Friday, April 4, 2025

कौन थीं कृष्ण भगवान कि कुलदेवी, मथुरा स्थिति जिनके मंदिर में पूर्ण होती है मनचाहे विवाह की मनोकामना

भगवान श्री कृष्ण की नगरी वृंदावन, जहाँ भगवान ने अपनी बाल लीलाएं कीं। उसी नगरी में देवी के 51 शक्तिपीठों में से एक कात्यानी पीठ स्थित है। इस मंदिर का नाम प्राचीन शक्ति सिद्ध पीठ में आता है। माँ कात्यायनी ऋषि कात्यायन की पुत्री थी महिषासुर के मचाए हाहाकार से तीनों लोग त्रस्त थे जगत के कल्याण के लिए ऋषि कात्यायन घोर तपस्या करने लगे ऋषि कात्यायन ने मां कात्यायनी को नवरात्रि के छटे दिन पर पुत्री रूप में प्राप्त किया था|

सप्तमी, अष्टमी और नवमी की तिथि पर ऋषि ने माँ की पूजा अर्चना की सिंह की सवारी करने वाली इस देवी ने दशमी पर महिषासुर का वध करके सारे ब्रह्मांड को भयमुक्त कर दिया था|
इसलिए माँ का एक नाम महिषासुर मर्दिनी पड़ा श्रीमद् भागवत महापुराण के दशम स्कंद के 22वें अध्याय के अनुसार राधा तथा वृंदावन की गोपियाँ जो श्री कृष्ण से अनन्य प्रेम करती थी और उन्हें पति रूप में पाना चाहती थी वृंदावन के यमुना तट पर माँ कात्यायनी का शक्ति पीठ स्थापित है इन्हे श्री कृष्ण की कुलदेवी भी माना जाता है, ये वही जगह है जहाँ माँ सती के केश गिरे थे| जिसका प्रमाण भी शास्त्रों में मिलता है।

श्री वेदव्यास जी ने श्रीमद् भागवत के दशम स्कंध के 22 में अध्याय में उल्लेख किया है –
कात्यायनी महामाये महायोगिन्यधीश्वरि।
नंदगोपसुतं देवी पतिं में कुरु ते नमः।
अर्थात् हे कात्यायनी! हे महामाये! हे महायोगिनी! हे अधीश्वरी! हे देवी! नंदगोप के पुत्र हमें पति के रूप में प्राप्त हो। हम आपकी अर्चना एवं वंदन करते हैं।
पौराणिक संदर्भ में माँ कात्यायनी देवी
‘कात्यायनी’ अमरकोष में पार्वती के लिए दूसरा नाम है, संस्कृत शब्दकोश में उमा, कात्यायनी, गौरी, काली, हेेमावती व ईश्वरी इन्हीं के अन्य नाम हैं। शक्तिवाद में उन्हें शक्ति या दुर्गा, जिसमे भद्रकाली और चंडिका भी शामिल है|

यजुर्वेद के तैत्तिरीय आरण्यक में उनका उल्लेख है। स्कन्द पुराण में उल्लेख है कि वे परमेश्वर के नैसर्गिक क्रोध से उत्पन्न हुई थीं , जिन्होंने देवी पार्वती द्वारा दी गई सिंह पर आरूढ़ होकर महिषासुर का वध किया।
वे शक्ति की आदि रूपा है, जिसका उल्लेख पाणिनि पर पतञ्जलि के महाभाष्य में किया गया है, जो दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व में रचित है। उनका वर्णन देवीभागवत पुराण, और मार्कंडेय ऋषि द्वारा रचित मार्कंडेय पुराण के देवी महात्म्य में किया गया है जिसे ४०० से ५०० ईसा में लिपिबद्ध किया गया था।

बौद्ध और जैन ग्रंथों और कई तांत्रिक ग्रंथों, विशेष रूप से कालिका पुराण (१० वीं शताब्दी) में उनका उल्लेख है, जिसमें उद्यान या उड़ीसा में देवी कात्यायनी और भगवान जगन्नाथ का स्थान बताया गया है|

कात्यायनी मंदिर के प्रबंधक राजेंद्र कुमार शर्मा जी ने बताया कि वर्ष 1923 में माँ कात्यायनी पीठ मंदिर का निर्माण एवं पुनरुद्वार स्वामी केशवानंद ने कराया था। प्रबंधक राजेंद्र कुमार जी ने स्थापित मूर्ति का वर्णन करते हुए बताया कि माता की दस भुजाएं नाना प्रकार केअस्त्र-शास्त्रो से सुसज्जित हैं, उनके सिर पर हमेशा मुकुट सुशोभित रहता है। अपने भक्तों पर सदा कृपा बरसाती हुई वह वर मुद्रा धारण किए रहती हैं। मां के बाएं हाथ में कमल और तलवार है। जबकि दाहिने हाथ में स्वास्तिक और आशीर्वाद मुद्रा है। माँ सिंह की सवारी करती हैं। माँ कात्यायनी को योग और तंत्र में छठे आज्ञा चक्र या तीसरे नेत्र चक्र से जोड़ा गया है माँ कात्यायनी अमोघ फलदायिनी हैं। इनका स्वरूप अत्यंत ही भव्य है। इनका रंग स्वर्ण के समान चमकीला और भास्कर है। यह अपने भक्तों पर सदा ममता और प्रेम बरसाती रहती हैं|

शक्तिपीठ के समक्ष आज जो प्रतिमा स्थित है ऐसा माना जाता है यह वही प्रतिमा है जो श्री कृष्ण ने कंस के वध करने से पहले बनाई थी मूर्ति बनाकर श्री कृष्ण ने माँ का आशीर्वाद लिया और मथुरा के लिए निकल गए थे|
माँ कात्यायनी, माँ दुर्गा का छठा स्वरूप हैं। नवरात्रि के छठे दिन उनकी पूजा की जाती है। नवरात्रि के अवसर पर यहाँ मेले का भी आयोजन होता है|

माना जाता है कि इस मंदिर में जो अविवाहित स्त्री पुरुष आस्था से माँ कात्यायनी की आराधना करते है उनका विवाह एक वर्ष के अंदर हो जाता है|

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