दिनांक 26 अप्रैल, 2026 रविवार, शाम 6 बजे से कानपुर के खलासी लाइन स्थित शास्त्री भवन में साहित्यिक पत्रिका अकार, ख़ुसरो-कबीर फाउंडेशन और लोक सेवा मंडल के सहयोग से ‘दास्तान-ए-अशफ़ाक़ुल्लाह’ (शहादत के सौ बरस) नाम से दास्तानगोई की एक शाम का आयोजन किया गया.
दास्तान के लेखक वरिष्ठ संस्कृतिकर्मी, समीक्षक, अनुवादक एवं स्तम्भकार और त्रैमासिक पत्रिका तज़किरा के मुख्य सम्पादक श्री असग़र मेहदी उपस्थित रहे, तो वहीं दास्तान की प्रस्तुति लखनऊ से आए मशहूर किस्सागो शहज़ाद मेहदी व फ़रज़ाना मेहदी ने की.
‘दास्तान-ए-अशफ़ाक़ुल्लाह’ काकोरी के शहीदों के बलिदान और देशप्रेम की अमर कहानी है| आज़ादी के संघर्ष में कोकोरी की घटना को कभी भुलाया नहीं जा सकता| यह एक ऐसा अध्याय है जो दिलेरी, जज़्बे और आज़ादी के प्रति पूर्ण समर्पण की उन कहानियों को खुद में समेटे है, जिन पर आज इस देश के हर व्यक्ति को गर्व है. काकोरी की घटना 9 अगस्त 1925 को हुई थी, जिसके अब 100 वर्ष पूरे हो चुके हैं|
कार्यक्रम की शुरुआत अकार पत्रिका के संपादक और वरिष्ठ साहित्यकार प्रियंवद के स्वागत वक्तव्य से हुई, उन्होंने कहा कि इतिहास अक्सर नाइंसाफ़ी करता है. कुछ को याद रखता है और कुछ को भूल जाता है, अशफाक़ को भी इतिहास में भुला दिया गया. भगत सिंह को भी फाँसी हुई, पर आज उन्हें शहीद-ए-आज़म के नाम से याद किया जाता है, सुखदेव और राजगुरु को भी याद किया जाता है. पर उनका क्या जो इतिहास के पन्नों में दब गए, अनसुने रह गए, जैसे कानपुर के ही अज़ीमुल्ला खां. चटगाँव बंगाल के सूर्य शेन. बात तो सब पर होनी चाहिए. काकोरी काण्ड में चार लोगों को फाँसी दी गई थी, पर कितने लोग उन चारों के नाम जानते हैं ?
शहज़ाद मेहदी ने बताया कि दास्तानगोई का प्रचलन बहुत पुराना है. इसका इस्तेमाल आज़ादी के आन्दोलन में भी काफ़ी हुआ और इसका असर बेहद सकारात्मक रहा था. उन्होंने कहा कि हमारे पूर्वजों ने ब्रिटिश हुकूमत के ख़िलाफ़ तरह-तरह की किस्सागोई के ज़रिए आवाम को एकजुट किया था और उनमें वतनपरस्ती का जोश जगाया था.
काकोरी काण्ड के नायकों में से एक अशफाक़ उल्ला खां वतन से कितनी मोहब्बत करते थे, काकोरी ऐक्शन में उनकी भूमिका और महत्व क्या था, कभी न झुकने की हिम्मत और इंक़लाब को कायम रखने का जज़्बा अशफाक़ में कहाँ से आया, ये सब दास्ताँ-ए-अशफाक़ के माध्यम से लोगों ने सुना और देखा. दास्तानगोई का आग़ाज़ अशफाक़ के उस क़लाम से किया गया, जो उन्होंने अपने केस के फ़ैसले की पूर्वसंध्या यानी 12 जुलाई 1927 की रात को लिखा था. अशफाक़ और बिस्मिल की दोस्ती और उनके अशआर इस कार्यक्रम का प्रमुख आकर्षण रहे. जब दास्तान अपने उरूज़ पर, यानी फांसी के वाक़ये पर पहुँची तो सबकी आँखें नम हो चुकी थीं. कार्यक्रम का संचालन ख़ान अहमद फ़ारुक़ ने किया.
इस कार्यक्रम के दौरान शहर के कई गणमान्य नागरिक, साहित्यकार व रंगकर्मी मौजूद रहे. प्रमुख नामों में प्रताप साहनी, देवेन्द्र जायसवाल, आनंद शुक्ल, अनीता मिश्र, शिवा किशोर, भावना मिश्र, प्रखर श्रीवास्तव, अनिल सिन्दूर, राजेश अरोड़ा आदि उपस्थित रहे.




