संस्मरण
1990-91 के दशक के शुरुवाती दिनों में नाटकों का शौकीन एक कनपुरिया मुंबई जा पहुँचा, नाना पाटेकर का नाटक ‘पुरुष’ चल रहा था, जेब में टिकट के पैसे नहीं थे मगर नाटक देखने समझने की ज़िद ‘मराठी’ भाषा ना समझ पाने के बावजूद भी प्रबल थी इसलिए काउंटर पर मौजूद आजमगढ़ के एक व्यक्ति को सेट कर ना सिर्फ नाना का नाटक देखा बल्कि नाना से संवाद के साथ ही जीवन भर की सीख मिली…
ये संस्मरण कानपुर के वरिष्ठ रंगकर्मी व निर्देशक ओमेन्द्र कुमार ने अपनी यादों को ताज़ा करते हुए ‘जनमानस न्यूज़’ के साथ साझा किया उन्होंने बताया की नाना उस नाटक में विलन के रोल में बलात्कारी और बाहुबली नेता गुलाबराव की भूमिका में थे| स्त्री चरित्र में पीड़ित पात्र अम्बिका कैसे बाहुबली नेता के अदालती कार्यवाहियों से बरी हो जाने के बाद भी बदला लेती है| इस ही कहानी पर नाटक का मंचन हुआ|
कार्यक्रम पश्चात् जब बैक स्टेज नाना से मुलाकात हुई तो परिचय बताने के अतिरिक्त अनुभव साझा करते हुए ओमेन्द्र जी ने नाना को बताया की मराठी ना समझ पाने के कारण भी वे नाना की अदाकारी से बेहद प्रभावित हुए… तो नाना ने उल्टा ओमेन्द्र से प्रश्न किया की क्या आपको मुझे जूते मारने का मन नहीं किया ? मुझे तो इस निगेटिव रोल के लिए कई बार जनता के आक्रोश का सामना करना पड़ा और कई बार मंच पर जूते भी उछल कर आए मेरे नकारात्मक अभिनय से यदि व्यक्ति में इतना आक्रोश आता है कि वे जूता फेकने लग जाए तो मैं यह खुद के प्रति इनाम समझता हूँ इसलिए मैंने कभी भी फेक हुए जूते वापस नहीं लौटाए बल्कि घर ले गया, मैं रोल नहीं करता मैं करेक्टर को जीने की कोशिश करता हूँ| आप यदि गुस्से में मुझे जूता मार देते तो मुझे यकीन हो जाता कि आपको मेरा किरदार पसंद आया…
ओमेन्द्र इस बात से इतना प्रभावित हुए की वे वर्ष 2015 में शुरू किए ”पुरुष” से प्रभावित 50 से अधिक नाटक भारत के 14 राज्यों में करा चुके हैं| ओमेन्द्र नाना को याद करते हुए कहते हैं कि नाना की कर्मठता ये थी की वे फ़िल्मी दुनिया से पहले नाटकों में खूब मंझे, उन्होंने नाटक ‘पुरुष’ के लिए ही 1800 से अधिक शो किए जिसके लिए उन्हें एक शो का 200 ₹ मिलता था|
कलाकार ही नहीं वे बेहद संजीदा इंसान थे की अपने अंतिम संस्कार में लगने वाली लकड़ियाँ भी खुद ही एकत्र कर ले गए थे| हाल ही में आधी रात नाना पाटेकर का अंतिम संस्कार किया गया, उनकी लाज़वाब अदाकारी के अतिरिक्त उनकी समाज सेवा, जमीनी जुड़ाव, सहज और सरल व्यक्तित्व व उनका जीवन के प्रति नज़रिए से बहुत कुछ सीखा जा सकता है|




