Monday, May 20, 2024

गणेश शंकर विद्यार्थी: जीवन, कर्म और लेखन

लेखक परिचय : डॉ राकेश शुक्ल (1967) विक्रमाजीत सिंह सनातन धर्म महाविद्यालय , कानपुर के हिन्दी विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर हैं | प्रो. शुक्ल के 100 से अधिक शोध पत्र और समीक्षा आलेख राष्ट्रीय शोध पत्रों में प्रकाशित हो चुके हैं तो वहीं 24 शोध पत्र पुस्तकों का हिस्सा हैं तथा उन्होंने 16 विद्यार्थियों का शोध निर्देशन तथा 21 विद्यार्थियों के लघु शोध का निर्देशन भी किया है | उन्होंने दर्जनों विषयों पर आकाशवाणी लखनऊ से अपने विचार रखने के साथ ही निरंतर तमाम पत्र-पत्रिकाओं के साथ न सिर्फ लेखन बल्कि सम्पादन का कार्य भी किया तथा तमाम पुस्तकों की समीक्षा और भूमिकाएँ लिखीं |

राष्ट्रीय संगोष्ठियों में प्रखर व्याख्यान के लिए जाने जाने वाले  प्रो. राकेश ने “जलता रहे दिया” (कविता संग्रह), “उनकी सृष्टि अपनी दृष्टि” जैसी तमाम पुस्तकें लिखीं जो कि पाठकों के बीच खूब लोकप्रिय हुईं | शिक्षण कार्य में सक्रिय प्रो. राकेश शुक्ल विभिन्न विश्वविद्यालयों में पी-एच०डी० के परीक्षक तथा विषय विशेषज्ञ एवं चयन समिति का हिस्सा हैं | डॉ शुक्ल को अब तक ‘इनोवेशन लीडरशिप एवार्ड’ (पं० बंगाल के राज्यपाल श्री केसरी नाथ त्रिपाठी द्वारा) , ‘साहित्य सेवा सम्मान’ (भारत के राष्ट्रपति, तत्कालीन राज्यपाल बिहार- श्री रामनाथ कोविन्द द्वारा) तथा जवाहरलाल नेहरू राष्ट्रीय युवा केंद्र के “साहित्य श्री सम्मान” (गुजरात के राज्यपाल श्री ओपी कोहली द्वारा) जैसे तमाम सम्मानों द्वारा नवाज़ा जा चुका है | 

महान स्वातंत्र्य सेनानी, जुझारू पत्रकार, निर्भीक लेखक और समाजसेवी गणेश शंकर विद्यार्थी का जीवन, कर्म और लेखन अपने समय में राजनीतिक, सामाजिक जीवन को दिशा देने के लिए जितना उपयोगी था, उतना ही आज भी है। वे अपने समय के न सिर्फ स्वातंत्र्य वीर थे; वरन् पत्रकारिता में जिस ईमानदारी, त्याग, धैर्य और बलिदान की जरूरत थी, उसकी मिसाल बन गए थे। स्वातंत्र्य आंदोलन में सक्रिय भागीदारी के अतिरिक्त अंग्रेज अधिकारियों एवं देशी नरेशों की निरंकुशता, उनके शोषण एवं दमनकारी नीतियों के विरुद्ध विद्यार्थी जी की लेखनी ने बड़े जन-जागरण का कार्य किया था। समाज के निर्धनों, किसानों, मजदूरों की समस्याओं को उजागर करने तथा सामाजिक जड़ताओं, अंधपरम्पराओं एवं कुरीतियों के विरुद्ध सामाजिक जागृति भी उनकी पत्रकारिता का मुख्य उद्देश्य रहा है।

बाल विद्यार्थी के रुझान का रुख और प्रथम गुरु 

26 अक्टूबर 1890 को इलाहाबाद के अतरसुइया मुहल्ले (ननिहाल) में जन्में विद्यार्थी जी के पूर्वज जौनपुर के मूल निवासी थे। 1857 के प्रथम स्वाधीनता आन्दोलन के बाद उनके प्रपितामह बाबू देवी प्रसाद हथगाँव (फतेहपुर) आ गए थे। इनके पितामह बाबू वंश गोपाल आबकारी इंस्पेक्टर थे और पिता बाबू जयनारायण जी उर्दू, फारसी तथा दर्शन के विद्वान थे। धार्मिक विचारों से युक्त उनकी माँ श्रीमती गोमती देवी श्रीरामचरित मानस का नियमित पाठ करती थीं। उनके पास बोध कथाओं का अपरिमित भण्डार था जिन्हें वे बालक गणेश को रोज सुनाया करती थीं। जब विद्यार्थी जी मात्र पाँच वर्ष के थे; उनके पिता ग्वालियर रियासत में शिक्षक नियुक्त हुए, अतः उनकी प्रारम्भिक शिक्षा विदिशा एवं साँची के सांस्कृतिक वातावरण में हुई। सन् 1905 ई0 में उन्होंने अंग्रेजी मिडिल परीक्षा पास की। आगे की पढ़ाई के लिए उनके पिता ने अपने बड़े पुत्र शिवव्रत नारायण के पास कानपुर भेज दिया। शिवव्रत नारायण आर्य समाज से जुड़े हुए थे, जिनकी प्रेरणा से विद्यार्थी जी अपने समय की प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं के पाठक बन चुके थे। कुछ दिन बड़े भाई तथा कुछ दिन पिता के पास रहते हुए उन्होंने व्यक्तिगत परीक्षा देकर एण्ट्रेन्स किया, तथा आगे की पढ़ाई के लिए उन्हें कायस्थ पाठशाला इलाहाबाद भेज दिया गया। इलाहाबाद प्रवास उनके जीवन का ऐसा मोड़ था, जो उनके व्यक्तित्व की निर्मिति का आधार बना। यहाँ उनकी एफ0ए0 की औपचारिक पढ़ाई तो पीछे रह गई; जबकि राजनीतिक, सामाजिक और पत्रकारिता की गतिविधियों में उनका मन अधिक लगने लगा। लेखन के बीज तो पहले ही अंकुरित हो चुके थे, जब मिडिल की पढ़ाई के दौरान उन्होंने ‘हमारी आत्मोत्सर्गता’ नामक सुदीर्घ आलेख लिखा था। इलाहाबाद में वे ‘कर्मयोगी’ पत्र से इतना प्रभावित हुए कि वह पत्र उनकी किताबों के बैग में रहता था, जिसे स्कूल या घर, जहाँ भी समय मिलता तो पढ़ते। इसी दौरान वे इस पत्र के सम्पादक पं0 सुन्दरलाल के सम्पर्क में आये,और उनके आग्रह पर सम्पादन में सहयोग भी करने लगे। इस प्रकार पं0 सुन्दरलाल पत्रकारिता के क्षेत्र में उनके प्रारम्भिक गुरु बने। उनके संपादन में प्रकाशित उर्दू के एक पत्र ‘स्वराज्य’ में भी विद्यार्थी जी की टिप्पणियाँ प्रकाशित होती थीं। यह पत्र राष्ट्रीय चेतना के उग्र आलेख प्रकाशित करने वाला एक ऐसा पत्र था, जो मात्र एक वर्ष ही चल पाया और अंग्रेज सरकार का कोपभाजन बनते हुए एक के बाद एक इसके आठ सम्पादकों को जेल जाना पड़ा था।

विद्यार्थी जी का इलाहाबाद प्रवास ज्यादा दिन नहीं रहा। उन्हें स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याओं के कारण कानपुर आना पड़ा। अतः शिक्षा और पत्रकारिता में व्यवधान पड़ा। कानपुर आकर छोटी-मोटी नौकरियाँ कीं, ट्यूशन पढ़ाए और पी0पी0एन0 हाईस्कूल में शिक्षण कार्य किया, पर कहीं भी उनका मन नहीं लगा। इन्हीं दिनो हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता के शिखर पुरुष आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी को ‘सरस्वती’ के लिए एक युवा, उत्साही सहयोगी की आवश्यकता थी, अतः मित्र काशीनाथ द्विवेदी के आग्रह पर 02 नवम्बर 1911 को वे ‘सरस्वती’ के सहायक सम्पादक नियुक्त हुए और शीघ्र ही आचार्य द्विवेदी के स्नेहभाजक बन गए। उनका पहला लेख ‘आत्मोसर्ग’ ‘सरस्वती’ में ही प्रकाशित हुआ था। यह विशुद्ध साहित्यिक पत्रिका थी, जबकि विद्यार्थी जी पत्रकारिता के माध्यम से ‘स्वातंत्र्य समर’ में भी अपना योगदान देना चाहते थे, अतः दिसम्बर 1912 में वे पं0 मदन मोहन मालवीय के अखबार ‘अभ्युदय’ में चले गए। यह पत्र घाटे में चल रहा था, पर विद्यार्थी जी मेहनत ओर उनकी विचारोत्तेजक टिप्पणियों की बदौलत उसकी पाठक संख्या बढ़ती चली गईऔर अखबार लोकप्रिय हो गया। यहाँ भी उन्होंने लगभग एक वर्ष योगदान दिया और स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याओं के कारण पुनः कानपुर आना पड़ा।

‘प्रताप’ की स्थापना

विद्यार्थी जी का सपना तो कुछ और ही था। उनका सपना एक ऐसे पत्र के प्रकाशन का था, जिसके माध्यम से जन-जन में स्वाधीनता की अलख जगाई जा सके और मानवता का कल्याण भी किया जा सके। इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए उन्होंने 9 नवम्बर 1913 को कानपुर से हिन्दी साप्ताहिक पत्र ’प्रताप’ का प्रकाशन प्रारम्भ किया। पीली कोठी नामक किराये के भवन में चार महानुभावों ने मिलकर ‘प्रताप’ की नींव रखी। सभी ने एक सौ रूपये का सहयोग किया। इस प्रकार कुल चार सौ रूपये की पूँजी से अखबार शुरु हुआ। सम्पादक गणेशशंकर विद्यार्थी, मैनेजर नारायण प्रसाद अरोड़ा, मुद्रक-प्रकाशक शिवनारायण मिश्र वैद्य और कोरोनेशन प्रेस के मालिक यशोदानन्दन।

आजादी के प्रतीक महापुरुष महाराणा प्रताप के नाम पर प्रकाशित इस पत्र का उद्देश्य भी स्पष्ट था- पूर्ण स्वराज्य। मुख पृष्ठ की उद्देश्यपरक काव्य पंक्तियाँ (मोटो-लाइने) थीं, ‘‘जिसको न निज गौरव तथा निज देश पर अभिमान है/वह नर नहीं, नर-पशु निरा है, और मृतक समान है।’’ ये पंक्तियाँ विद्यार्थी जी के अनुरोध पर आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने लिखी थीं। प्रवेशांक में ही विद्यार्थी जी ने ‘प्रताप की नीति’ शीर्षक से सम्पादकीय-अग्रलेख लिखा था, जिसमें इस पत्र के उद्देश्य पर तो प्रकाश पड़ता ही है, पत्रकारिता के आदर्शों और मूल्यों पर भी उनके मूल्यवान विचारों से हम अवगत होते हैं। ‘‘आज अपने हृदय में नयी-नयी आशाओं को धारण करके और अपने उद्देश्य पर पूर्ण विश्वास रखकर ‘प्रताप’ कर्म क्षेत्र में आता है। समस्त मानव जाति का कल्याण हमारा परमोद्देश्य है, और इस उद्देश्य की प्राप्ति का एक बहुत बड़ा और जरूरी साधन हम भारत वर्ष की उन्नति को समझते हैं। उन्नति से हमारा अभिप्राय देश की कृषि, व्यापार, विद्या, कला, वैभव, मान-बल, सदाचार और सच्चरित्रता की वृद्धि से है। भारत को इस उन्नतावस्था तक पहुँचाने के लिए असंख्य उद्योगों, कार्यों और क्रियाओं की आवश्यकता है। इसमें मुख्यतः राष्ट्रीय एकता, सुव्यवस्थित, सार्वजनिक और सर्वांगीण शिक्षा का प्रचार, प्रजा का हित, भला करने वाली सुप्रबन्ध और सुशासन की शुद्ध नीति का राज-कार्यों में प्रयोग, सामाजिक कुरीतियों और अत्याचारों का निवारण और अत्मावलम्बन और आत्मशासन में दृढ़ निष्ठा है। हम इन्हीं सिद्धान्तों और साधनों को अपनी लेखनी का लक्ष्य बनाएँगे।’’ विद्यार्थी जी ने पत्रकारिता के जिन मापदण्डों की उस समय स्थापना की थी, वे एक ज्योति-स्तम्भ के रूप में आज भी हमारा पथ प्रदर्शन करते हैं। उन्होंने लिखा था कि, ‘‘किसी की प्रशंसा या अप्रशंसा किसी की प्रसन्नता या अप्रसन्नता, किसी की घुड़की या धमकी हमें अपने मार्ग से विचलित न कर सकेगी। साम्प्रदायिक या व्यक्तिगत झगड़ों में ‘प्रताप’ सदा अलग रहने की कोशिश करेगा। उसका जन्म किसी सभा, संस्था, व्यक्ति या मत के पालन-पोषण, रक्षा तथा विरोध के लिए नहीं हुआ है, किन्तु उसका मत स्वातंत्र्य विचार और उसका धर्म सत्य होगा। हम जानते हैं कि इससे हमें बड़ी-बड़ी कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा, और इसके लिए बड़े भारी साहस और आलम्बन की आवश्यकता है।”

और यही हुआ। ‘प्रताप’ को आने वाले समय में बड़ी-बड़ी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। प्रारम्भिक कठिनाई तो यही हुई कि सोलह अंकों तक पत्र निरन्तर घाटे में चला। छपाई का भुगतान न होने के कारण यशोदानन्दन जी प्रेस से अलग हो गए। नारायण प्रसाद अरोड़ा अपना अलग अखबार निकालने लगे। बावजूद इसके बिना विचलित हुए शिवनारायण जी और विद्यार्थी जी अखबार निकालते रहे। काशीनाथ द्विवेदी , कमलापत सिंहानियाँ तथा सेठ राम गोपाल की मदद से न सिर्फ कर्ज चुकाया गया, वरन् खुद के प्रेस की व्यवस्था भी कर ली गई। यह पत्र अब कानपुर के फीलखाना से प्रकाशित होने लगा था

‘प्रताप’ के महाप्रताप की कहानी 

24 अप्रैल 1915 को रात के अँधेरे में प्रताप प्रेस, विद्यार्थी जी एवं शिवनारायण मिश्र के आवास पर पुलिस ने छापेमारी की। उन्हें जब कोई आपत्तिजनक सामग्री नहीं मिली तो ग्राहकों की सूची, सदस्यता संबंधी रजिस्टर तथा कुछ पुस्तकें उठा ले गई। इससे ग्राहकों में भय उत्पन्न हुआ, अनेक लोगों ने पत्र लेना बंद कर दिया, जिससे प्रताप प्रेस को घाटा उठाना पड़ा, पर विद्यार्थी जी विचलित नहीं हुए और दृढ़तापूर्वक पत्र निकालते रहे। उन्हीं दिनों 1916 ई0 में लक्ष्मण सिंह चौहान (सुभद्रा कुमारी चौहान के पति) का नाटक ‘कुलीप्रथा’ प्रताप प्रेस से प्रकाशित हुआ था, अंग्रेज सरकार ने इसे तुरन्त जब्त कर लिया, और एक हजार रूपये की जमानत माँगी। बचाव के सारे प्रयास विफल होने पर अन्ततः उक्त धनराशि जमा की गई।

28 से 31 दिसम्बर 1916 को लखनऊ में अखिल भारतीय काँग्रेस का खुला अधिवेशन आयोजित हुआ था, जिसमें महात्मा गाँधी की उपस्थिति रही। उसी दौरान 29 दिसम्बर 1916 को विद्यार्थी जी के संयोजन में आयोजित ‘अखिल भारतीय भाषा एवं लिपि सम्मेलन’ की अध्यक्षता भी गाँधी जी ने की तथा अपना महत्वपूर्ण उद्बोधन दिया। विद्यार्थी जी के आग्रह पर वे अधिवेशन के बाद कानपुर भी आये थे, जहाँ बालगंगाधर तिलक तथा मि0 पोलक के साथ वे प्रताप प्रेस में ही ठहरे थे।

अनेक विद्वानों का मानना है कि चम्पारण में नील की खेती करने को विवश पीड़ित, प्रताड़ित किसानों के प्रतिनिधि राजकुमार शुक्ल की भेंट गाँधी जी से कानपुर में विद्यार्थी जी ने ही कराई थी, फलस्वरूप चम्पारण आन्दोलन हुआ, जिसके माध्यम से भारत में सर्वप्रथम गाँधी जी के नायकत्व ने उभार पाया। इतना ही नहीं विद्यार्थी जी ने नील की खेती प्रकरण पर अंग्रेज जमींदारों के अत्याचारों के खिलाफ ‘प्रताप’ में निरन्तर तेज-तर्रार खबरें प्रकाशित कीं। उन्होंने वहाँ अपने संवाददाता भेजकर विस्तृत रपटें तैयार कराईं, जिससे अंग्रेज सरकार नाराज हो गई और अनेकशः ‘प्रताप’ प्रेस को नोटिस भेजकर कड़ी चेतावनी दी गई पर विद्यार्थी जी भला झुकने वाले कहाँ थे। वे निर्धन किसानों एवं कल-कारखानों में काम करने वाले मजदूरों की समस्याओं एवं उनकी दुरवस्था को न सिर्फ ‘प्रताप’ में प्रकाशित करते रहे; वरन् उन्हें संगठित करने के प्रयास भी किये। सन् 1916 से 1919 ई0 के दौरान कानपुर में पच्चीस हजार से अधिक मजदूरों के संगठन ‘मजदूर सभा’ का नेतृत्व किया तथा उनके पत्र ‘मजदूर’ के प्रकाशन में भी सहयोग किया। उनके द्वारा मजदूरों का नेतृत्व किये जाने से कानपुर का अंग्रेज मजिस्ट्रेट इतना नाराज था कि उसने प्रताप प्रेस के ट्रस्ट को मान्यता देने के लिए निर्धारित जमानत राशि एक हजार को मनमाने ढंग से बढ़ाकर दो हजार कर दिया था। उसकी दलील थी कि इस ट्रस्ट के एक सदस्य गणेश शंकर विद्यार्थी हैं, जिन्होंने मजदूरों को सरकार के खिलाफ भड़काने का कार्य किया है।

22 अप्रैल 1918 को ‘प्रताप’ में नानक सिंह ‘हमदम’ की क्रान्तिकारी कविता ‘सौदा-ए-वतन’ प्रकाशित करने पर ‘प्रताप’ पर राजद्रोह की कार्यवाही की गई और एक हजार रूपये की जमानत राशि जब्त कर ली गई। आर्थिक संकट के कारण उक्त राशि की व्यवस्था न हो सकी अतः लगभग एक महीने तक पत्र का प्रकाशन स्थगित रहा। 8 जुलाई 1915 के अंक में जब सरकार द्वारा ‘प्रताप’ के उत्पीड़न की खबरें प्रकाशित हुईं तो उसके पाठकों एवं व्यवसायियों ने आठ हजार रूपये का सहयोग भेजा। इससे विद्यार्थी जी में नई आशा एवं उत्साह का संचार हुआ। वे एक नैतिक आत्मबल सम्पन्न व्यक्ति थे। अतः एक ट्रस्ट का गठन कर उक्त धनराशि को उसके खाते में जमा कर दिया। इस ट्रस्ट में विद्यार्थी जी ने स्वयं और शिवनारायण मिश्र के अतिरिक्त मैथिलीशरण गुप्त, डाॅ0 जवाहर लाल रोहतगी तथा लाला फूलचंद को भी शामिल किया।

मुकदमों का दौर

23 नवम्बर 1920 को यह पत्र दैनिक हो गया था। जैसा कि प्रारम्भ से ही ‘प्रताप’ का उद्देश्य था कि वह न सिर्फ अंग्रेजों की निरंकुशता और उनकी लूट को उजागर कर रहा था वरन् देशी नरेशों, सामंतो, जमींदारों और भ्रष्ट अधिकारियों के द्वारा आम आदमी के उत्पीड़न, रिश्वत और भ्रष्टाचार को भी बेनकाब कर रहा था। इसी कड़ी में रायबरेली के जमींदार वीरपाल सिंह के अत्याचारों को भी इस पत्र ने प्रमुखता से छापा। जिसने गरीब किसानों पर गोली चलवाई थी। कारण, कुछ किसानों ने उसके द्वारा किये जा रहे अपने शोषण का विरोध किया था। इससे नाराज होकर उसने ‘प्रताप’ पर मानहानि का दावा ठोंक दिया। जैसा कि हम जानते हैं, उन दिनों अंग्रेज अधिकारी, न्यायाधिकारी और सामंतों, जमींदारों में एक प्रकार का गठजोड़ हुआ करता था।

न्यायपालिका अंग्रेज सरकार के इशारों पर नाचती थी, फलस्वरूप विद्यार्थी जी और शिवनारायण मिश्र पर दस-दस हजार रूपये की जमानत तथा पाँच-पाँच हजार रूपये का मुचलका, कुल पन्द्रह-पन्द्रह हजार रूपये जमा करने तथा छह-छह महीने की कैद की सजा सुनाई गई, जबकि इस केस में पं0 मोतीलाल नेहरु, जवाहर लाल नेहरु सहित लगभग पचास से अधिक राजनेताओं और अधिवक्ताओं ने पैरवी की थी। उस दौरान मुकदमों की पैरवी करने तथा जेल जाने के कारण ‘प्रताप’ का सम्पादन क्रमशः कृष्णदत्त पालीवाल, बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ तथा माखन लाल चतुर्वेदी ने बखूबी निभाया। इस मामले में विद्यार्थी जी को कानपुर और लखनऊ की जेलों में लगभग आठ महीने व्यतीत करने पड़े।

रायबरेली केस से ‘प्रताप’ अभी उबर नहीं पाया था कि 1926 ई0 में मैनपुरी मानहानि केस का सामना करना पड़ा। शिकोहाबाद के एक भ्रष्ट थानेदार की घूसखोरी की खबर छापने पर उसने भी मानहानि का मुकदमा कर दिया था। सम्पादक गणेशशंकर विद्यार्थी तथा उन दिनों के मुद्रक-प्रकाशक सुरेन्द्र शर्मा को यह मुकदमा लड़ना पड़ा और दोनों को चार-चार सौ रुपये का जुर्माना अथवा छह-छह महीने की सजा हुई। विद्यार्थी जी ने जुर्माना न देकर जेल जाने का सहर्ष निर्णय लिया लेकिन मैनपुरी-आगरा क्षेत्र के ‘प्रताप’ के पाठकों ने चैबीस घण्टे में ही उक्त धनराशि अदा करके उन्हें जेल से मुक्त करा लिया। बाद में हाईकोर्ट से वे बाइज्जत बरी हुए। कोर्ट ने जमानत राशि वापस करने का निर्णय सुनाया और दरोगा के खिलाफ जाँच की कार्यवाही का निर्णय भी।

‘प्रताप’ पर एक और मुकदमा सन् 1928 में नरसिंहपुर मानहानि केस भी चला। वहाँ के ढोंगी महन्त और उसके शिष्यों के पाखण्ड और भ्रष्ट कारनामों का भण्डाफोड़ ‘प्रताप’ ने किया था। बाद में उन पाखण्डियों ने और अधिक फँसने के डर से केस वापस ले लिया। पत्रकारिता और स्वातंत्र्य-आंदोलन के कारण विद्यार्थी जी को पाँच बार जेल की यात्रा करनी पड़ी थी।
‘प्रताप’ की लोकप्रियता अपने समय में चरम पर थी। यह एक ऐसा पत्र था जिसमें समाज के हर वर्ग के दुःख और उनकी तकलीफों को वाणी मिलती थी। उनसे संघर्ष करने की ताकत और अन्यायी, अत्याचारी का सशक्त प्रतिकार करने की सामर्थ्य भी। ‘प्रताप’ ने मजदूरों के हक में आवाज उठाने के साथ-साथ किसानों को संगठित करने के लिए भी समय-समय पर अभियान चलाया। सन् 1921 में प्रकाशित अवध के किसान आन्दोलन की खबरों की आँच इंग्लैण्ड की सरकार तक पहुँच गई थी, उसने लंदन स्थित भारतीय सचिवालय के माध्यम से भारत के तत्कालीन वायसराय से रिपोर्ट माँगी, जिससे संयुक्त प्रान्त का तत्कालीन गवर्नर हरकोर्ट बटलर चिंतित हो गया था।

‘प्रताप’ में समय-समय पर अनेक रियासतों के निरंकुश और अत्याचारी राजाओं, सामंतों के विरुद्ध भी विस्तृत खबरें, रपटें और आलेख प्रकाशित होते रहे, जिससे वे विद्यार्थी जी को अपना शत्रु समझने लगे थे। इन रियासतों में राजस्थान की बिजौलिया और भरतपुर तथा मध्यप्रदेश की ग्वालियर रियासतें प्रमुख थीं। नागपुर के झंडा सत्याग्रह की खबरें भी ‘प्रताप’ में प्रमुखता से प्रकाशित हुई थीं।

नया रुख , नया मोड़, क्रांतिकारियों का जोश और विद्यार्थी की शहादत 

प्रवेशांक के सोलह पृष्ठों से प्रारम्भ होने वाला यह पत्र सन् 1930 ई0 तक चालीस पृष्ठों का हो गया था। वार्षिक सदस्यता राशि स्थानीय पाठकों के लिए मात्र 3 रूपये तथा बाहरी पाठकों के लिए 3.50/- हुआ करती थी। ‘प्रताप’ के अनेक अविस्मरणीय विशेषांक भी प्रकाशित हुए। प्रकाशन के एक वर्ष पूरे होने पर सन् 1914 में उसका विशेषांक ‘राष्ट्रीय अंक’ शीर्षक से प्रकाशित हुआ था। तीसरी वर्षगाँठ पर एक और ‘राष्ट्रीय अंक’ प्रकाशित हुआ। पाँचवी वर्षगाँठ 1918 में ‘स्वराज्य’ शीर्षक से एक और महत्वपूर्ण विशेषांक प्रकाशित हुआ था, जिसमें अपने समय के शीर्षस्थ विचारकों, साहित्यकारों की राष्ट्रीय चेतना की रचनाएँ प्रकाशित हुई थीं।

प्रताप कार्यालय राष्ट्रवादियों और क्रान्तिकारियों के साथ साहित्यकारों का भी केन्द्र था। रामप्रसाद ‘विस्मिल’, अश्फाक उल्ला खाँ, ठा0 रोशन सिंह, चन्द्रशेखर आजाद, बटुकेश्वर दत्त, शिववर्मा तथा छैल बिहारी दीक्षित ‘कण्टक’ आदि का उन्होंने समय-समय पर सहयोग और मार्गदर्शन किया था। सरदार भगत सिंह तो अपनी फरारी के दिनों में वेश बदलकर प्रताप कार्यालय में रहे थे। उन्होंने बलवंत सिंह, छद्मनाम से ‘प्रताप’ में लेख भी लिखे। विद्यार्थी जी ने श्यामलाल गुप्त ‘पार्षद’ से झण्डागीत की रचना कराई थी, जो उन दिनों आजादी का तराना बन गया था।

हम जानते हैं कि विद्यार्थी जी की पत्रकारिता और लेखन का मूल उद्देश्य पूर्ण स्वराज्य और सुराज था, जिसकी वजह से उन्होंने ‘सरस्वती’ जैसी शीर्षस्थ साहित्यिक पत्रिका के सह सम्पादक के दायित्व को छोड़ दिया था, पर साहित्य के माध्यम से राष्ट्रीयता की अलख जगाना वे अच्छी तरह जानते थे। इसका श्रेय उन्हें ‘प्रभा’ पत्रिका के माध्यम से मिला। ‘प्रभा’ का प्रकाशन, सम्पादन 1913 ई0 में खण्डवा से विख्यात कवि, साहित्यकार, माखनलाल चतुर्वेदी ने प्रारम्भ किया था किन्तु अपरिहार्य कारणों से सन् 1916 ई0 में इसका प्रकाशन स्थगित हो गया तब विद्यार्थी जी ने आग्रह करके इसे प्रताप प्रेस से छापना प्रारम्भ किया। सन् 1920 से 1925 ई0 तक यह प्रताप प्रेस से प्रकाशित होती रही। यह मूलतः राजनीतिक, सामाजिक पत्रिका थी पर उसमें साहित्य की विविध विधाओं में विविध विषयों पर अपने समय के शीर्षस्थ साहित्यकारों की उच्चतम कोटि की रचनाएँ प्रकाशित होती थीं। उसमें प्रकाशित राष्ट्रीय चेतना की अनेक कविताएँ स्वातंत्र्य सेनानियों, क्रान्तिकारियों के कण्ठ का हार बनीं। माखनलाल चतुर्वेदी का प्रसिद्ध गीत ‘पुष्प की अभिलाषा’ सर्वप्रथम ‘प्रभा’ में ही प्रकाशित हुआ था। मुंशी प्रेमचंद, पं0 विश्वम्भरनाथ शर्मा ‘कौशिक’, अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’, मैथिलीशरण गुप्त, सियारामशरण गुप्त, आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’, निराला जी, सनेही जी, सम्पूर्णानन्द, चन्द्रशेखर शास्त्री, भगवतीप्रसाद वाजपेयी, इलाचंद्र जोशी, चतुरसेन शास्त्री, पाण्डेय बेचन शर्मा ‘उग्र’, रायकृष्णदास तथा चण्डी प्रसाद जैसे अनेक प्रसिद्ध साहित्यकार ‘प्रभा’ के नियमित लेखक थे। विद्यार्थी जी भी ‘एक बैठा-ठाला ग्रेजुएट’ छद्म नाम से ‘प्रभा’ में सामाजिक व्यंग लिखा करते थे। वे अन्य पत्रों में भी लगभग आधा दर्जन छद्म नामों से लिखा करते थे। विद्यार्थी जी के सान्निध्य और मार्गदर्शन में अनेक महानुभावों ने पत्रकारिता और सम्पादन की कला सीखी तथा कालान्तर में यश और कीर्ति पाई। इनमें बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’, कृष्यादत्र पालीवाल, दशरथ प्रसाद द्विवेदी, श्रीराम शर्मा, देवव्रत शास्त्री, रमाशंकर अवस्थी, सुरेश चन्द्र भट्टाचार्य, राम दुलारे त्रिवेदी, सुरेन्द्र शर्मा, श्रीनिवास बालाजी हार्डीकर, विष्णुदत्त शुक्ल तथा प्रकाश नारायण शिरोमणि के नाम प्रमुख हैं।

मात्र चालीस वर्ष की आयु पाने वाले विद्यार्थी जी जीते-जी किंवदन्ती बन गए थे। जिस आयु में आज के युवा अपने जीवन की दिशा नहीं तय कर पाते हैं, उन्होंने पूरे समाज और राष्ट्र की दिशा को तय करने का कार्य किया था। अहर्निश राष्ट्र सेवा को समर्पित एक ऐसा व्यक्ति जो पत्रकारिता, स्वातंत्र्य समर, समाज सेवा, सामाजिक, राजनीतिक संगठन और लेखन-सम्पादन में एक साथ सक्रिय रहा हो। इन सबके साथ जिसने कोर्ट-कचहरी और जेल जीवन का भी सहर्ष वरण किया हो, उसकी विलक्षण प्रतिभा, अदम्य साहस और अटूट लगन को दर्शाता है। सक्रिय राजनीति में रहते हुए वे भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष भी रहे थे, पर राजनीति के दाँव-पेंच और स्वार्थी राजनीतिज्ञों के मुखर आलोचक थे।

सामाजिक सद्भाव और साम्प्रदायिक एकता के लिए वे निरन्तर प्रयत्नशील रहे। इस हेतु उनकी लेखनी भी सक्रिय रही। यहाँ तक कि उनका बलिदान भी समाज को संदेश देकर गया। 23 मार्च 1931 को सरदार भगत सिंह तथा उनके साथियों को लाहौर षड़यंत्र के केस में फाँसी की सजा दी गई थी। 24 मार्च को कानपुर में अंग्रेजों द्वारा सुनियोजित दंगे भड़काए गए। उन्हीं दंगों में कानपुर के चौबेगोला स्थान पर विद्यार्थी जी ने अपनी आहुति दी। एक-दूसरे के खून के प्यासे हिन्दू-मुसलमान दंगाइयों को जैसे ही विद्यार्थी जी की शहादत के बारे में पता चला, वैसे ही दंगे रुक गए। दोनों ओर के दंगाइयों ने घोर प्रायश्चित किया। वस्तुतः वे दोनो वर्गों के मसीहा थे।
 
गणेश शंकर विद्यार्थी मूलतः पत्रकार थे पर पत्रिकाओं में प्रकाशित उनके अग्रलेख (सम्पादकीय लेख) अथवा लेख गम्भीर मनन-चिन्तन और भाषा-शैली के वैशिष्ट्य में साहित्यिक कोटि के हैं। वैसे तो ये हिन्दी में वैचारिक निबन्धों की कोटि में माने जाएँगे पर इनमें उनका व्यक्तित्व भी प्रतिबिम्बित है। उनका कोई भी लेखन निरुद्देश्य नहीं है। सभी किसी न किसी रूप में समाज में राष्ट्रीय या सामाजिक जागरण का मंत्र फूँकते हैं।

प्रताप प्रेस की जर्जर स्थिति एवं सामाजिक कोशिशें 

दुःख के साथ कहना पड़ रहा है कि प्रताप प्रेस के जिस  भवन ने सारे देश में वैचारिक , राजनीतिक क्रांति की अलख जगाई , वह आज अपनी बदहाली पर आँसू बहा रहा है । कानपुर के फीलखाना क्षेत्र में स्थित इस जर्जर इमारत को एक स्मारक के रूप में संरक्षित करने के लिये किसी भी सरकार ने पहल नहीं की, और न ही अभी तक इस हेतु कानपुर की सामाजिक संस्थाओं या राजनीतिक व्यक्तियों ने कोई गम्भीर पहल की ।

इस भवन तक बहुत मुश्किल से पहुँचा जा सकता है । अत्यंत जीर्ण-शीर्ण भवन में किराएदारों का कब्जा है , केवल एक कमरे में कुछ पुरानी मशीनें रखी हैं , जिस पर ताला लगा हुआ है और चावी का अता-पता नहीं ।

2012 में कानपुर के अनेक साहित्य-सेवियों और पत्रकारों ने ‘प्रताप शताब्दी समारोह समिति’ के माध्यम से पूरे एक वर्ष तक विद्यार्थी जी और ‘प्रताप’ की स्मृति में अनेक कार्यक्रम , संगोष्ठियाँ आदि आयोजित की थी । उस दौरान केंद्र और प्रदेश सरकार से अनेक माँगे भी की गई थीं । यथा – कानपुर में गणेश शंकर विद्यार्थी के नाम पर पत्रकारिता विश्वविद्यालय की स्थापना , उनके जन्मदिन या ‘प्रताप’ की स्थापना दिवस को राष्ट्रीय पत्रकारिता दिवस घोषित करना तथा प्रताप प्रेस एवं विद्यार्थी जी के शहादत स्थल चौबेगोला को स्मारक के रूप में संरक्षित करना आदि , पर सरकार की ओर से उस पर कोई भी सुनवाई नहीं हुई। इधर युवा लेखक मृदुल पाण्डेय ने ‘प्रताप प्रेस पुनरुत्थान समिति’ के माध्यम से उक्त भवन को स्मारक के रूप में विकसित करने का अभियान चलाया है।

एक सुखद उपलब्धि यह हुई कि इन पंक्तियों के लेखक के प्रयासों से छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय के एम०ए० (उत्तरार्द्ध) हिन्दी के तृतीय प्रश्नपत्र के पाठ्यक्रम में विद्यार्थी जी की पुस्तक ‘जेल – जीवन की झलक’ शामिल की गई है।

चित्रावली

श्रीमती इंदिरा गांधी द्वारा गणेश शंकर विद्यार्थी इंटर कॉलेज , पांडु नगर, कानपुर में विद्यार्थी प्रतिमा का अनावरण
      श्री लाल बहादुर शास्त्री श्रद्धांजली अर्पित करते हुए
पिताश्री मुंशी जयनारायण को अंतिम विदाई सिरहाने बैठे अग्रज शिवव्रत नारायण और गणेश जी
                                    गणेश दंपती
          पंडित जवाहर लाल नेहरू द्वारा चित्र पर माल्यार्पण
                        विद्यार्थी परिवार
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