Thursday, July 2, 2026

CSJMU, कानपुर द्वारा बना ‘जागरूकता पैमाना’ शोध की वैश्विक पहचान को देगा नई दिशा

कानपुर। छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय (CSJMU), कानपुर के शिक्षा विभाग ने शोध के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। शिक्षा विभाग के सहायक प्रोफेसर डॉ. विमल सिंह ने ‘ग्लोबल रिसर्च-ओरिएंटेड यूटिलिटी प्लेटफॉर्म्स (GROUP) अवेयरनेस स्केल’ नामक एक मानकीकृत पैमाना विकसित किया है। यह पैमाना यह जानने के लिए बनाया गया है कि भारतीय शोधार्थी दुनिया भर के ऑनलाइन शोध-मंचों (जैसे रिसर्चगेट, गूगल स्कॉलर, स्कोपस, आदि) के बारे में कितना जानते हैं और उनका कितना उपयोग करते हैं।

इस पैमाने की क्या जरूरत है ?
आज के डिजिटल युग में इंटरनेट ने शोध की दुनिया को बहुत बदल दिया है। अब शोधार्थी अपने काम को दुनिया के किसी भी कोने में बैठे लोगों के साथ साझा कर सकते हैं। रिसर्चगेट, एकेडेमिया, गूगल स्कॉलर, वेब ऑफ साइंस और स्कोपस जैसे मंच शोधकर्ताओं को अपने पेपर, डेटा और विचारों का आदान-प्रदान करने का बेहतरीन अवसर देते हैं लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या हमारे देश के पोस्ट ग्रेजुएट और पीएचडी छात्र इन मंचों के बारे में जानते हैं ? क्या वे इनका सही तरीके से इस्तेमाल कर पा रहे हैं ? और क्या वे इन्हें अपने शोध के लिए उपयोगी मानते हैं ? इसी पैमाने के माध्यम से इन सवालों के जवाब तलाशे जाएंगे। डॉ. विमल सिंह के अनुसार, “मानव की आवश्यकताओं को समझना ही उन्हें पूरा करने का आधा काम है, और शोध इस समझ का वैज्ञानिक माध्यम है।”

कैसे काम करता है यह पैमाना ?
इस स्केल को ‘OUR’ दृष्टिकोण पर आधारित किया गया है, जिसमें तीन मुख्य आयाम हैं:

1. ओरिएंटेशन (O) – यानी जानकारी और परिचय। इसके तहत यह देखा जाता है कि शोधार्थी को इन मंचों के बारे में कितनी जानकारी है और क्या वह इनसे परिचित है।
2. यूटिलिटी (U) – यानी उपयोगिता और व्यावहारिक अनुभव। इसमें यह जाना जाता है कि क्या वह इन मंचों पर शोध खोजता है, क्या वह अपने पेपर अपलोड करता है, और क्या उसे इनके इस्तेमाल का अनुभव है।
3. रिलेवेंस (R) – यानी महत्व और प्रासंगिकता। इस आयाम से यह पता चलता है कि शोधार्थी इन मंचों को अपने काम के लिए कितना महत्वपूर्ण मानता है।

इस तरह यह पैमाना सिर्फ जानकारी नहीं, बल्कि उस जानकारी के इस्तेमाल और उसकी अहमियत को भी एक साथ मापता है।

कैसे बनाया गया यह पैमाना ?
इस पैमाने को बनाने की पूरी प्रक्रिया बहुत ही वैज्ञानिक और सावधानीपूर्वक की गई है। सबसे पहले 56 प्रश्नों (items) का एक बड़ा संग्रह तैयार किया गया। फिर इन प्रश्नों को विशेषज्ञों के एक दल को दिखाया गया। विशेषज्ञों की राय और सांख्यिकीय विश्लेषण के बाद कुछ प्रश्नों को हटा दिया गया और बाकी में भाषाई सुधार किए गए। इस प्रकार 56 प्रश्नों को घटाकर 31 कर दिया गया। इसके बाद, इस पैमाने को उत्तर प्रदेश के 800 पोस्ट ग्रेजुएट और पीएचडी छात्रों पर लागू किया गया। यह नमूना काफी बड़ा था, जिससे परिणाम भरोसेमंद बने।

पैमाने की विश्वसनीयता 
जांच के नतीजे बताते हैं कि यह पैमाना अत्यंत विश्वसनीय (reliable) और मान्य (valid) है। वैज्ञानिक शब्दों में कहें तो, इसके तीनों आयामों (ओरिएंटेशन, यूटिलिटी और रिलेवेंस) की विश्वसनीयता का स्कोर 0.70 से काफी ऊपर निकला, जो किसी भी अच्छे पैमाने के लिए जरूरी माना जाता है। खास बात यह है कि प्रश्नों की सामग्री (content validity) को भी सही पाया गया, यानी प्रश्न अपने विषय से संबंधित हैं और सही माप रहे हैं। इसलिए कहा जा सकता है कि यह पैमाना शोधार्थियों की जागरूकता को सही रूप से मापने में समर्थ है।

इस पैमाने में कुल 31 प्रश्न हैं और अधिकतम अंक 155 तथा न्यूनतम अंक 31 हैं। इस आधार पर शोधार्थियों को पाँच स्तरों में बाँटा गया है:

· 76 अंक से कम: बहुत निम्न स्तर – यानी शोधार्थी को इन मंचों के बारे में बहुत कम जानकारी है।
· 77 से 92 अंक: निम्न स्तर – बुनियादी समझ तो है, लेकिन पर्याप्त नहीं है।
· 93 से 104 अंक: मध्यम स्तर – औसत जागरूकता, लेकिन अभी और सुधार की गुंजाइश है।
· 105 से 122 अंक: उच्च स्तर – अच्छी जागरूकता और सही उपयोग करने वाले शोधार्थी।
· 122 अंक से अधिक: बहुत उच्च स्तर – उत्कृष्ट जागरूकता और वैश्विक शोध मंचों का बेहतर उपयोग करने वाले शोधार्थी।

इस वर्गीकरण से कोई भी विश्वविद्यालय या शोध संस्थान आसानी से पता लगा सकता है कि उनके यहाँ के शोधार्थी किस स्तर पर हैं और उन्हें किस प्रकार का अतिरिक्त प्रशिक्षण देने की आवश्यकता है।

यह पैमाना CSJMU, कानपुर के शिक्षा विभाग के लिए एक बड़ी उपलब्धि है। कुलपति प्रो. विनय कुमार पाठक के नेतृत्व में विश्वविद्यालय शोध को बढ़ावा देने के लिए लगातार नई योजनाएँ लागू कर रहा है। डॉ. विमल सिंह ने इस पैमाने को इस तरह डिजाइन किया है कि यह भारतीय शोधार्थियों को आईना दिखाएगा कि वे वैश्विक शोध समुदाय में कहाँ खड़े हैं। इससे न सिर्फ शोधार्थियों को अपनी कमियाँ सुधारने में मदद मिलेगी, बल्कि उनके शोध कार्य की गुणवत्ता और दुनिया में पहचान भी बढ़ेगी। यह ‘वसुधैव कुटुंबकम’ की भावना को शोध के क्षेत्र में साकार करने की दिशा में एक ठोस कदम है। यह पैमाना ‘मानस साइको होम’ (नई दिल्ली) द्वारा प्रकाशित किया गया है और शिक्षा क्षेत्र में काम करने वालों के लिए एक महत्वपूर्ण संदर्भ सामग्री बनेगा।

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