Thursday, April 3, 2025

शहादत स्थल से याद किए गए विद्यार्थी जी , 94वें बलिदान दिवस पर लोगों ने दी श्रद्धांजली

कानपुर । कानपुर इतिहास समिति द्वारा प्रताप पत्र के यशस्वी संपादक श्रद्वेय गणेश शंकर विद्यार्थी के 94वें बलिदान दिवस पर चौबेगोला स्थित बन्दूकेश्वर मन्दिर पर दीपदान कर श्रद्धांजलि दी गई। चौबेगोला का बन्दूकेश्वर हनुमान मन्दिर वह स्थान है जहाँ विद्यार्थी जी की का प्राणोत्सर्ग हुआ था। इस अवसर पर कानपुर इतिहास समिति के अनूप कुमार शुक्ल ने कहा कि भगत सिंह जी की फांसी के बाद जब कानपुर में दंगा हो गया तब शहर में साम्प्रदायिक सौहार्द एवं एकता को बनाए रखने का कार्य करते हुए गणेश शंकर विद्यार्थी जी का बलिदान इसी स्थान पर हुआ था। शांतनु चैतन्य जी ने कहा कि विद्यार्थी जी का प्रताप प्रेस और शहादत स्थल हमारा तीर्थ है इसे अक्षुण्य बनाये रखना को तत्पर हूँ प्रताप प्रेस को हेरिटेज बिल्डिंग घोषित करने की माँग लगातार की जा रही है।

हर्षित सिंह बैस ने कहा कि महात्मा गाँधी ने गणेश जी की मृत्यु पर लिखा कि वे भले मर गए, लेकिन उनकी आत्माहुति व्यर्थ नहीं गई। उनकी आत्मा मेरे दिल पर काम करती है। मुझे जब जी उनकी याद आती है तो उनसे ईर्ष्या होती है। इस देश में दूसरा गणेश शंकर विद्यार्थी क्यों नहीं पैदा होता है ? क्रान्ति कुमार कटियार ने कहा कि प्रताप प्रेस आजादी की लड़ाई में दोनों विचारधाराओ का केन्द्र था यहाँ चन्द्रशेखर आजाद, भगत सिंह, सुरेशचंद्र भट्टाचार्य सभी जुड़े थे हमारे पिता डॉ गयाप्रसाद जी भी प्रताप प्रेस से सम्बद्ध रहे।
प्रखर श्रीवास्तव ने कहा कि गणेश शंकर विद्यार्थी जी की जेल जीवन की डायरी एक दस्तावेज है जो विद्यार्थी जी की बेटी विमला विद्यार्थी और लेखक सुरेश सलिल के सौजन्य से आमजन तक आ सकी। आलोक श्रीवास्तव जी ने कहा कि विद्यार्थी जी कानपुर करेंसी में 6 फरवरी से 20 नवम्बर 1908 तक तीस रुपए माह पर नौकरी की कार्य के दौरान किताब पढ़ने पर अफसर की डांट पर सेवा से त्यागपत्र दे दिया था।

विनोद टंडन ने बताया कि गणेश जी अपने राजनैतिक जीवन में कौंसिल मेम्बर 1927 से 1929 तक रहे उन्होंने सदन में शहर के भी बहुत से मुद्दे उठाए थे। धर्म प्रकाश गुप्त ने कहा कि प्रताप पत्र द्वारा जनजागरण के साथ आजादी की लड़ाई भी लड़ी थी। प्रताप पत्र के कई अंक जब्त हुए प्रेस में छापेमारी भी हुई थी। कुणाल सिंह ने बताया कि कान्यकुब्ज स्कूल के हेडमास्टर मन्नीलाल अवस्थी के मुताबिक जब उन्हें डॉ जवाहरलाल रोहतगी से विद्यार्थी जी की शहादत ज्ञात हुई तो उन्होंने ही मुर्दाघर से विद्यार्थी जी के हाथ में गजेन्द्र अंकित शव को बड़ी मुश्किल से खोजा और भैरवघाट पर आर्य समाज पद्धति से अंत्येष्टि की थी।कार्यक्रम में अनूप शुक्ल, धर्म प्रकाश गुप्त, शांतनु चैतन्य,देव कबीर, बिनोद टंडन, विजय गुप्त, क्रान्तिकुमार कटियार,हर्षित सिंह,वैभव मिश्र, कृपेश जी, कुणाल सिंह वंश चौरसिया आदि उपस्थित रहे।

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