– प्रखर श्रीवास्तव
पुस्तक :- रामनारायण आज़ाद
पृष्ठ संख्या :- 110
रुपए :- 300 ₹
प्रकाशक :- प्रवासी प्रेम पब्लिशिंग
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में एक ऐसे क्रांतिकारी व्यक्तित्व को केंद्र में लाती है, जिसकी भूमिका क्षेत्रीय स्तर पर अत्यंत प्रभावशाली रही, किंतु राष्ट्रीय इतिहास-लेखन में अपेक्षित स्थान अब तक नहीं पा सकी। यह कृति न केवल एक वीर शहीद की जीवनगाथा है, बल्कि स्वतंत्रता आंदोलन की उस जमीनी संरचना का सशक्त दस्तावेज़ भी है, जिसके बिना आज़ादी की व्यापक लड़ाई की कल्पना अधूरी रह जाती है।
लेखक भूपेंद्र प्रताप सिंह ने इस पुस्तक के माध्यम से यह स्पष्ट किया है कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम केवल बड़े नेताओं, महानगरों और अखिल भारतीय आंदोलनों तक सीमित नहीं था। उसकी वास्तविक शक्ति छोटे नगरों, कस्बों और गांवों में सक्रिय उन असंख्य क्रांतिकारियों में निहित थी, जिन्होंने बिना किसी यश, पद या पहचान की अपेक्षा के अपना सर्वस्व राष्ट्र को समर्पित कर दिया। पंडित रामनारायण आज़ाद इसी परंपरा के प्रतिनिधि नायक के रूप में सामने आते हैं।
पुस्तक का आरंभिक भाग पाठक को फर्रुखाबाद की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और सामाजिक पृष्ठभूमि से परिचित कराता है। गंगा तट, विश्रांत घाट, मंदिर, अखाड़े और स्थानीय जनजीवन का चित्रण केवल भौगोलिक विवरण नहीं है, बल्कि यह दिखाता है कि किस प्रकार धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक संस्थाएँ राष्ट्रवादी चेतना के प्रसार का माध्यम बनीं। लेखक यह स्थापित करने में सफल रहते हैं कि स्वतंत्रता संग्राम केवल राजनीतिक गतिविधि नहीं था, बल्कि वह समाज के हर स्तर पर व्याप्त एक सांस्कृतिक आंदोलन भी था।
पंडित रामनारायण आज़ाद के बाल्यकाल और पारिवारिक संस्कारों का वर्णन इस पुस्तक का एक अत्यंत प्रभावशाली पक्ष है। माता-पिता से प्राप्त देशभक्ति, धार्मिक अनुशासन, शारीरिक प्रशिक्षण और अन्याय के प्रति विद्रोह—इन सभी तत्वों ने उनके व्यक्तित्व को गढ़ा। लेखक ने यह दर्शाया है कि क्रांतिकारी चेतना अचानक नहीं जन्म लेती, बल्कि वह निरंतर अनुभवों, कथाओं और सामाजिक वातावरण से विकसित होती है।
कृति का मध्य भाग स्वतंत्रता संग्राम की ऐतिहासिक घटनाओं को पंडित रामनारायण आज़ाद के व्यक्तिगत जीवन से जोड़ता है। प्रथम विश्व युद्ध, अंग्रेज़ी शासन की दमनकारी नीतियाँ, रोलैट एक्ट, जलियांवाला बाग जैसी घटनाएँ केवल ऐतिहासिक संदर्भ नहीं रह जातीं, बल्कि वे आज़ाद के भीतर उभरते विद्रोह और संगठनात्मक सक्रियता की पृष्ठभूमि बन जाती हैं। लेखक का यह दृष्टिकोण पुस्तक को जीवंत बनाता है और इतिहास को मानवीय रूप प्रदान करता है।
विशेष उल्लेखनीय यह है कि पुस्तक गांधीवादी आंदोलनों और क्रांतिकारी गतिविधियों के बीच संतुलित दृष्टि अपनाती है। लेखक किसी एक धारा को श्रेष्ठ सिद्ध करने का प्रयास नहीं करते, बल्कि यह स्पष्ट करते हैं कि स्वतंत्रता संग्राम की सफलता इन दोनों प्रवृत्तियों के सम्मिलित प्रभाव का परिणाम थी। पंडित रामनारायण आज़ाद का व्यक्तित्व इसी समन्वय का प्रतीक बनकर उभरता है—जहाँ अहिंसक आंदोलनों के प्रति सम्मान है, वहीं सशस्त्र प्रतिरोध की आवश्यकता का भी बोध है।
पुस्तक में वर्णित फर्रुखाबाद कोतवाली की घटना, क्रांतिकारी गतिविधियाँ, गिरफ़्तारियाँ और जेल जीवन—ये सभी प्रसंग लेखक की कथात्मक क्षमता को उजागर करते हैं। ये विवरण पाठक को केवल जानकारी नहीं देते, बल्कि उस समय के भय, साहस, त्याग और संघर्ष को अनुभव करने का अवसर भी प्रदान करते हैं। जेल जीवन का चित्रण यह दर्शाता है कि स्वतंत्रता सेनानी केवल बाहर ही नहीं, बल्कि कारागार के भीतर भी आंदोलन की चेतना को जीवित रखते थे।
भावनात्मक दृष्टि से यह पुस्तक गहरी छाप छोड़ती है। पंडित रामनारायण आज़ाद का जीवन जिस निष्ठा, निर्भीकता और त्याग से परिपूर्ण था, उसका चरम बिंदु उनका बलिदान है। लेखक ने इस प्रसंग को किसी अतिरंजना के बिना, अत्यंत गरिमा और संवेदना के साथ प्रस्तुत किया है। उनका यह विश्वास कि उनका जीवन राष्ट्र के लिए सार्थक रहा, पुस्तक को वैचारिक ऊँचाई प्रदान करता है। परिशिष्ट और संदर्भ सामग्री इस कृति को और अधिक मूल्यवान बनाती है। अन्य स्वतंत्रता सेनानियों का उल्लेख, दस्तावेज़ी साक्ष्य और पारिवारिक योगदान का विवरण पुस्तक को केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि ऐतिहासिक रूप से भी विश्वसनीय बनाता है। यह शोधार्थियों और इतिहास के विद्यार्थियों के लिए विशेष उपयोगी सिद्ध होती है।
समग्र रूप से “अग्नि गाथा के नायक : शहीद रामनारायण आज़ाद” एक ऐसी कृति है, जो इतिहास, साहित्य और राष्ट्रबोध—तीनों को एक साथ समेटे हुए है। यह कृति निस्संदेह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के साहित्य में एक महत्त्वपूर्ण, आवश्यक और स्थायी योगदान के रूप में स्थापित होती है।




