– प्रखर श्रीवास्तव
शंकर दयाल तिवारी जी की दृष्टि में कार्ल मार्क्स का जीवन और दर्शन बेहद रोचक और आप पाठकों के लिए बेहद आसान प्रतीत होता है| ये पुस्तक वास्तव में विचार और संघर्ष की युगांतकारी गाथा है| इतिहास के पन्नों पर ऐसे विचारक बहुत कम हुए हैं जिन्होंने ना केवल अपने दौर के समाज को झकझोरा, बल्कि आने वाली सदियों के लिए पूरे विश्व की राजनीति, अर्थशास्त्र को बड़े पैमाने पर प्रभावित किया हो| इसी सिलसिले में कार्ल मार्क्स सबसे ऊंचे शिखर पर खड़े नजर आते हैं।
लेखक शंकर दयाल तिवारी की रची पुस्तक “कार्ल मार्क्स: जीवन परिचय” इस दार्शनिक के जीवन के उतार-चढ़ावों, उनके बौद्धिक विकास और उनके संसार बदल देने वाले सिद्धांतों को बहुत ही सहज और संवेदनशील तरीके से दर्शाती है। पुस्तक मार्क्स को किसी नीरस, किताबी सिद्धांतकार के रूप में खड़ा करने की जगह एक ऐसे मनुष्य के रूप में पेश करती है जो बेहद संवेदनशील, भावुक, साथी, पिता और एक सच्चा क्रांतिकारी था।
पुस्तक के शुरुआती हिस्सों में जब हम मार्क्स के बचपन की गलियों में दाखिल होते हैं, तो लेखक हमें 1818 के उस त्रेयर नगर (जर्मनी) में ले जाते हैं जहाँ उनका जन्म एक संपन्न यहूदी-ईसाई परिवार में हुआ था। उनके पिता हेनरिक मार्क्स एक कानूनविद थे और माँ हेनरियेट उन्हें बहुत प्यार करती थीं। इस शुरुआती दौर की सबसे खूबसूरत बात जो लेखक ने उभारी है, वह है मार्क्स के बचपन का वह जज्बा जिसमें उन्होंने 17 साल की उम्र में लिखा था कि मनुष्य को ऐसा पेशा चुनना चाहिए जिसमें वह सबसे ज्यादा लोगों का कल्याण कर सके। यहीं से उनके भीतर के उस मार्क्स का जन्म होने लगता है जो आगे चलकर पूरी दुनिया के दबे-कुचले मजदूरों की आवाज बनने वाला था। जब मार्क्स बॉन और बर्लिन विश्वविद्यालय पहुँचे, तो कानून की पढ़ाई उन्हें थोड़ी नीरस लगी और उनका झुकाव दर्शन (फिलॉसफी) की तरफ बढ़ गया। यहाँ उनका सामना हेगेलियन दर्शन से हुआ।
लेखक ने बेहद आसानी से समझाया है कि कैसे मार्क्स ने हेगेल के ‘द्वंद्ववाद’ को तो स्वीकार किया लेकिन उनके इस विचार को खारिज कर दिया कि सब कुछ केवल विचारों या भावों से चलता है। इस पुस्तक का सबसे बेहतरीन और रोमांचक हिस्सा वह है जब मार्क्स एक पत्रकार के रूप में सामने आते हैं। ‘राइनिश जाईटुंग’ अखबार के संपादक के रूप में उन्होंने जब सरकारी सेंसरशिप और गरीब किसानों की लकड़ी चोरी के कानून के खिलाफ लिखना शुरू किया, तो उनकी कलम की ताकत से सरकार कांप उठी।
मार्क्स के बचपन के दोस्तों और उनके बीच का प्रेम इस पुस्तक को बेहद आत्मीय बनाता है। जैसे की फ्रेडरिक एंगेल्स के साथ उनकी दोस्ती को लेखक ने विश्व-इतिहास की सबसे खूबसूरत दोस्ती के रूप में पेश किया है। एंगेल्स ने न केवल मार्क्स को आर्थिक रूप से सहारा दिया बल्कि ‘कम्युनिस्ट घोषणापत्र’ से लेकर ‘दास कैपिटल’ तक के सृजन में बराबर के साथी रहे।
लेखक ने इस पुस्तक में मार्क्स के सिद्धांतों जैसे ‘अतिरिक्त मूल्य का सिद्धांत’ (Surplus Value) और ‘वर्ग संघर्ष’ (Class Struggle), बेहद आसान भाषा में समझाया है जो किसी भी आम पाठक के लिए समझना बेहद आसान हो जाता है।
पुस्तक के पूर्व में प्रकाशित हो चुकने और नए संस्करण में संभवत: मूल सामग्री से छेड़-छाड़ ना करने के उद्देश्य से आज के डिजिटल युग, ग्लोबल मार्केट और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के दौर में मार्क्स के विचारों की क्या प्रासंगिकता है, इस पर विचार – विश्लेषण ना होना स्वाभाविक है मगर लेखक कई जगह पर मार्क्स के प्रति इतने आदर-भाव से भर गए हैं कि उनका नजरिया थोड़ा अति-प्रशंसामय प्रतीत होता है। शायद इसलिए ही पुस्तक में मार्क्स के सिद्धांतों पर उठने वाले सवालों या उनके व्यावहारिक प्रयोगों (जैसे सोवियत संघ या अन्य देशों में हुई गलतियों) पर कोई गहरी आलोचना नहीं मिलती।
श्री शंकर दयाल तिवारी की यह पुस्तक हिंदी जगत के लिए एक अनमोल तोहफा है। यह पुस्तक हमें उस कार्ल मार्क्स से मिलवाती है जो केवल एक दार्शनिक नहीं, बल्कि एक सच्चा मनुष्य था जिसने गरीबी और दुखों के तूफान के बीच भी अपना सिर नहीं झुकाया। अंततः, यह पुस्तक उन सभी के लिए पढ़नी बेहद जरूरी है जो सामाजिक बराबरी, शोषण के खिलाफ संघर्ष और एक बेहतर दुनिया का सपना देखते हैं। यह मार्क्स के व्यक्तित्व और उनके क्रांतिकारी विचारों को समझने के लिए एक बेहद प्रभावशाली और प्रेरणादायक दस्तावेज है।
समाजशास्त्र और अर्थशास्त्र सम्बंधित गंभीर सामग्री से दूर लेखक ने काफी हद तक चीजों का सरलीकरण कर दिया है। भाषा का प्रवाह और कहानी कहने का ढंग पाठक को अंतिम पृष्ठ तक की यात्रा करने को मजबूर कर देता है|
अंतिम पन्नों पर दर्ज पुस्तक लेखक के फिल्मकार पुत्र अतुल तिवारी जी के शब्द ना सिर्फ लेखक परिचय है बल्कि पिता – पुत्र के न्यूनतम मगर गहरे और जीवंत संबंधों की एक दिलचस्प दास्ताँ है|वे अभिव्यक्त करते हैं कि जेल में साहित्य सृजन करने व वजन बढ़ाने और पार्टी के कार्यों के इलावा कलकत्ते के मजदूरों से मिली मल्टीटासिकिंग की सीख को घर के लिए बचे वक़्त में अमल में लाने वाले शंकर दयाल जी के अकर्मट जीवन में एक वक़्त ऐसा भी था जब वे अपने डॉक्टर पिता के साथ 11 सौ किलोमीटर का लम्बा सफर तय कर कलकत्ता से उन्नाव आ गए थे|
आलेख ‘मेरे पापा’ के इस रुख से प्रकाश मिलता है कि कैसे 37 वर्ष में अपने बाल सफ़ेद कर चुका संघर्षशील युवक 23 वर्षीय डॉक्टर से सफल रूप से परिणय सूत्र में बंध जाता है और कैसे एक नाबालिक बेटा, पिता की गुमशुदगी के दौरान हथकड़ी पहन लेता है और पुलिस की हत्या करने के ख्याल को पिता के निर्देशानुसार इमरजेंसी विरोध में बदल लेता है| ऐसे तमाम सवालों के जवाबों से लेखक द्वारा मार्क्स जैसे विचारक को अपना विषय बनाने के ना सिर्फ कारण स्पष्ट होते हैं बल्कि लेखक की मौलिकता और इंसानियत के मर्म से उसके पारिवारिक परिवेश से पाठक और लेखक का सम्बंध भी मजबूत होता है|
अत: पुस्तक के अंतिम आलेख के रूप में दर्ज शीर्षक “मेरे पापा” में लेखक के जीवन की अंतिम साँसों के साथ लगे पूर्ण विराम को विस्तार मिलता है मानो जैसे लेखक परिचय और श्रद्धांजलि एक साथ लिपिबद्ध कर दी गई हो, मगर ये ना सिर्फ एक पुत्र के अपने पिता के प्रति जस्बात थे बल्कि पिता के विस्तृत जीवन को ( मार्क्स जीवन परिचय ) के साथ चंद पन्नों में पूर्णता के साथ सामने रख देने की ज़िद भी… किसी भी पुस्तक का इतना संतोषकारी अंत होना वर्तमान समय में कम देखने को मिलता है|




