Sunday, May 19, 2024

शंकराचार्य से बड़ा नारायण उपासक कोई नहीं : हरि शंकर अधिकारी

बुधवार को विक्रमाजीत सनातन धर्म कॉलेज, कानपुर में ‘भारत की एकता और एकात्मकता में जगद्गुरु श्री शंकराचार्य का योगदान’ विषय पर भारतीय भाषा समिति, शिक्षा मंत्रालय और विद्या भारती उच्च शिक्षा संस्थान के तत्वावधान में राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया।

कार्यक्रम में मुख्य अतिथि प्रो. हरि प्रसाद अधिकारी, विशिष्ट अतिथि डॉ॰ नवलता और प्रो. दिनेश चंद्र श्रीवास्तव जी ने अपना वक्तव्य दिया। प्रो. हरि प्रसाद अधिकारी जी ने कहा कि शंकराचार्य ने चारों मठों को स्थापित करके एक सूत्र में पिरोने का कार्य किया है। भारतीय संस्कृति एक है, उस संस्कृति को एक करने के लिए शंकराचार्य ने यात्रा की। साथ ही उन्होंने बताया कि भारत को एक सूत्र में बाँधकर व्यक्ति-समष्टि को एक सूत्र में बाँधा। विशिष्ट अतिथि डॉ॰ नवलता ने विषय को समझाते हुए एकता और एकात्मकता का अर्थ बताया और कहा कि भौतिक और राजनीतिक एकता का भाव तब तक एक नहीं हो सकता, जब तक एकात्मकता न हो। एकात्मकता तब होगी, जब उसमें आत्मीयता और अनुभूति जुड़ी होगी। प्रो. दिनेश चन्द्र श्रीवास्तव ने अपने वक्तव्य में शंकराचार्य के ग्रंथों को किसी देश-काल में बाधित न होने वाले ग्रंथ कहा। आगे वे चर्चा करते हैं कि शंकराचार्य ने टीका या भाष्य ग्रंथ, प्रकरण ग्रंथ और स्तोत्रों की रचना की। इसी प्रकार जयशंकर पाण्डेय जी ने भारतीय शिक्षा को पंचकोशी सिद्धान्त की पद्धति कहा और शंकराचार्य के आचरण को विद्यार्थियों द्वारा जीवन में धारण करने की बात कही।

कार्यक्रम के आरम्भिक पक्ष में प्राचार्य विपिन चन्द्र कौशिक ने आदि शंकराचार्य के द्वारा भारत को सांस्कृतिक सूत्र में बाँधने वाला कहकर कार्यक्रम को आगे बढ़ाया। कार्यक्रम का संचालन दीप्ति रंजन बिसारिया ने किया। डॉ॰ राकेश शुक्ल ने कार्यक्रम की रूपरेखा बतायी। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे डॉ॰ पंकज चतुर्वेदी ने शंकराचार्य के जीवन और उनके सिद्धान्तों पर क्रमबद्ध रूप से बात की साथ ही उन्होंने कहा कि शंकराचार्य ईश्वर की सत्ता को नहीं मानते थे, जब आप ईश्वर की सत्ता को मानेंगे तो आपको ईश्वर और जगत दोनों की सत्ता माननी पड़ेगी। शंकर केवल एक की सत्ता मानते थे और वह है – चेतना। उसी को उन्होंने ब्रह्म माना। ब्रह्म ही सत्य है। उनका एक सिद्धान्त मशहूर हुआ – ‘ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या’। कार्यक्रम में सभी प्रतिभागियों को भारतीय भाषा समिति की ओर से प्रमाणपत्र भी वितरित किए गए। इस कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग और अन्य विभागों के प्राध्यापक, शोधार्थी, स्नातकोत्तर एवं स्नातक के विद्यार्थीयों ने भी भाग लिया।

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