– प्रखर श्रीवास्तव
‘द मॉरल’ समाचार पत्र के संपादक श्री शिव शरण त्रिपाठी जी को मैं पिछले 7 वर्षों से जानता था | शुरूवाती समय में न्यूनतम समझ के चलते मैं उनकी गढ़ना उसी तरह करता था कि जिस तरह साप्ताहिक टेबलौइट अखबार हुआ करते थे, काफी वर्ष तक वे निरंतर व्हाट्सअप पर अपना समाचार भेजते रहे.. व्हाट्सअप पर हर पीडीएफ खोलना मेरे लिए सुलभ ना होनें कि दृष्टि में कई बार उनके भेजे डिजिटल पत्र नज़रअंदाज़ ही हो जाया करते थे|
मगर एक दिन कानपुर में ही 15₹ में मिलने वाले उनके 100 पृष्ठ के अखबारी पन्नों के भारी भरकम विशेषांक देखे तो चेतना हिल सी गई, जिज्ञासा भी हुई क्योंकि यह कुछ अद्वितीय सा था | सो फोन कर उनके विशेषांक के प्रति बधाई देते हुए प्रकाशित सामग्री के प्रति अपना मत उनसे फोन पर ही अभिव्यक्त किया, साथ ही अपने कुछ महत्वपूर्ण लेखों और ख़बरों के संदर्भ में भी उन्हें अवगत कराया, जिस पर उन्होंने गर्मजोशी के साथ प्रोत्साहित करते हुए, कभी घर आने को कहा… मैंने भी कहा जल्द ही आएंगे आपकी पत्रकारिता पर एक एपिसोड भी शूट करेंगे, जिसमें आप अपनी खबरों के संदर्भ में बताने के साथ ही विशेषांको के भी दर्शन कराइएगा |
बात आई गई हो गई, एक दो वर्ष बीत गई उन दिनों मेरा जीवन भी दिल्ली और लखनऊ के मध्य झूल रहा था | उस दरमियान उत्तर प्रदेश के गवर्नर श्री राम नाईक जी थे, जो प्रदेश में सर्वाधिक मूल्यवान पत्रकारों में स्व. श्री त्रिपाठी जी की गिनती करते थे| राम नाईक जी पत्रकारों को कैसे डील करते थे ये मैंने कई बार करीब से देखा था, ऐसे में उनका श्री त्रिपाठी जी का इतना सम्मान करना कि अपनी प्रकाशित पुस्तक ”चिरवैति चिरवैति” की समीक्षा लिखने का आग्रह करना आदि आदि मेरे लिए रोचक था और ये भी लगता था कि मेरे ही शहर के इस पत्रकार के साथ जरा बैठक की जाए, देखा समझा जाए शायद कुछ सीखने को मिले |
एक समय जब मन मीडिया जगत की नौकरियों से ना खुश था, और शारीरिक अवरोधों के चलते अपने मकसद में पूर्ण ना हो पाने की स्थिति में जब आंशिक हताशा मन पर हावी होती थी, तो एक दो बार ख्याल आया कि अगर हार गए तो त्रिपाठी जी से ही कह दूँगा, वे हाथों हाथ रख भी लेंगे… क्योंकि मुझे ये भी पता था कि उन्होंने अपने कर्मचारियों को एक समय 50-50 हज़ार तक तनख्वाह भी बाटी थीं | खैर कभी मुझे उनसे ऐसा कुछ कहने की आवश्यकता नहीं पड़ी |
काफी वक्त बीत गया और एक रोज मैं गणेश शंकर विद्यार्थी इंटर कॉलेज, पाण्डु नगर में आयोजित विद्यार्थी जयंती के एक कार्यक्रम का हिस्सा बना… शहर के तमाम महत्वपूर्ण लोगों के साथ ही कुछ क्षेत्रीय विधायकों की वहाँ शिरकत थी| कुछ देर बाद एक बुजुर्ग शख्श अकेला बैठा दिखा तो साथ में मैं भी बैठ गया, वो भाषण दे रहे नेता सलिल विश्नोई पर खिन्नता व्यक्त कर रहा था, परिचय हुआ तो मेरे परिचय देने के बाद उस व्यक्ति ने अपने परिचय में कहा मैं शिव शरण त्रिपाठी हूँ, ‘द मॉरल’ अखबार चलाता हूँ|
मैंने उन्हें बताया कि अरे हमारी आपकी तो कई दफा बात हो चुकी है, उन्हें भी याद आया तो झट से गले लगा लिया | उनके पूर्व की अपेक्षा गिरे हुए स्वास्थ के कारण भी मैं उन्हें पहचान ना सका था |
मैंने हाल चाल पूछा तो जवाब मिला कि कैंसर हो गया है, बाकि तो सब बढ़िया है| उनकी शारीरिक शिथिलता का एक कारण तो स्पष्ट हो गया मगर उनकी जीवटता उस दिन भी बहुत बेबाक और बुलंद थी| जब उन्हें मंच पर बुलाया गया तो भाजपा नेता सलिल विश्नोई को मंच से ही जोरदार तरह से इंगित करते हुए, उनकी जवाबदेही पर कई प्रश्न खड़े कर दिए थे| उनके व्यक्तित्व से मैं प्रभावित था मगर उनकी कैंसर की बात सुनकर मैं इस खुद को इस अपराधबोध से घिरा हुआ पा रहा था, कि कुछ मुलाकातों में देर नहीं करनी चाहिए |
वे गंभीर बीमारी में भी गणेश शंकर विद्यार्थी के कार्यक्रम में शामिल होने को कानपुर के दूसरे कोने ‘कैंट’ इलाके से शहर के बीच पब्लिक ट्रांसपोर्ट से आए थे| अगले वर्ष उस ही कार्यक्रम का संचालन मेरे हाथों में था, जिसमें कानपुर के क्रांतिवीरों के वंशजों को सम्मानित करना था, वंशज सम्मान के पश्चात् जब मेरी नज़र सामने बैठे स्व. श्री त्रिपाठी जी पर पड़ी तो मैंने उन्हें ये सम्बोधित करते हुए मंच पर भाषण देने को बुलाया कि अब अगली आवाज़ उस व्यक्ति की हैं जिनका स्वयं का जीवन भी किसी क्रांतिकारी से कम नहीं, ऐसे संपादक जिन्होंने अपना अखबार तीन तीन भाषाओं में निकाला आदि आदि
मंच पर वे आए और प्रमुख तौर पर उस दिन के उनके उद्बोधन में उन्होंने शहर के समस्त समाचार पत्रों को इंगित करते हुए कहा कि लोग गणेश शंकर गणेश शंकर करते हैं मगर मैं सुबह देख कर आया हूँ एक भी अखबार ने आज के दिन कानपुर का नाम एक वक्त इतना ऊंचा करने वाले पत्रकार की एक छोटी फोटो तक भी नहीं छापी है|
उस समय मंच पर हिंदुस्तान समाचार पत्र के यशस्वी संपादक आशीष त्रिपाठी कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे थे अगले वक्ता के तौर पर मुझे उन्हें ही बुलाने शेष था | जब वे पोरडियम पर बोलने को आए तो वे ना भी चाहते तो अपने भाषण को दूसरी दिशा में ले जाते, मगर उन्होंने सार्वजनिक रूप से अपनी गलती को स्वीकारते हुए यह कहा कि आगे भी हमसे कोई गलती हो तो आदरणीय त्रिपाठी जी को हमारे कान पकड़ने का पूरा अधिकार है| संपादक की कुर्सी पर बैठे तमाम लोगों को मैंने उस दिन तक ऐसी स्थिति में फंस जाने पर बहाने बनाने, बीच बचाव अथवा बेबुनियाद तर्क पेश करते ही देखा था | ये पहली बार था |
अभी पिछले दिनों भारत में एकलौते बचे ब्रिटिश मूल के वरिष्ठ पत्रकार व बीबीसी में संपादक रहे मार्क टुली जब नहीं रहे तब उन पर कुछ अप्रकाशित जानकारियाँ मैंने उन्हें द मॉरल के लिए भेजी, जिन्हें उन्होंने श्रद्धांजलि स्वरुप अपने समाचार पत्र में छापा, इसके बाद वीरांगना दुर्गा भाभी के ध्वसत हो रहे पुस्तकालय के संबंध में उन्होंने एक स्टोरी छापी थी| उनका अखबार प्रदेश के कई जनपदों में पढ़ा जाता हैं, सरकुलेशन भी अच्छा है|
एक तरफ उनका अखबार बढ़ रहा था तो दूसरी तरफ कैंसर अपनी स्टेज चढ़ रहा था| इस ही बीच वे अक्सर मुझसे दो चीजें, तीन माह तक कहते रहे एक यह बताना कि दर्द बहुत है, इस अस्पताल में इतने दिन रहा ब्लड चढ़ा इन्होंने सहायता करी, डॉ. ने कहा कि कैंसर शरीर में यहाँ यहाँ फ़ैल गया है… और दूसरी बात ये कि यार पत्रकारिता विशेषांक के लिए जल्द ही अपना लेख भेजो उसको जल्दी निकालना है, उस पर इतने लाख का विज्ञापन भी आ चुका है आदि आदि…

जैसी गंभीर बीमारी के जिस पड़ाव पर वे थे, उसे मृत्युशैया ही कहा जा सकता है| ऐसी हालात में भी जब वे बताते कि लगभग 45 पन्नों का मैटर अब तक आ चुका है| कल दोपहर को स्कूटर पर कलर पन्ने डिज़ाइन करवाने जाना है तो एक बार को अचम्भा भी लगता तो दूसरा ये लगता कि इतना श्रम इन परिस्थितियों में क्यों और किसके लिए… और तीसरा भाव ये कि आज भी ऐसे प्रेरक पत्रकार हैं| वे सनातन रत्न सम्मान की प्राप्ति से आंतरिक रूप से बेहद प्रसन्न भी थे|
उनकी बीमार शरीर को परेशान करते हुए मैंने उनकी जीवनकथा को दर्शाता एक लम्बा साक्षात्कार उनके ही बेड पर बैठ कर दो बार में रिकॉर्ड किया, जिसका लिंक लेख के अंत में है| इस ही बीच मैं उनके घर 2-4 बार आया गया, आखिरी बार जब मैं उनके घर गया तो एक अंक की कुछ एक्सट्रा कॉपी लेने जो वे अपनी पत्नी से कह कर अलग रखवा कर गए थे, और गए भी तो कहाँ थे कभी घर ना वापस लौटने के लिए…
उस दिन उनकी पत्नी ने मुझसे उन अखबारों के मूल्य 50- ₹ नहीं लिए, बोलीं हमें इसके बारे में नही पता उन्हीं को देना मैं भी घर बेहद दूर होनें के चलते जल्दबाजी में उनसे ज़िद ना कर सका और लौट आया… वे 50-₹ अब मन पर बहुत भारी महसूस हो रहे हैं| उस दिन मालूम ये भी चला कि हार्ट कि समस्या के साथ वे कार्रडियोलॉजी में भरती हैं, यही लगा संघर्ष कर रहे त्रिपाठी जी हर बार की तरह अस्पताल से वापस लौट आएंगे
और फिर मेरे प्रिय और प्रेरक आदरणीय राकेश शुक्ल जी के साथ उन्हें घर पर देखने जाने में भी कोई देर नहीं करनी थी| वे भी सदा से ही श्री शिव शरण त्रिपाठी जी के पत्रकारिता के मूल्यों की प्रशंसा करते रहे हैं| उन्होंने कहा भी था कि अबकी वे जैसे अस्पताल से घर आएं तो कोई शाम उनके यहाँ हो आते हैं| और स्व. त्रिपाठी जी भी ये कहते थे कि ये ख्याती प्राप्त काबिल प्रोफेसर है, मगर भाई बड़ा सहज और विनम्र हमेशा मुझे ‘सर’ कह कर ही सम्बोधित करता है|
अगले दिन तीन दिन के लिए कानपुर से बाहर गया, और तीसरे ही दिन सुबह 12 बजे खबर मिली कि द मॉरल वाले त्रिपाठी जी सुबह को कैंसर से जंग हार गए हैं और अपनी कर्मभूमि से काफी दूर अपनी जन्मभूमि अमेठी में अंतिम क्रियाओं हेतु रवाना हो चुके हैं और गाड़ी लखनऊ से आगे है|
मेरे मन में सारे दृश्य दौड़ गए और इस तरह मैंने अपने कैरियर के शुरुवाती दौर में एक ऐसा अकर्मठ, तेजस्वी और तपस्वी संपादक देखा जिनको कोई संसाधनों की जरूरत नहीं पड़ती थी, जो समझौतावादी नहीं था जो बेहद बेबाक था|
शायद स्वतंत्र पत्रकारिता के अखबार और संघर्ष तथा नैतिक मूल्यों वाली पत्रकारिता की वे अंतिम लौ ही रहे होंगे, जैसा जीवन में जीते थे वैसा जीवन सिर्फ कहानियों में ही सुनने को मिलता था | उनका अंतिम साक्षात्कार प्रमाण है कि कानपुर में कोई शिव शरण त्रिपाठी भी था |
कानपुर में उनकी याद में या उनके जाने पर जिस तरह की प्रतिक्रिया अपेक्षित थी, वैसा कुछ तो नहीं हुआ मगर कर्म की पूजा करने वाले भले कहाँ रुकते हैं| तमाम काम और तमाम विशेषांक छाप कर एक सशक्त शहर के स्वतंत्र अखबार के संपादक ने इस तरह अपनी कहानी पूरी करी, संभवत: अंतिम दस साँसों से भी लड़ रहे त्रिपाठी जी के वैचारिक मन में आगामी पत्रकारिता विशेषांक के प्रकाशित हो जाने की जद्दोजहद ही चल रही होगी | वे सदैव सहज बोले, सशक्त लिखे, दमभर किए और भरपूर जिए….
आपकी मृत्यु के दो दिन पूर्व से शहर में ना था, अंतिम दर्शन भी ना हो सके और आज 25/12/2026 को आपकी तेहरवीं से दो दिन पूर्व जब आपकी जीवनकथा प्रकाशित हो रही है, तो उसे आप ही नहीं देख पा रहे… आपके जीवन से उदाहरण के साथ ये सीखा समझा कि जब तक मृत्यु आ ही ना जाए, तब तक कर्म जीवन बखूबी जियो.. ये बड़ी बात है| आपका प्रेरक जीवन नज़ीर बना रहेगा…अलविदा त्रिपाठी जी 💐✨🙂




