जो अधिकार दिया वो सोच समझ करके दिया होगा। इसलिए इसके ऊपर मेरी कोई टीका टिप्पणी नहीं है। मैं संविधान को मानता हूँ। संविधान में जैसा अधिकार है तो उसको मैं मानता हूँ।

प्रश्न 8) देखिए, एक विरोधाभास मैं देखता हूँ बौद्ध धर्म के कुछ लोगों ने कहा कि मूर्ति पूजा हमें नहीं स्वीकार है। मूर्तियों को बाहर निकाल देना चाहिए। लेकिन जब हम कई आयोजनों में जाते हैं तो हम देखते हैं कि जिन्होंने हमें बोलने की आज़ादी दी हमारे सम्मानित डॉ• साहब भीमराव अंबेडकर, उनकी ही मूर्ति को भगवान के रूप में पूजा करना, क्या ये विरोधाभास नहीं है ?

उत्तर 8) जी ये विरोधाभास आपके सामने ही नहीं हमारे सामने भी ये प्रश्न आता है। असल में अभी जो बौद्ध हो रहे हैं वो हमारे मूल त्रिपिटक जो हमारा बौद्ध धर्म का ग्रंथ है मूल त्रिपिटक उसको नहीं जानते, जिसमें 84 हजार स्कंध 84000 भगवान के उपदेश हैं ये लोग उसको ठीक से नहीं पढ़ रहे या जान ही नहीं रहे ऐसा समझिए बस कुछ लेखकों के किताब पढ़ के बस उतने से ही काम चला रहे हैं। अगर आप इतिहास उठा के देखेंगे तो पूरे विश्व में सबसे पहली बार अगर मूर्ति बनी तो महायान के बौद्ध आचार्यों ने भगवान बुद्ध की मूर्ति बनाई उससे पहले आप हिंदू धर्म में भी देख लीजिए वृक्षों की पूजा होती थी, पर्वतों की, घाटियों की, नदियों की, अग्नि की, वायु की इनकी पूजा होती थी|

मूर्ति की पूजा नहीं थी सबसे पहली बार भगवान बुद्ध के 32 महापुरुष लक्षण और 80 अनुबंधनों को ध्यान में रखते हुए बुद्ध का प्रत्यक्ष रूप हमें चाहिए ऐसा मान के उन्होंने भगवान बुद्ध की एक मूर्ति बनाई ये एकदम बुद्ध की मूर्ति नहीं कि बुद्ध ऐसे थे बस उनके 32 महापुरुष लक्षण 80 अनुवंजन के आधार पर मूर्ति बनाई इसलिए श्रीलंका, थाईलैंड, बर्मा अलग-अलग मूर्तियाँ हैं| लेकिन देख के आप पहचान लेंगे कि ये बुद्ध ही हैं|

यहाँ तक कि बौद्धों में भी दो परंपरा रही फेरवाद और फेरवा जिसे हीनयान कहते हैं तो महायान ने बनाया यह देख के थेरवाद भी नहीं स्वीकार कर पाया। बुद्ध ने मूर्ति पूजा के लिए कहाँ कहा है ? लेकिन बुद्ध महामंगल सूत्र में कह रहे हैं पूजा पूजन मंगलम। कोई अगर बुद्ध होगा जो मैं मेरे से परे होगा वो कहेगा ही नहीं कि मेरी पूजा करो। लेकिन अगर वो बुद्ध है तो वो ये भी बताएगा कि तुम्हारे लिए कौन पूज्यनी है। जैसे कोई भी टीचर ये नहीं कहेगा आओ आओ बालक मेरा पैर छुओ मुझे प्रणाम करो। तब जाओ बैठो। लेकिन वो ये जरूर बताएगा कि देखो तुम्हें अपने गुरुजनों का आदर करना चाहिए। उन्हें प्रणाम करना चाहिए। अब वो खुद ही समझ जाएगा कि मेरा गुरु कौन है|

भगवान बुद्ध के ही शिष्यों ने उनके गुणों को धारण करते हुए उनके प्रतीक रूप में जो है उनकी मूर्ति बनाई तो पूजा में जैसे पहले शुरू में मूर्ति नहीं थी चैत्य था अगर चैत्य शब्द की व्याख्या करें तो पाली में उसे चेती कहते है च तबती चेती पूजे त चैत्य का अर्थ होता है, जहाँ जाकर के मन लग जाए लीन हो जाए नहीं कहते भक्ति में लीन होना तो लीन हो जाए। दूसरे शब्दों में कहे तो पूजा करना। तो चैत्य का अर्थ ही होता है पूजा करना। और ये चैत्य तीन प्रकार के होते हैं। पारिभोगिक जो है उद्देशिक और धातु वो चीजें जिसको भगवान ने उपयोग किया है उसे पारिभोगिक चैत्य कहेंगे। और वो चीजें जिसे उद्देश्य करके बनाया गया है। भगवान को उद्देश्य करके बनाया गया उसे जो है उद्देशित चैत कहेंगे। जैसे मूर्ति उनके गुणों को उद्देश्य करके बनाया गया है। है ना ? तो ये भी इसका मतलब ये भी चैत्य चैत माने पूजा और फिर अंतिम आता है धातु चैत्य। धातु यानी भगवान बुद्ध के महापरनिवाण के बाद उनके शरीर को जब दाह संस्कार किया गया, जलाया गया तो जो अस्थियां बची वही अस्थि धातु है। उस अस्थि धातु को भी हम कहते हैं धातु चैत्य। जहाँ भी होगा उसका मतलब भी होता है पूजा करना। चैत्य माने पूजा करना। धातु चैत्य माने धातु पूजा।

प्रश्न 9) क्या बौद्ध धर्म भगवान बुद्ध ने खुद स्थापित किया था ?

उत्तर 9) जी देखिए बौद्ध धर्म की स्थापना भगवान बुद्ध ने खुद नहीं की थी, बल्कि उनके अनुयायियों ने उनके निधन के बाद उनकी शिक्षाओं को संकलित करके इस धर्म को स्थापित किया। भगवान बुद्ध ने अपने जीवनकाल में सिर्फ अपने संदेश को फैलाया था।

प्रश्न 10) आचार, विचार, त्यौहार और संस्कार किसी भी संस्कृति के चार स्तम्भ हैं और हर धर्म की अपनी एक संस्कृति है| बौद्ध धर्म की समाज में सांस्कृतिक चेतना क्या है ?

उत्तर 10) बौद्ध धर्म की शान्ति में तो हर पल हर दिन ही त्योहार के समान है, जहाँ तक बौद्ध धर्म की सांस्कृतिक चेतना की बात है तो उसमें अहिंसा, करुणा, और सहिष्णुता जैसे मूल्य शामिल हैं। यह धर्म लोगों को आत्म-निरीक्षण और आत्म-सुधार की ओर प्रेरित करता है। बौद्ध संस्कृति में शिक्षा, कला, और वास्तुकला का भी महत्वपूर्ण स्थान है।

प्रश्न 11) बुद्ध के ज्ञान मार्ग में चलते चलते बौद्ध धर्म के कई सम्प्रदाय क्यों पनप गए ?

उत्तर 11) बुद्ध के ज्ञान मार्ग में चलते-चलते बौद्ध धर्म के कई सम्प्रदाय बन गए क्योंकि उनके अनुयायियों ने उनकी शिक्षाओं की व्याख्या अलग-अलग तरह से की, उसे तरह वे वर्गीकृत हुए और संप्रेषित हुए – महायान, हीनयान, और वज्रयान जैसे प्रमुख सम्प्रदाय हैं।

प्रश्न 12) अन्य धर्म अपनी अपनी धार्मिक पुस्तकों से बंधे हुए हैं, क्या उसी तरह बौद्ध धर्म भी पुस्तक त्रिपटक से बंधा हुआ है ?

उत्तर 12) बौद्ध धर्म का त्रिपिटक स्वयं तीन पिटक : विनय पिटक, सुत्त पिटक, और अभिधम्म पिटक से बंधा हुआ है, लेकिन बौद्ध धर्म में पुस्तक सम्बंधित बाध्यता नहीं है, इसलिए ही इसकी भिन्नता और विविधता कायम है मगर त्रिपिटक बौद्ध धर्म का मुख्य ग्रंथ हैं जो भगवान बुद्ध की शिक्षाओं को संकलन है।

प्रश्न 13) भाग्यवाद और पुनर्जन्म के संबंध में बौद्ध धर्म की क्या मान्यताएं हैं ?

उत्तर 13) बौद्ध धर्म में भाग्यवाद की जगह कर्मवाद को महत्व दिया गया है। पुनर्जन्म की मान्यता है, लेकिन इसे एक चक्र के रूप में देखा जाता है जिसे निर्वाण प्राप्त करके तोड़ा जा सकता है।

प्रश्न 14) बौद्ध धर्म में जैसे दलाई लामा की गद्दी संप्रेषण की परम्परा का पैमाना और प्रक्रिया क्या रहती, उत्तराधिकारी कैसे चुना जाता ?

उत्तर 14) दलाई लामा की गद्दी संप्रेषण की परम्परा तिब्बती बौद्ध धर्म में उल्लेखित है। जिसमें उत्तराधिकारी का चयन पुनर्जन्म की प्रक्रिया से होता है, जहाँ पिछले दलाई लामा के पुनर्जन्म को खोजा जाता है और उसे ही अगला दलाई लामा बनाया जाता है।

प्रश्न 15) क्योंकि भारत में आप विद्यार्थी जीवन में तमाम अध्ययन आप करते रहते हैं, कृपया इस पर थोड़ा सा प्रकाश डालें कि भारत का जो इतिहास रहा बौद्ध धर्म को लेकर के और वर्तमान में बौद्ध धर्म जहाँ पर खड़ा है| ऐसा क्या कारण रहे जो बौद्ध धर्म लुप्त हुआ या कम हो गया ?

उत्तर 15) जी बौद्ध धर्म के विलुप्त होने के कारण जो हैं जैसे मिलिंद कृष्ण में राजा मिलिंद बताते हैं कि योग्य गुरु ना होने से भी बौद्ध धर्म नष्ट हो जाता है और किसी भी कार्य में शिथिलता होने से भी वो नष्ट हो जाता है। जैसे अरे अब सब तो हो गया। बस ठीक है मैं तो राजा हो गया। अब क्या करना बाकी है ? जैसे सावधानी हट गई तो दुर्घटना घट गई| योग्य गुरु धीरे-धीरे कम होने लगे और धर्म में शिथिलता आने लगी। दूसरे बाहरी आक्रमणकारी जब आए तो उनके आक्रमण की वजह से जैसे जब नालंदा को जलाया तो लोग कहते हैं कि जो नालंदा की लाइब्रेरी छ: महीने तक जलती रही तो इसका कारण छ: महीने तक जली अब जला के छ: महीने तो खड़े नहीं रहे होंगे वहाँ पे कि पूरा जल जाएगा तो हम जाएंगे छ: माह तक किसी ने लगी आग बुझाने का प्रयत्न नहीं किया ये शिथिलता है|

दूसरी सबसे बड़ी बात उसमें ये हुई कि वैज्ञानिक टाइप के लोग|होने लगे कि पूजा पाठ में क्या रखा है ? किताबों में क्या रखा है ? हमें पूजा क्यों करनी चाहिए ? हाँ। बुद्ध तो हृदय में होते हैं। है ना? किताबों में क्या रखा है ? ग्रंथ में क्या रखा ? तो जलने दो इसे। किताबें जल गई तो क्या हुआ ? बिहार जल जाए तो क्या हुआ ?

लेकिन कम से कम ये पानी डाल के बुझा सकते थे ना कुछ तो बचता लेकिन ये शिथिल हो गए और ये मान लिया कि वैज्ञानिक हो गए कि पूजा पाठ में कुछ नहीं रखा धर्म ग्रंथ में कुछ नहीं रखा यहाँ जाने से कुछ नहीं होता इस प्रकार का भाव आ गया तो जैसा आज के इस मॉडर्न जो अभी पनप रहे हैं नव बौद्ध वो भी बुद्ध विहार में जाते हैं। तो अगर उनको भगवान बुद्ध मिल जाए तो हाथ मिला लेंगे। आओ भगवान बुद्ध हाथ मिला लो और:क्या हालचाल है ? ऐसे करेंगे। वो माता-पिता को भी हाथ मिलाने लगे हैं। ऐसा लगता है माता पिता उनके दोस्त हैं। जी ठीक है। माता पिता बड़े होने के बाद दोस्त हो जाते हैं। लेकिन जो है फिर भी पूज्य है। हमेशा आदर के पात्र हैं।

प्रश्न 16) इस शिथिलता को सक्रियता में बदलने के लिए प्रियदर्शी जी आपके आगामी उद्देश्य क्या हैं आपकी सक्रियता किस तरह से इस आई शिथिलता को मजबूती में तब्दील करेगी ?

उत्तर 16) देखिए इस समय संसार के समस्त प्राणी बहुत व्याकुल है इस टेक्नोलॉजी के युग में सभी परेशान है। सब अशांत है। सबको मानसिक पीड़ा है। जैसे वेस्टर्न कल्चर है, वेस्टर्न कंट्रीज है, अमेरिका है, यूरोप है। लोगों को शांति चाहिए। तो आगामी हमारा उद्देश्य यही है कि भगवान बुद्ध के करुणा मैत्री की जो जो शिक्षा है
लोगों तक पहुँचे, लोगों के भीतर सत्यों के प्रति करुणा जगे लोगों में मैत्री हो|

लड़ाई झगड़े के विषय में भगवान बुद्ध कहते हैं ना किसी को मारो नहीं मैत्री करो जब हम किसी से मैत्री नहीं करेंगे किसी से प्रेम करेंगे तो मारने की नौबत ही नहीं आएगी है ना तो बुद्ध मारने को नहीं मैत्री करने को कह रहे हैं तो हमारा भी यही आगामी उद्देश्य है कि भगवान बुद्ध की करुणा और मैत्री से समस्त सत्यों को प्राप्त हों और मैं जब तक जीवित रहूंगा लोगों तक भगवान की करुणा मैत्री की बातों को शिक्षाओं को पहुँचाने का पूरा प्रयास करूंगा जब तक मेरे हाथ पांव में बल है।

प्रश्न 17) श्रीलंका के जो बौद्ध धर्म है इसी तरीके से जो भारत का जो बौद्ध धर्म आप देखते हैं चाइना का जो बौद्ध धर्म देखते हैं क्या कुछ समानताएं आप पाते हैं या कुछ फर्क पाते हैं ?

उत्तर 17) तीनों में श्रीलंका परंपरागत बौद्ध धर्म को मानने वाला वहाँ फेरवाद बौद्ध धर्म है| भारत में नौ बौद्ध है अभी सीख रहे हैं। किसी को थोड़ा पता है, किसी को इतना पता है। मूल कोई ये बता रहा है, कोई वो बता रहा है। क्योंकि एक परंपरा नहीं है। और चीन में महायान बौद्ध धर्म है। मगर वहाँ बौद्ध धर्म कम्युनिस्ट हाथों में है। वो किसी भी धर्म को नहीं मानते। वहाँ बौद्ध धर्म तो है लेकिन सारा बोलबाला कम्युनिस्ट के हाथ में है| बौद्ध धर्म वाले अपनी मर्जी से कुछ नहीं कर सकते। चाहें कुछ भी हो सब कम्युनिस्ट की चलती है।

प्रश्न 18) क्या इसको ऐसा भी कहा जा सकता है कि किसी भी धर्म के पनपने में सरकार की भी अहम भूमिका होती है ?

उत्तर 18) बिल्कुल बहुत भूमिका होती है। अब सोचिए अगर सम्राट अशोक राजा थे अगर वो राजा ना होते तो ये बौद्ध धर्म भारत से देश विदेशों में नहीं फैलता। पूरे भारत में तो फैला ही दिया। 10 महामात स्थापित किए जो भारत से लेकर के श्रीलंका और थाईलैंड, कंबोडिया आदि देशों में जाकर प्रचार किया| बौद्ध धर्म के प्रति हर व्यक्ति हर इंसान हर भारतीय के मन में एक सम्मान है|क्योंकि वो बहुत कुछ उसे देता है।

Advertisement
Gold And Silver Updates
Rashifal
Market Live
Latest news
अन्य खबरे